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आलोचना शुद्धि – साल का ग्यारहवां कर्तव्य

आलोचना शुद्धि   साल का ग्यारहवां कर्तव्य
यह कर्तव्य अत्यंत महत्वपूर्ण है| अहंकार के कारण जीवको कभी भी अपनी गलती नहीं दिखाई देती|

धमाका हुआ| तब भतीजेने पूछा, ‘‘चाचा ! क्या हुआ ?’’ चाचाने कहा, ‘‘कुछ नहीं बेटा… वह तो मेरी धोती, कफनी और टोपी गिर गई|’’ भतीजेने पुनः प्रश्न किया, ‘‘किन्तु इसमें इतनी आवाज़ ?’’ चाचाने कहा, ‘‘तू समझता नहीं है, उसमें मैं भी था !’’ बात यह है कि चाचा कहने के लिए तैयार नही है कि, ‘‘मैं गिर गया’’|

इसी अहं के कारण ही अपनी भूल दिखाई देने पर भी भूलका स्वीकार करने- गुरुके पास जाकर प्रायश्चित करनेका मन नहीं होता| मॉं ने पुत्र को कहा, ‘‘बिल्ली की पूँछ मत खींच’’ तब पुत्रने कहा, ‘‘मैं खींचता ही नहीं, मैंने सिर्फ पकड कर रखी है| बिल्ली खींच रही है| हॉं ! गलती मेरी नहीं…अन्यकी है|

इस अहंकार के कारण ही जीव किये हुए पापके मुरदे के भार और दुर्गंध को लेकर घूमता रहता है| बादमें जिस तरह कूएँ में पड़े हुए कुत्ते का शव निकाले बिना कितना भी पानी निकालने पर भी पानी शुद्ध नहीं होता, उस तरह ही किये हुए पापोंका एकरार-प्रायश्चित किये बिना कितनी भी आराधना करने पर भी आत्मा शुद्ध नहीं हो पाती..| आत्मा गुणस्थानक में आगे बढ़ती ही नहीं |

जिसका एक्स-रे खराब हो, उसकी तसवीर का कोई मूल्य नही रहता| अंदर दंभ-कपटसे, पापसे आत्मा बिगड़ी हुई हो, तो बाहर से की गई अच्छी सुंदर क्रिया रूप शोभा की कोई किंमत नहीं रहती| इस भवके तमाम पापोंकी गुरुसमक्ष आलोचना-प्रायश्चित करने से उस पापोंके भारसे हलके हो सकते हैं| बादमें यथाशीघ्र गुरुदत्त प्रायश्चित पूर्ण करना चाहिए| गीतार्थ गुरुदेव गंभीर होते हैं, इसलिए वे पापका एकरार करनेवाले का कभी भी तिरस्कार नहीं करते, किन्तु शाबाशी देते हैं कि पाप करने में बहादुरी नहीं… जो पापका स्वीकार करता है वही सचमुच बहादुर है और सच्चा आराधक है|

अपना छोटासा प्रमाद जैसे पापका बचाव करनेवाले सावद्याचार्यने तीर्थंकर नामकर्मको गँवा दिया था| एक भवका संसार अनंत भव जितना बढ़ गया और उन भवोंमें भयंकर कष्ट और पीड़ा को सहन किया| ऐसा पढने पर ही समझ में आता है कि कर्मसत्ता पापका बचाव करने की कितनी जालिम सजा देती है| (पढ़िये :- प्रतिमाशतक, गुजराती अनुवाद)

आलोचना शुद्धि   साल का ग्यारहवां कर्तव्य
अपने किये हुए पापको छुपाकर लक्ष्मणा साध्वीने दूसरे के नाम पर प्रायश्चित लिया था| इस तरह माया करने के कारण बादमें ५० साल तक भीषण तप करने पर भी पाप धुला नहीं और ८० चोबीसी पर्यन्त का संसार बढ़ गया|

रुक्मि राणीने एकबार राजकुमार के सामने विकारभरी दृष्टिसे देखने का पाप किया| पापका प्रायश्चित करने के बजाय पापका बचाव ही करती रही तब उसके संसार भ्रमण के एक लाख भव बढ़ गये|

भयंकर पापी अर्जुनमाली, दृढ़ प्रहारी और रौहिणेय जैसे पापीओंने पापका एकरार करके प्रायश्चित कर लिया तो नरकमें जाने के बदले आत्मकल्याण कर लिया|

जो पाप इस भवमें अश्रु द्वारा और गुरुने दिये हुए, हमें करने में अनुकूल हो ऐसे तप-प्रायश्चित से धुल सकते हैं और जालिम दंड से बच सकते हैं, उन पापों को सतत दिलमें रखना और परलोक में भयंकर दंडका भोग बनना, यह तो मूर्खता है|

सोचना चाहिए कि सर्व जीवो के साथ क्षमापना किये बगैर और सर्व पापोंकी शुद्धि किये बगैर पूजा, प्रतिक्रमण, तप, दान इत्यादि कैसे और कितने फलदायी होंगे ? क्षमापना और पापोंकी शुद्धि करने के बाद वे ही पूजा आदि आराधना अकल्प्य पुण्य का उपार्जन करानेमें निमित्त बनतीं हैं | सांवत्सरिक प्रतिक्रमण भी तब सफल होगा !

हिंसा-झूठ इत्यादि अठारह प्रकारके पाप, टी.वी. में किये हुए बिभत्स-दर्शन, होटल में अभक्ष्य भोजन इत्यादि के पाप, या तो व्यापार में की हुई बेईमानी, अनीति, मिलावट, या तो ईर्ष्या, प्रपंच, दंड, दूसरों को आपस में लडाने की वृत्ति इत्यादि जैसे पाप या तो १) किये हुए नहीं करने योग्य तमाम पाप २) करने योग्य पूजा-सामायिक-दान-तप-जप इत्यादि धर्ममें किया हुआ प्रमाद ३) जिनवचन-क्रिया-अनुष्ठानों में अश्रद्धा और ४) अपनी कल्पना – मान्यतानुसार दिये हुए अभिप्राय, विपरीत प्ररूपणा, जैन क्रिया-अनुष्ठानों की टीका आदि पापों की घिरी हुई परछाईमें यदि नरक आदि अनंत दुर्गति दिखाई देती हो, तो पापोका तत्काल ही प्रायश्चित लेकर निर्मल हो जाईए| अपना परलोक बचाईए, सुधार लीजिए|

खंधक ऋषिने पूर्वभवमें वनस्पति की छाल उतारी थी और उसका आनंद मनाया था| इसका परिणाम यह आया कि खंधक ऋषिके भवमें जीते जी चमड़ी उतारने का उपसर्ग हुआ| झांझरिया मुनिकी हत्या करनेवाले राजाने मुनिकी हत्या करके ऐसा पाप किया था कि अनंतकाल तक भी मुक्ति न मिल सकें| किन्तु मुनि हत्याके बाद घोर पश्चाताप और प्रायश्चित से क्षणभरमें ही केवलज्ञान प्राप्त कर लिया| हररोज आप इतने पाप करते हैं कि उनका दंड चूकाने के लिए असंख्य भव भी कम पडे | जब कि गंभीर गीतार्थ गुरुभगवंत समक्ष आलोचना शुद्धि करके यथाशीघ्र प्रायश्चित पूर्ण करने से शूलि का दंड सूई से निपटता है|

आलोचना शुद्धि   साल का ग्यारहवां कर्तव्य
यदि किये हुए पाप खटकते हो तो अश्रुभरी आँखों से गुरुभगवंत की गोदमें सिर रखकर सभी पापों का एकरार-स्वीकार करके गुरुभगवंत को कहना कि गुरुदेव ! पाप करनेमें मैंने कोई विकल्प ही नहीं रखा, इसलिए उस पापोंके प्रायश्चितमें भी मुझे कोई विकल्प की आवश्यकता नहीं है| मुझे कठिनसे कठिन प्रायश्चित देना| मैंने पाप करने में कभी भी शक्तिका विचार नहीं किया, इसलिए प्रायश्चित के लिए मेरी शक्तिका कोई विचार नहीं करना | नरकगति-पशुगति के तीव्रतम दंड से अट्ठमका तप ज्यादा सरल है| इसलिए मुझे कोई कसर छोडे बिना प्रायश्चित देना| महानिशीथ सूत्रमें आता है कि आलोचना का विचार करते करते, आलोचना के लिए खड़े होते होते, आलोचनाके लिए गुरुमहाराज समक्ष डग भरते भरते, गुरुभगवंत को अश्रुभरी आँखोंसे अपने पाप सुनाते सुनाते, गुरुमहाराज ने दिये हुए प्रायश्चित को सुनते सुनते और उस प्रायश्चित वहन करते करते अनंत आत्माने केवलज्ञान की प्राप्ति कर ली हैं| इसलिए अब आप भी निर्मल और शुद्ध हो जाए|

आलोचना के विषयमें ढेर सारी पुस्तक प्रकाशित हुई हैं| उनको पढ़कर गीतार्थ गुरुभगवंत के पास आलोचना शुद्धि संवत्सरी प्रतिक्रमण करने से पहले कर लेनी चाहिए|

श्रावकों को सालभर में ये ग्यारह कर्तव्यों को निभाना हैं एवं पर्वतिथि के दिन पौषध करना चाहिए| पर्वतिथि के दिन आनेवाले भवके आयुष्यका बंध होने की संभावना रहती है| हरी वनस्पति के स्वाद के प्रति जीवको सहजतया रुचि रहती है| पर्वतिथि के दिन हरी वनस्पति के स्वाद की अनुभूति करते ही यदि नये आयुष्य का बंध हो जाए तो संभव है कि वनस्पतिकायके आयुष्य का बंध हो जाये| जीवदया का कारण तो है ही| इसलिए पर्वतिथि के दिन हरी वनस्पति का त्याग करना चाहिए| अमुक लोग स्वाद के लिए सुकोतरी वापरते हैं, किन्तु उसमें तो उस मूल तात्पर्य का विस्मरण ही हो जाता है| हरी वनस्पति वापरते समय दुर्गति के आयुष्य का बंध होनेकी संभावनासे यदि उसका त्याग करना चाहिए, तो व्यापारआदि करते समय, शरीर की पंचायत करते, पंच इन्द्रियों के विषयसेवन करते, अब्रह्मचर्य के समय और इस तरह ही संसारके अन्य सभी व्यवहार में रत-लीन रहते समय क्या दुर्गति के आयुष्य का बंध नहीं होता ? अवश्यमेव बंध होने का संभव है| इसलिए पर्वतिथि के दिन हरी वनस्पति की तरह इन सभी पापोंका त्याग करना भी आवश्यक है और इसलिए ही भगवानने १) आहार, २) शरीर सत्कार, ३) अब्रह्मचर्य और ४) सभी व्यवहार-व्यापार ये चारों जो दुर्गति के कारण हैं, उनके त्यागरूप पौषधका निर्देश किया है| साधुजीवन के आस्वाद रूप पौषधव्रत अवश्यमेव करना चाहिए| भरत चक्रवर्तीके पुत्र सूर्ययशाने प्राणत्याग जैसी परिस्थिति आ जाने पर भी पौषधव्रत का पालन करके महापराक्रम किया था| इसलिए ही तो कविने कहा है कि ‘‘कर सको धर्मकरणी सदा, तो करो यह उपदेश, सर्वकाल कर न सको तो, महापर्व सुविशेष… विरतिए सुमति धरी आदरो……’’| हररोज पापसे बच नहीं सकते, पूरे दिन धर्ममें नहीं रह सकते तो कमसे कम पर्वतिथि पर तो पाप का त्याग करें, धर्ममय बनें !

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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