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आज भी प्रायश्चित्त विधि है

आज भी प्रायश्चित्त विधि है
यदि कोई आत्मा कहती है कि आज इस काल में प्रायश्‍चित्त नहीं है, प्रायश्‍चित्त देने वाले नहीं है, इस प्रकार बोलने वाली आत्मा दीर्घसंसारी बनती है, क्योंकि नौवें पूर्व की तृतीय वस्तु में से उद्धृत आचार कल्प, व्यवहार सूत्र आदि प्रायश्‍चित्त के ग्रंथ एवं वैसे गंभीर गुरुवर आज भी विद्यमान हैं|

गुरुदेव से शुद्ध आलोचना लेने पर अपनी आत्मा हल्की हो जाती है, जैसे माथे से भार उतारने के पश्‍चात् भारवाहक स्वमस्तक अत्यंत हल्का महसूस करता है| वंदित्तु सूत्र में कहा है कि -

कयपावो वि मणुस्सो आलोइय निंदिय गुरुसगासे|
होई अइरेगलहुओ ओहरिय भरुव्व भारवहो

जिस जीव ने पाप किया है, वह यदि गुरु के पास उसकी आलोचना और निंदा करता है, तो वह अत्यंत लघु-हल्का बन जाता है| मानो भारवाहक ने माथे पर से भार उतार कर रख दिया हो| पाप करना दुष्कर नहीं है क्योंकि, अनादिकाल से मोहनीय कर्म आदि के परवश बनी हुई आत्मा पाप कर लेती है| तीर्थंकर की आत्माओं ने भी पाप किया था, परन्तु आलोचना के द्वारा वे भी शुद्ध बने, तभी उनका आत्मोत्थान हुआ| आलोचना लेनी, यही दुष्कर है| ज्ञानी भगवंतों ने कहा है कि -

तं न दुक्करं जं पडिसेविज्जई ,
तं दुक्कर जं सम्मं आलोइज्जइत्ति

पाप करना दुष्कर नहीं है, परन्तु भली प्रकार से आलोचना लेना दुष्कर है|

प्रायश्‍चित आलोचना देने वाले गुरुदेवश्री कैसे होते है?

आयारवमाहारव ववहारोऽपवीलए पकुव्वे य|
अपरिस्सावी निज्ज अवायदंसी गुरु भणियो

ज्ञानाचारादि पॉंच प्रकार के आचार को सुंदर रीति से पालने वाले हो, आलोचक (आलोचना करने वाला) के अपराधों के अवधारण में समर्थ हो| आगम से लेकर जित व्यवहार तक के पॉंच व्यवहारों के जानकार हों| अपव्रीडक-लज्जा के कारण कोई व्यक्ति स्वपापों को छिपाता हो| उसकी लज्जा दूर करके ठीक प्रकार से आलोचना करवाने वाले हों| प्रकुर्वक-आलोचक की शुद्धि करने के लिए समर्थ हों| अपरिश्रावी = आलोचक द्वारा कहे हुए दोष दूसरों को बताने वाले न हों | निर्यापक = अर्थात् वृद्धत्व आदि के कारण प्रायश्‍चित वहन करने में असमर्थ हो, तो उसे योग्य प्रायश्‍चित देकर प्रायश्‍चित नहीं करने वालों को परलोक का भय मार्मिक ढंग से समझने वाले और गीतार्थ हों| ऐसे प्रायश्‍चित देने वाले गुरु बताए गए हैं|

अगीतार्थ गुरु शास्त्र के जानकार नहीं होने से कम या अधिक प्रायश्‍चित देकर खुद भी संसार में गिरते है और दूसरों को भी गिराते है| अतः आलोचना के लिए उत्कृष्ट से ७०० योजन (५६०० miles) और काल से १२ वर्ष तक अच्छे गीतार्थ गुरु की खोज करनी चाहिए|

विवक्षित क्षेत्र और काल के अन्दर गीतार्थ गुरु न मिलें और पश्‍चात्ताप के तीव्र भाव रूप भाव-आलोचना हो जाय, तो वह जीव द्रव्य-आलोचना किए बिना भी केवलज्ञान प्राप्त कर लेता है| जैसे कि झॉंझरिया ऋृषि की हत्या कराने वाला राजा| सद्गुरु की खोज में कदाचित् मृत्यु भी हो जाय, तो भी आलोचना की अपेक्षा वाला होने से आराधक बनता है| परंतु सद्गुरु मिलने पर भी आलोचना की उपेक्षा करे, तो वह आराधक कैसे बनेगा ? अतः आलोचना अवश्य लेनी चाहिए|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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