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कामलक्ष्मी और उनके पुत्र केवलज्ञानी बने

कामलक्ष्मी और उनके पुत्र केवलज्ञानी बने
लक्ष्मीतिलक नगर में एक दरिद्र वेदसार नामक ब्राह्मण था| उसकी पत्नी का नाम कामलक्ष्मी था| वेदसार ब्राह्मण के वेदविचक्षण नाम का पुत्र था| प्रतिपक्षी राजा ने लक्ष्मीतिलक नगर पर आक्रमण कर दिया| कामलक्ष्मी पानी भरने के लिए नगर के बाहर गई थी| आक्रमण के कारण नगर के दरवाजे बन्द कर दिये| अतः कामलक्ष्मी बाहर ही रह गई| Continue reading “कामलक्ष्मी और उनके पुत्र केवलज्ञानी बने” »

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प्रायश्‍चित देने वाले गुरु कौन होते हैं?

प्रायश्‍चित देने वाले गुरु कौन होते हैं?
आलोचना का प्रायश्चित देने वाले गुरु पांच व्यवहारों के जानकार होते हैं|

आगम व्यवहारी :- अर्थात् केवलज्ञानी, मनःपर्यवज्ञानी, अवधिज्ञानी, १४, १०, ९ पूर्वी हो, उनके पास प्रायश्‍चित लेना चाहिए| Continue reading “प्रायश्‍चित देने वाले गुरु कौन होते हैं?” »

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चित्रक और संभूति चंडाल बने

चित्रक और संभूति चंडाल बने
जंगल से एक मुनि गुज़र रहे थे| रास्ता भूल जाने के कारण दोपहर के समय बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े| गाय चराने के लिए आये हुये चार ग्वालों ने इस दृश्य को दूर से देखा| वे नज़दीक आये| मुनि बेहोश थे| होठ सूख गए थे| चेहरा कुम्हला गया था| तृषा का अनुमान कर उन्होंने गाय को दुहकर मुँह में दूध डाला| इससे मुनि होश में आये| कुछ समय के बाद मुनिश्री ने चारों को समझाने का प्रयास करते हुए कहा कि संसाररूपी जंगल में उनकी आत्मा भटक रही हैं| उस दुःख से पार उतरने के लिये एकमात्र साधन है चारित्र धर्म| इस प्रकार का बोध दिया| चारों ने प्रतिबोध पाकर चारित्र ग्रहण किया| उनमें से दो आत्माएं तो उसी भव में केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष में चली गई| Continue reading “चित्रक और संभूति चंडाल बने” »

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गुरुदेवश्री का आश्‍वासन

गुरुदेवश्री का आश्‍वासन
अरे पुण्यशाली मानव! तू वास्तव में धन्यवाद का पात्र है| पाप हो जाना, कोई आश्‍चर्य नहीं है| मोहनीय कर्म के उदय से किसने कौन-से पाप नहीं किये? क्या मोह ने तीर्थंकर की आत्मा को भी छोड़ा है? क्या उन्होंने अपने पूर्व जीवन में भयंकर पाप नहीं किये? क्या उन पापों से उन्हें सातवी नरक तक नहीं जाना पड़ा? परंतु जीवन की काली-श्याम किताब को धोकर तुझे उज्जवल बनने का मनोरथ हुआ हैं| अतः तू धन्यवाद का पात्र है| तू तो काली किताब का एक-एक पन्ना खोलकर कालिमा को धो रहा है| अतः तू विशेष रूप से धन्यवाद का पात्र है| बालक जैसी सरलता से एक एक पाप निष्कपट भाव से प्रगट कर दे| अरे! आत्मा पर से झिड़क दे इन पापों को| Continue reading “गुरुदेवश्री का आश्‍वासन” »

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पूर्वभव में इलाचीकुमारने आलोचना न ली

पूर्वभव में इलाचीकुमारने आलोचना न ली
वसंतपुर नगर में अग्निशर्मा नामक ब्राह्मण युवक रहता था| उसने अपनी पत्नी के साथ चारित्र लिया| परन्तु परस्पर मोह नहीं टूटा| Continue reading “पूर्वभव में इलाचीकुमारने आलोचना न ली” »

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आलोचना सब को करनी चाहिए

आलोचना सब को करनी चाहिए

जह सुकुसलो वि विज्जो अन्नस्स
कहेइ अत्तणो वाहि|
एवं जाणगस्स वि सल्लुद्धरणं परसगासे॥
जिस प्रकार कुशल वैद्य भी स्वयं की व्याधि दूसरों से कहता है, उसी प्रकार प्रायश्‍चित को जानने वाले गीतार्थ आचार्य को भी दूसरे के पास आलोचना करनी चाहिए अर्थात् उपाध्याय-पंन्यास-गणि साधु-श्रावक आदि सब को आलोचना अवश्य करनी चाहिए| आलोचना कहने के सिवाय आत्मा शुद्ध नहीं होती है| Continue reading “आलोचना सब को करनी चाहिए” »

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कलावती की कलाईयों का छेदन किया गया

कलावती की कलाईयों का छेदन किया गया
कलावती रानी पूर्वभवमें तोते के दोनों पंख को काटकर खुश हई थी, उसकी आलोचना नहीं ली| उसके बाद क्रम से तोते का जीव राजा बना, उसकी रानी कलावती बनी| एक दिन अचानक रानी के हाथ में कंकण (हाथ के आभूषण) पहने हुए देखकर दासीने पूछा कि, ‘‘ये कहॉं से आये?’’ रानी ने जवाब दिया, ‘‘जो हमेशा मेरे मनमें रहता है और जिसके मन में सदा मैं रहती हूं, रात-दिन जिसे मैं भूला नहीं पाती, जिसको देखने से मेरे हर्ष का कोई पार नहीं होता, उसने ये भेजे हैं|’’ Continue reading “कलावती की कलाईयों का छेदन किया गया” »

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भविष्य की मनोव्यथा

भविष्य की मनोव्यथा
गुरुदेव! मुझे जब अपने जीवन की काली किताब याद आती है, तब रोंगटे खड़े हो जाते हैं| अरे जीव! तेरा क्या होगा? कण जितने सुख के लिए मण जितने पाप किये हैं, उनसे टन जितना दुःख आएगा, उन्हें तू किस तरह सहन करेगा? गुरुदेव, जरा-सी गर्मी पड़ती है, तो आकुल-व्याकुल होकर पंखे या एयरकंडिशन की हवा खाने के लिये दौड़ता हूँ, तो फिर नरक की भयंकर भट्ठियों की असह्य गर्मी को कैसे बर्दाश्त करूँगा? जहॉं लोहा क्षणभर में पिघल कर पानी जैसा प्रवाही बन जाता है, परमाधामी भट्ठी के ऊपर मुझे भुट्टे की तरह सेकेंगे, तब गर्मी कैसे सहन कर सकूँगा? तड़प-तड़प कर आकुल-व्याकुल बने मन को आश्‍वासन देनेवाले वचनों के बदले परमाधामी के कड़वे वचन सहन करने पड़ेंगे, ‘‘ले, अब कर मज़ा|’’ Continue reading “भविष्य की मनोव्यथा” »

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आज भी प्रायश्चित्त विधि है

आज भी प्रायश्चित्त विधि है
यदि कोई आत्मा कहती है कि आज इस काल में प्रायश्‍चित्त नहीं है, प्रायश्‍चित्त देने वाले नहीं है, इस प्रकार बोलने वाली आत्मा दीर्घसंसारी बनती है, क्योंकि नौवें पूर्व की तृतीय वस्तु में से उद्धृत आचार कल्प, व्यवहार सूत्र आदि प्रायश्‍चित्त के ग्रंथ एवं वैसे गंभीर गुरुवर आज भी विद्यमान हैं|

गुरुदेव से शुद्ध आलोचना लेने पर अपनी आत्मा हल्की हो जाती है, जैसे माथे से भार उतारने के पश्‍चात् भारवाहक स्वमस्तक अत्यंत हल्का महसूस करता है| वंदित्तु सूत्र में कहा है कि -

कयपावो वि मणुस्सो आलोइय निंदिय गुरुसगासे|
होई अइरेगलहुओ ओहरिय भरुव्व भारवहो
Continue reading “आज भी प्रायश्चित्त विधि है” »

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आलोचना-प्रायश्चित्त लेकर शुद्ध बनी पुष्पचूला

आलोचना प्रायश्चित्त लेकर शुद्ध बनी पुष्पचूला
पुष्पभद्र नगर में पुष्पकेतु नाम का राजा था| उसकी पुष्पवती नाम की रानी थी| उसने पुष्पचूल और पुष्पचूला नाम के युगल को जन्म दिया| पुष्पचूल और पुष्पचूला परस्पर अत्यन्त प्रेम से बड़े हुए| दोनों एक दूसरे से अलग नहीं रह सकते थे| अब राजा विचार करने लगा कि यदि पुत्री पुष्पचूला का विवाह अन्यत्र करूँगा, तो दोनों का वियोग हो जाएगा| अतः उसने प्रजाजनों की सभा बुलाई| सभा में पुष्पकेतु राजाने प्रश्‍न किया कि अगर मेरी धरती पर रत्न उत्पन्न हो जाये, तो उसे कहॉं जोड़ना, यह अधिकार किसका है? Continue reading “आलोचना-प्रायश्चित्त लेकर शुद्ध बनी पुष्पचूला” »

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