post icon

अपरिग्रह

अपरिग्रह

मुच्छा परिग्गहो वुत्तो
किसी भी वस्तु के प्रति मूर्च्छा का भाव ही परिग्रह है| मूर्च्छा परिग्रह है| परिग्रह का अर्थ है संग्रह और अपरिग्रह का अर्थ है त्याग| किसी वस्तु का अनावश्यक संग्रह न करके उसका जन-कल्याण हेतु वितरण कर देना| परिग्रह मनुष्य को अहंकार एवं मोहरूपी अँधेरे के अथाह भंवर में डुबो देने वाला होता है| धन की परिग्रहवृत्ति काम, क्रोध, मान और लोभ की उद्भाविका है|

धर्मरूपी कल्पवृक्ष को जला देने वाली है| न्याय, क्षमा, सन्तोष, नम्रता आदि सद्गुणों को खा जाने वाला कीड़ा है| परिग्रह बोधिबीज (सम्यक्त्व) का विनाशक है और संयम, संवर और ब्रह्मचर्य का घातक है| चिन्ता और शोक को बढ़ाने वाला, तृष्णा रूपी विषबेल को सींचने वाला, कूड-कपट का भण्डार और कलह का आगार है|

अतः अपरिग्रह एक महान व्रत है| जिसका आज के युग में जनकल्याण की दृष्टि से और भी अधिक महत्त्व है| क्योंकि वर्तान युग में परिग्रह लालसा बहुत बढ़ रही है|

भगवान महावीर ने अपरिग्रह के बारे में एक बहुत बड़ी बात कही है कि अपरिग्रह किसी वस्तु के त्याग का नाम नहीं, अपितु वस्तु में निहित ममत्व-मूर्च्छा के त्याग को अपरिग्रह कहा है| जड़-चेतन, दृष्ट-अदृष्ट वस्तु के प्रति लालसा, तृष्णा, ममता, कामना बनी रहती है तब तक बाह्य त्याग वस्तुतः त्याग नहीं कहा जा सकता| क्योंकि परिस्थितिवश विवश होकर भी किसी वस्तु का त्याग किया जा सकता है| किन्तु उसके प्रति रहे हुए ममत्व का त्याग नहीं हो पाता, यही ममत्व संत्रास का कारण है| यदि वस्तु के अनावश्यक संग्रह को रोकना है, उसका उन्मूलन करना है तो वस्तु के त्याग से पूर्व वस्तु में निहित ममत्व के त्याग को अपनाना होगा और ऐसा किये बिना अपरिग्रह का पालन नहीं हो पायेगा| इसी कारण भगवान महावीर ने संयमी साधकों के लिये परिग्रह का सर्वथा त्याग एवं गृहस्थ साधकों (श्रावकों) के लिये परिग्रह परिमाण व्रत बताया है जिससे विश्‍व के बहुसंख्यक अभावग्रस्त प्राणी त्राण पा सकते हैं|

परिग्रहो ग्रहः कोऽयं विऽम्बितजगत्त्रयः

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
Did you like it? Share the knowledge:


Advertisement

7 Comments

Leave a comment
  1. Dilip Parekh
    जनवरी 16, 2017 #

    भगवान महावीर ने संयमी साधकों के लिये परिग्रह का सर्वथा त्याग एवं गृहस्थ साधकों (श्रावकों) के लिये परिग्रह परिमाण व्रत बताया है जिससे विश्‍व के बहुसंख्यक अभावग्रस्त प्राणी त्राण पा सकते हैं|

    “परिग्रह परिमाण व्रत” यानि क्या ? कृपया इस विषय में प्रकाश डालिए. प्रणाम

  2. Jashvant Shah
    जनवरी 17, 2017 #

    Jai jinendra.

    I am sorry I am answering in English.” Parigrha Pariman Vrata” means putting limitation on holding anything with attachment.You have to think and decide as to what is your REAL requirement.Accordingly fix a limit for that – that beyond that limit you will not keep it for yourself even if you get it. This just in short I have tried to explain you regarding this Vrata. Just for your information, I am preparing one paper on a subject related to this subject to be presented at a seminar at Ladnun ( Rajastan ).

  3. Dilip Parekh
    जनवरी 18, 2017 #

    बहुत बहुत धन्यवाद जशवंतभाई, आपने IN SHORT पूरा बता दिया. I GOT IT.
    लाडनू सेमिनार में इसी विषय पर आप बतानेवाले है, यह जानकर आनंद.

  4. Jashvant Shah
    जनवरी 18, 2017 #

    Bhai Shri Dilipbhai,

    Jai jinendra – Pranam – Namaskar,

    Thank you very much for having read my reply to your query.

    If you are interested in reading the paper on this subject which I am going to present at a National seminar on ” Economics and Sustainable Development : Aparigraha and Sustainable development ” at Jain Vishva Bharati Institute – at Ladnun ( Rajastan )between Feb.24 -26 2017. you may send your email id, so that i can send my paper by email to you.

    • Dilip Parekh
      जनवरी 30, 2017 #

      Namaskar Shri Jashvantbhai, Not yet send.

      • Your Name
        जनवरी 30, 2017 #

        Shri Dilipbhai

        Jai jinendra Namaskar Pranam

        Please send your email address.

  5. Dilip Parekh
    जनवरी 19, 2017 #

    जशवंतभाई, जय जिनेद्र, नमस्कार
    अपरिग्रह विषय का आपका शोध निबंध देनेकी तत्परता बतानेके लिए धन्यवाद. नीचे दिए मेल एड्रेस पर आप भेज सकते है. [email protected]

Leave a Reply

Connect with Facebook

OR