1 0 Tag Archives: जैन सिद्धांत
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आंखें जहां भी तुम देखो

आंखें जहां भी तुम देखो
आंखें जहां भी तुम देखो ऐसी हो जाएं शुद्ध कि वहीं परमात्मा दिखाई पड़े

इंद्रियां भी उसी के लिए द्वार बन सकती हैं| और हम इंद्रिय प्रार्थना में संलग्न हो सकती है| और उसी को हम कलाकार कहेंगे जो सारी इंद्रियों को परमात्मा में संलग्न कर दे; जो आत्मा से ही न पुकारे, देह से भी पुकारे| Continue reading “आंखें जहां भी तुम देखो” »

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दृष्टि मूल्यवान है

दृष्टि मूल्यवान है

दृशा दृश्यं प्रसाधयेत्
इस संसार में हम प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक स्थिति से कुछ न कुछ सीख सकते हैं परन्तु इसके लिए हमें अपने भीतर सूक्ष्म दृष्टि पूर्वक देखने की क्षमता होनी चाहिए| Continue reading “दृष्टि मूल्यवान है” »

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पहेली

पहेली
विप्र वेश में कोई यक्ष एक राजसभा में जा पहुँचा वहॉं उसने सबके सामने एक पहेली रखी – पॉंच मी पॉंच सी, पॉंच मी न सी

फिर वह बोला कि मैं परसों फिर यहॉं आऊँगा| यदि तब तक किसी ने इस पहेली का उत्तर नहीं दिया तो समझ लिया जायेगा कि इस राज्य में कोई पण्डित है ही नहीं|

राजा ने राजपण्डित से कहा कि यदि आप कल शाम तक इस पहेली का उत्तर नहीं खोज पाये, तो परसों प्रातःकाल ही आपका वध कर दिया जायेगा| यह पूरे राज्य की प्रतिष्ठा का सवाल है| बेचारा राजपण्डित निराश होकर किसी जंगल में जाकर एक पेड़ के नीचे बैठ गया और विचार करने लगा| उसी पेड़ पर वही यक्ष अपनी प्रेयसी के साथ बैठा बातें कर रहा था|

प्रिये ! परसों तुम्हें अवश्य ही राजपण्डित का कलेजा खाने को मिल जायेगा| मैंने पहेली ही ऐसी पूछी है कि उसका उत्तर उसे सूझेगा ही नहीं और फिर परसों उसका निश्‍चित ही वध कर दिया जायेगा|

आपकी पहेली का अर्थ क्या है ? प्रेयसी ने पूछा|

पहेली पन्द्रह तिथियों पर आधारित है| पंचमी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी ये पॉंच मी वाली तिथियॉं हैं| एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णासी ये पॉंच सी वाली तिथियॉं हैं और एकम, दूज, तीज, चौथ और छठ इन पॉंचों में न मी है और न ही सी|

राजपण्डित ने यह सब सुन लिया| फिर वह घर चला गया| दूसरे दिन राजसभा में अर्थ बताकर उसने अपने प्राणों की रक्षा की|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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तुम्हारे हाथ से डूब जाऊं तो भी उबर जाऊँ

तुम्हारे हाथ से डूब जाऊं तो भी उबर जाऊँ
अब तु ले चलो उस पार| अपने से तो यह न हो सकेगा| यह भवसागर बड़ा है| दूसरा किनारा दिखाई भी नहीं पड़ता है| Continue reading “तुम्हारे हाथ से डूब जाऊं तो भी उबर जाऊँ” »

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समता रखो

समता रखो
मेरी समता हर स्थिति में बनी रहे…..जो स्वीकार भाव की क्षमता को बढ़ा सकता है वही सुख-चैन से जी सकता है| Continue reading “समता रखो” »

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गुरुदेव को वन्दन

गुरुदेव को वन्दन
गुरु भगवंत को विधिपूर्वक वन्दन करता हूँ… नमस्कार करता हूँ… सत्कार करता हूँ… सम्मान करता हूँ… Continue reading “गुरुदेव को वन्दन” »

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इच्छाएं कम करो

इच्छाएं कम करो

अप्पिच्छे सुहरे सिया
जीवन का घट पल-पल खाली हो रहा है उसी के साथ मन की इच्छाओं को कम करना होगा…. हमारी सारी आवश्यकताएं तो प्रकृति स्वतः पूरी कर देती है…. जरूरतों की पूर्ति में तो कोई झंझट है ही नहीं| Continue reading “इच्छाएं कम करो” »

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रत्नत्रय

रत्नत्रय

सुदेव सुगुरु सुधर्म आदरु
जैन धर्म में देव, गुरु, धर्म का बड़ा ही महत्त्व है| देव वे होते हैं जो वीतराग बन चुके हैं| गुरु वे हैं जो वीतराग बनने की साधना करते हैं और आत्मा को वीतराग मार्ग पर ले जाने वाली साधना को धर्म कहते हैं| इन तीनों को रत्नत्रय कहते हैं| Continue reading “रत्नत्रय” »

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आलोचना का महत्त्व



जंबुदीपे जे हुंति पव्वया, ते चेव हुंति हेमस्स| दिज्जंति सत्तखित्ते न छुट्टए दिवसपच्छितं॥
जंबुदीवे जा हुज्ज वालुआ, ताउ हुंति रयणाइ| दिज्जंति सत्त खिते, न छुट्टए दिवसपच्छित्तं॥

जंबूद्वीप में जो मेरु वगैरह पर्वत हैं, वे सब सोने के बन जाये अथवा तो जंबूद्वीप में जो बालू है, वह सब रत्नमय बन जायें| वह सोना और रत्न यदि सात क्षेत्र में दान देवें, तो भी पापी जीव इतना शुद्ध नहीं बनता, जितना भावपूर्वक आलोचना करके प्रायश्‍चित वहनकर शुद्ध बनता है| Continue reading “आलोचना का महत्त्व” »

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कषाय-निग्रह

कषाय निग्रह

चत्तारि एए कसिणा कसाया
आत्मा को मलिन बनाने वाला तत्त्व कषाय है| क्रोध, मान, माया और लोभ ऐसे विकार हैं जो हमारी आत्मा को विकलांग बना रहे हैं| Continue reading “कषाय-निग्रह” »

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