
1. मृदु स्वभाव, सदा हँस कर बोलो|
2. माता-पिता, भाई-बहन, सास-ससुर, ननद-जेठानी आदि परिवार से प्रेम रखो|
3. परिश्रमी स्वभाव, कभी बेकार न रहना|
4. बड़ों की सेवा, उनका आदर, छोटों के प्रति स्नेह रखना| Continue reading “इन शब्दों को न भूलो” »

1. मृदु स्वभाव, सदा हँस कर बोलो|
2. माता-पिता, भाई-बहन, सास-ससुर, ननद-जेठानी आदि परिवार से प्रेम रखो|
3. परिश्रमी स्वभाव, कभी बेकार न रहना|
4. बड़ों की सेवा, उनका आदर, छोटों के प्रति स्नेह रखना| Continue reading “इन शब्दों को न भूलो” »

बच्चों से न अधिक लाड़ करें और न उन्हें मार-पीट कर धुतकारें| अधिक लाड़ प्यार से वे सर पर चड़ कर भविष्य में अपना जीवन बिगाड़, आपको दु:ख देंगे| Continue reading “बच्चों से व्यवहार कैसे करें ?” »

जबकि तुम निंदा, ईर्षा, छिद्रान्वेषण, चञ्चलता और मोह से बचकर प्रेम समभाव एवं सन्तोष से अपने मन को सुशिक्षित करोगे|
भय मनुष्य का भयंकर शत्रु है, इसकी जड़ को मन से निर्मूल कर दो, पतन की ओर ले जाने वाली चिंताओं को हृदय से सदा के लिए अलग कर दो| ध्वंसकारी विचार ही तुम्हें निर्बल और मुर्दा बनाते हैं| इससे न तो जीवन को नवीन प्रकाश मिलता है न नसों में नए रक्त का संचार होता है| रक्त संचार के अभाव में मनुष्य दीन हीन बन, असमय में युवावस्था से हाथ धो, अपनी शक्ल सूरत को बूढेपन में बदल देता हैं| Continue reading “दिव्य शक्ति जागृत कब होगी?” »

बच्चों को आरंभिक संभाषण का वरदान माता-पिता से ही प्राप्त होता है| बच्चे बड़ों की बात सुन कर ही, बहुत कुछ सीखते हैं| अतएव जब आप उनसे बात करें, उन्हें खिलौना न समझकर एक व्यक्ति समझे| बच्चों में तर्क बुद्धि नहीं होती| वे अपने बड़े बूढ़ों की बात को ही सच समझते हैं| सुनी सुनाई बातों पर वे विश्वास कर लेते हैं|
बच्चों से बातचीत करते समय उसकी समझ तथा जानकारी का ध्यान अवश्य रखें| छोटे वाक्य, सरल भाषा तथा परिचित विषय चुनने चाहिए| बच्चे आपकी बोल-चाल की भाषा ही समझ सकते हैं|
बच्चों से बात-चीत करते समय जोर जोर से हंसना, धमका कर या चिल्लाकर बोलना, हंसी मजाक में अशिष्ट गन्दे शब्दों का प्रयोग, हाथ-मुँह बनाकर बातें करना आदि ढंग बुरे हैं| बच्चे इन दुर्गुणों की झट नकल कर लेते है| बात-चीत में दोष आ जाने से बच्चों का व्यक्तित्व प्रभाव-हीन हो जाता है| जल्दी-जल्दी बोलना कुछ तकिया कलाम यथा-समझे न, ‘हां तो’, ‘क्या समझे’, बड़े आये, ठीक है बड़े अच्छे, ठा पड़ी, कई नाम जो, आदि निरर्थक शब्दों का प्रयोग बच्चे सुन सुन कर ही सीख जाते है| इसी प्रकार हाथ हिला-हिला बात करना, मुँह फुलाना, आँखे झपकाना, कचर-कचर जल्दी-जल्दी कतरनी सी जीभ चलाना आदि दोष भी बच्चों मे देखा-देखी ही आ जाते हैं| अत: बच्चों के साथ माता-पिता को बड़ी ही सावधानी से संभाषण करना चाहिए|

1. मेरे गर्भ में एक ऐसा जीवन पनप रहा है, जो कि महान् आत्मा होगा, उसके जीवन से लाखों का उपकार होगा, वह राष्ट्र और समाज का चमकता चांद होगा|
2. मेरी संतान गौर वर्ण, कमल नयन, अति सुन्दर, हृष्ट-पुष्ट, तेजस्वी और संयमी होगी| मेरा लाल आनन्दी, प्रसन्न मन और दृढ संकल्प का आदर्श नररत्न होगा| Continue reading “इच्छाशक्ति का मंत्र” »

स्त्री को साहित्य, विज्ञान और दर्शन जानने की उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी कि उसे सु-माता बनने की रीति जानने की| जिस जाति में सुमाताओं की संख्या अधिक है, वह जाति उतनी ही उत्तम और श्रेष्ठ है| मानव जीवन के निर्माण में माता का विशेष हाथ रहता है| मॉं का पुत्र पर क्या प्रभाव पड़ता है| यह जानना हो तो प्रसिद्ध महापुरुषों के जीवन चरित्र पढ़िये| Continue reading “प्रसव विज्ञान” »

कल्पसूत्र में सिद्धार्थ त्रिशला के जिस दोहृद (इच्छा) को पूर्ण न कर सके थे, उसे पूर्ण करने के लिए स्वयं इन्द्र महाराज को हार खाकर इन्द्राणी के कुण्डल देने पड़े थे|
आलसी और स्वार्थी मनुष्य केवल धन से अपना संरक्षण नहीं कर सकते हैं| उन्हें न यहां शांति मिलती है, न परलोक में|
मानव सुख की खोज करने चला है, पर मार्ग में भटक गया है| उसे अपने लक्ष्य का पता है, पर राह भूल गया है| मानव ने सुख देखा है पैसे में, उसके श्रम का केन्द्र हो गया है पैसा| आज मनुष्य पैसे के लिए अपनी मानवता बेंच रहा है|
भाई, भाई का नहीं, मॉं बेटी की नहीं, पिता पुत्र का नहीं, पति पत्नी का नहीं, मालिक मजदूर का नहीं, सेठ मुनिम के आपस में लड़ाई झगड़े, मन मुटाव का कारण है पैसा| कई क्रोधी निर्दयी मनुष्य मानवता को भूल एक दूसरे के प्राण तक ले लेते हैं| आज मानव को पैसे से जितना मोह है उतना मानव से नहीं| उसके दिल में प्रेम नहीं, पैसा है| क्योंकि उसने अपने सुख की खोज पैसे में की है| Continue reading “श्री गणधर भगवान की देशना” »

आत्मा में अपार शक्ति और अतुल बल है| इसका विकास और उपयोग करना भी एक कला है| इसका साधन है इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प|
यदि आप विश्वविख्यात मानव, लोकप्रिय नेता, प्रकाण्ड विद्वान और श्रीमंत बनना चाहते हैं, तो अपनी इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प को ठोस बनाएं| वर्ष में आठ हजार, छ: सौ चालीस घण्टे होते हैं| Continue reading “दृढ संकल्प का चमत्कार” »

सम्यक्त्व का अर्थ है, निर्मल दृष्टि, सच्ची श्रद्धा और सच्ची लगन| सम्यक्त्व ही मुक्ति-मार्ग की प्रथम सीढ़ी है| जब तक सम्यक्त्व नहीं है, तब तक समस्त ज्ञान और चारित्र मिथ्या है| जैसे अंक के बिना बिन्दुओं की लम्बी लकीर बना देने पर भी, उसका कोई अर्थ नहीं होता, उससे कोई संख्या तैयार नहीं होती, उसी प्रकार समकित के बिना ज्ञान और चारित्र का कोई उपयोग नहीं, वे शून्यवत् निष्फल है| अगर सम्यक्त्व रूपी अंक हो और उसके बाद ज्ञान और क्रिया (चारित्र) हो तो जैसे एक के अंक पर प्रत्येक शून्य से दस गुनी कीमत हो जाती है, वैसे ही ज्ञान और चारित्र-दान, शील, तप-जप आदि मोक्ष के साधक होते हैं| मुक्ति के लिये सम्यग्दर्शन की सर्वप्रथम अपेक्षा रहती है| Continue reading “आत्मा का स्वाभाविक धर्म – सम्यक्त्व” »