
आज कल करोड़ो रुपये और कई सालों का परिश्रम लगाने के बाद जिनालय तैयार होता है| जिनालय का पाषाण लाने के लिए बार बार जयपुर इत्यादि स्थानों पर दोड़-धूप चलती हैं| किन्तु बादमें जिस भगवान को बिराजित करना है, और जिस भगवान की प्रतिष्ठा मात्रसे इमारत ‘‘देरासर’’ या ‘‘जिनालय’’ के रूपमें पहचाना जाता है, उस भगवान को लोग एक झटके में कोई भी कारीगर से किसी भी तरह बनाये हुए खरीद लेते हैं, यह अनुचित है| Continue reading “महापूजा – साल का छट्ठा कर्तव्य” »
महापूजा – साल का छट्ठा कर्तव्य
क्षमा-प्रदान करते समय
सिकंदरने युद्धमें पौरस को हराकर बंदी बनाया| पौरसको सिकंदर के सामने लाया गया| तब सिकंदरने पौरस को कहा- ‘‘कहो ! आपके साथ कैसा व्यवहार करें?’’ तब पौरसने निर्भयता से कहा कि एक राजा का दूसरे राजा के साथ जैसा व्यवहार होना चाहिए, ठीक वैसा ही व्यवहार कीजिए| सिकंदर इस जवाब से प्रसन्न हो गया|
क्षमा-याचना करने वाली दोषित व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए ? इस प्रश्न का जवाब यह है कि स्वयंको दोषित समजनेवाला जिस तरह व्यवहार करता है, ठीक उसी तरह व्यवहार करना चाहिए| तात्पर्य यह है कि स्वयंको दोषित माननेवाला ही अन्य के दोषको मामूली समजकर सरलतासे, सहजतासे क्षमा प्रदान कर सकता है| Continue reading “क्षमा-प्रदान करते समय” »
क्षमा कैसे रखनी चाहिए?
महत्वपूर्ण बात यह है कि अनचाही-अप्रिय घटना घटें तब क्षमा कैसे रखें ? ऐसे समय पर क्षमा न रख सके और गुस्सा आ गया, मन बेकाबू हो गया और क्रोध में अंधा बनकर कुछ ऐसे गलत कदम उठा लिये कि जिससे होनेवाला नुकसान जीवनभरमें भरपाई न कर सकें और क्षमा मांगने-देने का मौका भी न आये| या तो क्षमा मांगने-देने पर भी वह नुकसान भरपाई न कर सके तो जीवनभर पछताना पड़ेगा|
इसलिए ही सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे प्रसंग पर क्रोध उत्पन्न ही न हो या तो उत्पन्न हुए क्रोध को निष्फल कर दो | क्योंकि क्रोध एक ऐसा पागलपन है कि क्रोधित व्यक्ति का हर कदम उसे नुकसान के मार्ग पर ही आगे ले जायेगा| Continue reading “क्षमा कैसे रखनी चाहिए?” »
साधर्मिक भक्ति – साल का दूसरा कर्तव्य

प्रभु के शासन में साधर्मिक के प्रति सद्भावका इतना महत्व है कि यह एक ही कर्तव्यको पर्युषणके पॉंच कर्तव्यों में और वार्षिक ग्यारह कर्तव्यों में यानी कि दोनोंमें स्थान प्राप्त हुआ है| श्री संभवनाथ भगवानने पूर्वके तृतीय भवमें साधर्मिक भक्ति करके तीर्थंकर बनने की भूमिका को प्राप्त की थी| Continue reading “साधर्मिक भक्ति – साल का दूसरा कर्तव्य” »
रात्रि जागरण – साल का सातवा कर्तव्य

जब कल्पसूत्र, प्रभुका पारणा इत्यादि घर पर लाते हैं, तब घर भी मानो मंदिर बन जाता है| उस समय प्रभुके मंगलगीत, भावना इत्यादिद्वारा रात्रि जागरण करना वह श्रावक का कर्तव्य है| व्यापार-धंधा, ढ.त. इत्यादि के लिए रात्रि में एक-दो बजे तक जागनेवाले प्रायः रोज रात को अधर्म जागरण करते हैं क्योंकि सतत अशुभ भावोमें रहते हैं| Continue reading “रात्रि जागरण – साल का सातवा कर्तव्य” »
संघपूजा – साल का पहला कर्तव्य

जैसे पर्युषण के पॉंच कर्तव्यों का पालन करना है, ठीक उसी तरह सालभर के ग्यारह कर्तव्य का भी यथाशक्ति पालन अवश्य करना चाहिए|
तह य जत्ततिगं|
जिणगिहण्हवणं जिणधणवुड्ढि
महपूअ (धम्म) जागरिआ॥
सुअपूआ उज्जवणं तहेव तित्थपभावणा सोही॥
सालभर में (१) संघपूजा (२) साधर्मिक भक्ति (३) यात्रात्रिक (४) स्नात्रपूजा (५) देवद्रव्यवृद्धि (६) महापूजा (७) धर्मजागरण (८) श्रुतपूजा (९) उद्यापन (१०) तीर्थप्रभावना और (११) प्रायश्चित्त….. ऐसे ग्यारह कर्तव्यों का पालन करना चाहिए| Continue reading “संघपूजा – साल का पहला कर्तव्य” »
तीर्थप्रभावना – साल का दसवां कर्तव्य

श्रावक की क्रिया, श्रावक के प्रत्येक अनुष्ठान, श्रावक का वेश, श्रावक की भाषा, श्रावक के आचार, दुनिया के साथ श्रावक का व्यवहार इत्यादि ऐसे होने चाहिए कि जिसे देखकर दूसरों को उस श्रावक पर और उसके द्वारा जैन धर्म प्रति अहोभाव हो जाए| नौकर को भी कौटुंबिक पुरुष समझना चाहिए और उसे भी सभी आराधना में जोडना चाहिए और धर्म करने के लिए अनुकूलता कर देनी चाहिए| इसतरह अजैन को जैन बनाएँ और जैनको यथार्थ जैन बनाएँ| Continue reading “तीर्थप्रभावना – साल का दसवां कर्तव्य” »
उद्यापन – साल का नौवां कर्तव्य

सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र के, जिनालय के, पढ़ाई के, सामायिक, पौषध आदि के और साधु-साध्वीजी भगवंत के उपकरण इत्यादिको तैयार करके उद्यापन करना चाहिए| संसार में परिभ्रमण करानेवाले साधन को अधिकरण कहते हैं और मोक्षमार्गमें सहायक बनने वाले साधन को उपकरण कहते हैं| कपड़े धोने का डंडा अधिकरण और साधुका दंड उपकरण| Continue reading “उद्यापन – साल का नौवां कर्तव्य” »
क्षमा-याचना – केवलज्ञान की सीढ़ी

जो व्यक्ति मृगावती या तो चंडरुद्राचार्य के शिष्य की तरह निर्विवाद क्षमा-याचना करते हैं, वे केवलज्ञान पाते हैं| धर्मसागर उपाध्याय की तरह छोटे-बड़े का भेद भूलकर क्षमा याचना करनेवाला सर्वत्र शांति और समाधि की सौरभ को फैला सकता है और संवत्सरी प्रतिक्रमण जैसी महान धर्मक्रिया को प्राणवन्त बना सकता है| Continue reading “क्षमा-याचना – केवलज्ञान की सीढ़ी” »
क्षमा – सच्चा अमृत

‘‘क्षमा’’ ही सच्चा अमृत है’’, इस बात को सभी विद्वानोंने मान्य कर दी| बस, संवत्सरी पर्व का आलंबन लेकर शक्कर – इलायची के पानी से भी अधिक मधुरतावाले क्षमामृत के प्याले ही भर भर के पीओ और पिलाओ| Continue reading “क्षमा – सच्चा अमृत” »










