
क्षमापना तो पर्वाधिराज के प्राणसमान हैं| जिस तरह हज़ार कि.मी. रेल की पटरी से एक इँच पटरी भी यदि तुट जाये, तो ट्रेन लुढ़क जाती है उसी तरह मनमें एक जीवके प्रति भी यदि द्वेष का अंश रह गया, तो आपकी आराधनाकी पूरी ट्रेन ही लुढ़क जायेगी| जिस तरह कारमें आगे देखनेवाला अकस्मात से बच जाता है, ठीक उसी तरह भूतकाल को भूलकर जो व्यक्ति भविष्यमें आगे बढ़ना चाहता है, वह ही दुर्गतिओंसे बच सकता है| Continue reading “क्षमापना – एक पर्वाधिराज” »
क्षमापना – एक पर्वाधिराज
क्षमा-याचना – आत्मा की शुद्धिकरण

पॉंच कर्तव्यों में मुख्य कर्तव्य है ‘‘क्षमा’’| और ग्यारह कर्तव्यों में मुख्य कर्तव्य है ‘आलोचना शुद्धि द्वारा आत्मशुद्धि’| ‘‘जीवोको माफ कर दो और आत्मा को साफ कर दो|’’ यह ही पर्वाधिराज पर्युषण का सूत्र है| इसलिए हम कमसे कम इन पर्वदिनों तक भी अपने मन के अहंकार को दूर किनार करके सालभरमें जिनके भी साथ कटु प्रसंग बने हैं उन सभी व्यक्ति के प्रति क्षमा-याचना करके ‘‘मिच्छामि दुक्कडम्’’ का कर्णमधुर हृदयस्पर्शी झंकार सुनाए तो उन को जो शाता और प्रसन्नता की अनुभूति होगी, उससे पुण्य का लाभ तो होगा ही किन्तु साथ साथ हमें भी ‘‘हम इतने तो सज्जन हुए’’ ऐसी भावना अपूर्व तुष्टि देने में निमित्त बनेगी| जी हलका होगा, मन उदार होगा और मुक्त मन के आनंद की अनुभूति होगी| ख्याल रखना ! अहम् और इस आनंद की बिलकुल नहीं पटती| हॉं! आनंद की किंमत ही है अहंत्याग… अभिमान का विसर्जन| Continue reading “क्षमा-याचना – आत्मा की शुद्धिकरण” »
श्रुतज्ञान की भक्ति – साल का आठवा कर्तव्य

सिर्फ क्रियासे हम देशआराधक बन सकते हैं, उस में यदि ज्ञान सम्मिलित हो जाए तब हम सर्वआराधक बन सकते हैं| ज्ञानरहित और ज्ञान सहित की क्रिया में जुगनूं और सूर्य का अंतर है| कर्मनिर्जरा के बारे में अज्ञानीके पूर्व करोड़ वर्ष की साधनासे ज्ञानी की श्वासोश्वास जितने समय में की हुई साधना बढ़ जाती है| अज्ञानी तामली तापसने ६० हजार साल तक छट्ठके पारणे छट्ठ किये थे और इक्कीस बार धोये हुए भात से ही पारणा करते थे| Continue reading “श्रुतज्ञान की भक्ति – साल का आठवा कर्तव्य” »
स्नात्र महोत्सव – साल का चौथा कर्तव्य

रोज तो सामान्य रूढ़िगत स्नात्र पढ़ाना चलता है| उसमें विधि पालन की उतनी दरकार नहीं होती| पर सालमें एकबार तो ५६ दिक्कुमारी और ६४ इन्द्रों समेत महामहोत्सव पूर्वक स्नात्र पढ़ाना चाहिये| Continue reading “स्नात्र महोत्सव – साल का चौथा कर्तव्य” »
क्रोध – एक अग्नि

एकबार आये हुए क्रोध में कितने सालों के तप और संयम को भस्मीभूत करने की ताकात है ? यदि कोई ऐसा प्रश्न करें, तो जवाब यह है कि- तप और संयम का उत्कृष्ट काल है देशोन पूर्व क्रोड वर्ष| इतने दीर्घ कालमें तप और संयम की जो साधना कर सकते हैं, उस साधना को भस्मीभूत करने की ताकत एकबार के आये हुए क्रोध में है| Continue reading “क्रोध – एक अग्नि” »
महापूजा – साल का छट्ठा कर्तव्य

आज कल करोड़ो रुपये और कई सालों का परिश्रम लगाने के बाद जिनालय तैयार होता है| जिनालय का पाषाण लाने के लिए बार बार जयपुर इत्यादि स्थानों पर दोड़-धूप चलती हैं| किन्तु बादमें जिस भगवान को बिराजित करना है, और जिस भगवान की प्रतिष्ठा मात्रसे इमारत ‘‘देरासर’’ या ‘‘जिनालय’’ के रूपमें पहचाना जाता है, उस भगवान को लोग एक झटके में कोई भी कारीगर से किसी भी तरह बनाये हुए खरीद लेते हैं, यह अनुचित है| Continue reading “महापूजा – साल का छट्ठा कर्तव्य” »
क्षमा-प्रदान करते समय
सिकंदरने युद्धमें पौरस को हराकर बंदी बनाया| पौरसको सिकंदर के सामने लाया गया| तब सिकंदरने पौरस को कहा- ‘‘कहो ! आपके साथ कैसा व्यवहार करें?’’ तब पौरसने निर्भयता से कहा कि एक राजा का दूसरे राजा के साथ जैसा व्यवहार होना चाहिए, ठीक वैसा ही व्यवहार कीजिए| सिकंदर इस जवाब से प्रसन्न हो गया|
क्षमा-याचना करने वाली दोषित व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए ? इस प्रश्न का जवाब यह है कि स्वयंको दोषित समजनेवाला जिस तरह व्यवहार करता है, ठीक उसी तरह व्यवहार करना चाहिए| तात्पर्य यह है कि स्वयंको दोषित माननेवाला ही अन्य के दोषको मामूली समजकर सरलतासे, सहजतासे क्षमा प्रदान कर सकता है| Continue reading “क्षमा-प्रदान करते समय” »
क्षमा कैसे रखनी चाहिए?
महत्वपूर्ण बात यह है कि अनचाही-अप्रिय घटना घटें तब क्षमा कैसे रखें ? ऐसे समय पर क्षमा न रख सके और गुस्सा आ गया, मन बेकाबू हो गया और क्रोध में अंधा बनकर कुछ ऐसे गलत कदम उठा लिये कि जिससे होनेवाला नुकसान जीवनभरमें भरपाई न कर सकें और क्षमा मांगने-देने का मौका भी न आये| या तो क्षमा मांगने-देने पर भी वह नुकसान भरपाई न कर सके तो जीवनभर पछताना पड़ेगा|
इसलिए ही सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे प्रसंग पर क्रोध उत्पन्न ही न हो या तो उत्पन्न हुए क्रोध को निष्फल कर दो | क्योंकि क्रोध एक ऐसा पागलपन है कि क्रोधित व्यक्ति का हर कदम उसे नुकसान के मार्ग पर ही आगे ले जायेगा| Continue reading “क्षमा कैसे रखनी चाहिए?” »
साधर्मिक भक्ति – साल का दूसरा कर्तव्य

प्रभु के शासन में साधर्मिक के प्रति सद्भावका इतना महत्व है कि यह एक ही कर्तव्यको पर्युषणके पॉंच कर्तव्यों में और वार्षिक ग्यारह कर्तव्यों में यानी कि दोनोंमें स्थान प्राप्त हुआ है| श्री संभवनाथ भगवानने पूर्वके तृतीय भवमें साधर्मिक भक्ति करके तीर्थंकर बनने की भूमिका को प्राप्त की थी| Continue reading “साधर्मिक भक्ति – साल का दूसरा कर्तव्य” »
रात्रि जागरण – साल का सातवा कर्तव्य

जब कल्पसूत्र, प्रभुका पारणा इत्यादि घर पर लाते हैं, तब घर भी मानो मंदिर बन जाता है| उस समय प्रभुके मंगलगीत, भावना इत्यादिद्वारा रात्रि जागरण करना वह श्रावक का कर्तव्य है| व्यापार-धंधा, ढ.त. इत्यादि के लिए रात्रि में एक-दो बजे तक जागनेवाले प्रायः रोज रात को अधर्म जागरण करते हैं क्योंकि सतत अशुभ भावोमें रहते हैं| Continue reading “रात्रि जागरण – साल का सातवा कर्तव्य” »










