1 0 Tag Archives: जैन सिद्धांत
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डिट्टा का भाग्य

डिट्टा का भाग्य
एक गॉंव में एक आदमी रहता था| उसे लोग डिट्टा कहकर बुलाते थे| वह कुछ भी पढ़ा लिखा नहीं था, इसलिए बेकार था| Continue reading “डिट्टा का भाग्य” »

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जीव विचार – गाथा 6

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पुष्प समान जीवन मिले

पुष्प समान जीवन मिले
गुरुजनों का प्रदेश… अर्थात गुर्जर देश… पिया के घर जाती हुई एक नयी नवेली दुल्हन ने… गरवी गुजरात के राष्ट्रसंत श्री रविशंकर महाराज से चरण स्पर्श कर आशिष मॉंगा…| Continue reading “पुष्प समान जीवन मिले” »

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आनंद की साधना

आनंद की साधना

आज्ञा तु निर्मलं चित्तं कर्त्तव्यं स्फटिकोपमम्
एक व्यक्ति ने एक अबोध शिशु को घास पर खेलते देखा| वह बहुत आनंदित था| Continue reading “आनंद की साधना” »

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समय का सदुपयोग

समय का सदुपयोग

कालेण काले विहरेज्जा
जो क्षण बीत गया है उसकी चिन्ता मत करो और जो समय हाथ में है उसका जागृति पूर्वक सदुपयोग कर लो| Continue reading “समय का सदुपयोग” »

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कमलश्री कुत्ती, बंदरी बनी

कमलश्री कुत्ती, बंदरी बनी
शिवभूति और वसुभूति दो भाई थे| शिवभूति की स्त्री कमलश्री अपने देवर वसुभूति के प्रति राग वाली बनी और उसने मोहवश अनुचित याचना की| भाभी के ऐसे अनुचित वचनों को सुनकर वसुभूति विचार करने लगा कि-‘‘ओह ! धिक्कार हो कामवासना को, जो ऐसी अनुचित याचना करवाती है| मुझे तो, किसी भी हालत में कामाधीन नहीं होना है|’’ इस प्रकार वैराग्य उत्पन्न होने पर उसने दीक्षा ग्रहण कर ली| यह बात कमलश्री तक पहुँची| राग के उदय से आर्तध्यान में रहती हुई वह मानसिक और वाचिक पाप की आलोचना लिए बिना ही शुनी (कुत्ती) के रूप में उत्पन्न हुई| Continue reading “कमलश्री कुत्ती, बंदरी बनी” »

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ज्ञान की रोशनी

ज्ञान की रोशनी

नमो नमो नाणदिवायरस्स
ज्ञान की रोशनी में मेरा जीवन-पथ आलोकित हो…ज्ञान को रोशनी से मार्ग के कॉंटें दृष्टिगोचर हो…मुझे अब भीतर जाना है| Continue reading “ज्ञान की रोशनी” »

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अंजनासुन्दरी

अंजनासुन्दरी
एक राजा की दो पत्नियॉं थी| लक्ष्मीवती और कनकोदरी| लक्ष्मीवती रानी ने अरिहंत-परमात्मा की रत्नजड़ित मूर्त्ति बनवाकर अपने गृहचैत्य में उसकी स्थापना की| वह उसकी पूजा-भक्ति में सदा तल्लीन रहने लगी| उसकी भक्ति की सर्वत्र प्रशंसा होने लगी| ‘‘धन्य है रानी लक्ष्मीवती को, दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय|’’ यह रानी तो सुख में भी प्रभु सुमिरन करती हैंै, धन्य है !!’ Continue reading “अंजनासुन्दरी” »

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जीवन का निर्माण

जीवन का निर्माण
जन्म का प्रारम्भ तो सभी का एक जैसा होता है लेकिन अन्त एक जैसा नहीं होता| सुबह तो सभी की एक सी है पर शाम भिन्न-भिन्न है| Continue reading “जीवन का निर्माण” »

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पर्युषण महापर्व – कर्तव्य पॉंचवॉं

पर्युषण महापर्व   कर्तव्य पॉंचवॉं

कर्तव्य पॉंचवॉं – चैत्यपरिपाटी

जब अन्य जीव अपना अस्तित्व बनाएँ रखने के लिए प्रयत्नशील हैं, तब मनुष्य अपने व्यक्तित्व को खिलाने-विकसित करने एवं सहेजने-संवरने के लिए दौड़ रहा है| सचमुच तो परमात्मारूप करुणासागरमें गंगाकी तरह घुलकर अस्तित्व और व्यक्तित्व दोनों को विलीन कर देना है| Continue reading “पर्युषण महापर्व – कर्तव्य पॉंचवॉं” »

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