1 0 Tag Archives: जैन सिद्धांत
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जयणा हमारी माता

जयणा हमारी माता
अष्टप्रवचन माता यदि साधु की माता है, तो जयणा श्रावक की माता है| जयणा याने जीवरक्षा के प्रति सावधानी|

हमारे चारों तरफ विशाल जीवसृष्टि बिखरी हुई है| आँगन में बिल्लीयॉं हैं तो, गलियों में कुत्ते फिरते हैं| रसोई घर में झिंगुर है तो, शयनकक्ष में खटमल हैं| बिलो में चूहे रहते हैं तो, कहीं चींटियों के दर हैं| बालों में जूं है, छत व दिवारों पर पक्षियों के घोंसले है तो कहीं मकड़ी के जाले हैं| फर्नीचर व दीवार पर दीमक फैली हुई है| चारों तरफ मच्छर उड़ रहे हैं| नल में से आ रहे पानी में असंख्य त्रस जीव हैं| अनाज मे लट वगैरह है, तो साग-सब्जी में भी कई जीव, लट वगैरह मिलते हैं| Continue reading “जयणा हमारी माता” »

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निगोद को पहचानें

निगोद को पहचानें
(चार्तुास) वर्षा ऋतु में घर के कम्पाऊंड में, पुरानी दीवारों पर अथवा मकान की छत (अगासी) पर हरी, काली, कत्थई आदि रंगों की काई (सेवाल-लील) जम जाती है| उसी को निगोद कहते हैं| Continue reading “निगोद को पहचानें” »

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जैन साधु के विशिष्ट नियम

जैन साधु के विशिष्ट नियम

१) भयंकर गर्मी की ऋतु में प्यास लगने पर भी रात्रि में पानी नहीं पीते|

२) वे काष्ट, लकड़ी, मिट्टी के पात्र ही उपयोग में लेते हैं| स्टील या अन्य धातु के बर्तन काम में नहीं लेते|

३) वे चार महीने तक, वर्षावास में एक स्थान पर स्थिर रहते हैं और शेष समय जिनाज्ञा अनुसार परिभ्रमण करते हैं| Continue reading “जैन साधु के विशिष्ट नियम” »

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जीव विचार – गाथा 5

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मुक्त मन से दो

मुक्त मन से दो

परोपकाराय सतां विभूतयः
जो तुम्हारे पास है उसे दूसरों को देने में तु स्वतंत्र हो अतः जब देने का अवसर हो तो मुक्त मन से देना सीखो| यह चिन्तन मेरे मन में सदा रहे कि मेरे पास जो कुछ है वह मैं दूसरों को पहुँचाऊँ…..प्रकृति ने हमें देने के लिए समय, समझ, सामग्री और सामर्थ्य दिया है उसे दूसरो के हित में लगा देना चाहिए|

इसके लिए हम इतने पुण्यशाली बनें कि जो मेरे पास है वह मैं दूसरों को उदारता से दूँ| सृष्टि का एक नियम है जो दिया जाता है वही लौटता है जो हम दे सकते हैं उसे ईानदारी से देते रहना चाहिए|

जीवन में जिसने बॉंटा उसी ने पाया और जिसने संभाला उसी ने गँवाया अतः जब देना ही है तो शत्रु हो या मित्र सभी को समान रूप से दो| कितना भी दे दोगे तो भी खजाने में कुछ कमी नहीं आएगी|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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शीशा

शीशा

ईश्‍वर ने हमें केवल एक चेहरा दिया है और दूसरा हम स्वयं बना लेते हैं

नीना बड़ी गुस्सैल और बदमिजाज लड़की थी| अक्सर नीना की मॉं उसे ऐसी आदतों से छुटकारा पाने के लिए समझाती; पर नीना थी कि उस पर किसी बात का असर ही नहीं होता था| Continue reading “शीशा” »

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जीने की विधि

जीने की विधि

पक्षं कञ्चन नाश्रयेत्
या तो अकेले ही जीने की कला सीख लेनी चाहिए या फिर सहजीवन – समूहजीवन जीने का तरीका समझ लेना चाहिए| Continue reading “जीने की विधि” »

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पर्युषण महापर्व – कर्तव्य पहला

पर्युषण महापर्व   कर्तव्य पहला

“कर्तव्य पहला – अमारि प्रवर्तन”

धर्मका मूल दया है -

दया धर्मका मूल है, पापमूल अभिमान,
तुलसी दया न छोड़ीये, जब लग घटमें प्राण||

जब दया जीवनकर्तव्य है, तब पर्युषण का तो महाकर्तव्य बनता ही है| इसे प्रथम नंबर का कर्तव्य समझना, क्योंकि दयासे अपना हृदय मृदु-कोमल बनता है और कोमल हृदयमें दूसरे सभी धर्म अच्छी तरह से बास कर सकते हैं| भूमि को जोतकर मुलायम बनायी हो, तो ही उसमें बीज को बोया जा सकता है| इसलिए यहॉं पर्युषणमें दया-अमारि प्रवर्तन का पहला कर्तव्य पालन करके हृदयको कोमल-मुलायम सा बनाना है, जिससे उसमें साधर्मिक भक्ति, क्षमापना, त्याग, तपश्चर्यादि धर्मो को बोया जा सके| Continue reading “पर्युषण महापर्व – कर्तव्य पहला” »

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पृथ्वीकाय की जयणा

पृथ्वीकाय की जयणा
मिट्टी, पत्थर, खनिज, धातुयें, रत्न इ. पृथ्वीकाय के शरीर हैं| गम- नागमन से, वाहन-व्यवहार से, अन्य शस्त्र संस्कार इत्यादि से पृथ्वीकाय अचित्त बनते हैं| जीवन व्यवहार में निरर्थक सचित्त पृथ्वीकाय की विराधना (हिंसा) न हो जाये उसकी सावधानी रखनी चाहिए| Continue reading “पृथ्वीकाय की जयणा” »

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आज भी प्रायश्चित्त विधि है

आज भी प्रायश्चित्त विधि है
यदि कोई आत्मा कहती है कि आज इस काल में प्रायश्‍चित्त नहीं है, प्रायश्‍चित्त देने वाले नहीं है, इस प्रकार बोलने वाली आत्मा दीर्घसंसारी बनती है, क्योंकि नौवें पूर्व की तृतीय वस्तु में से उद्धृत आचार कल्प, व्यवहार सूत्र आदि प्रायश्‍चित्त के ग्रंथ एवं वैसे गंभीर गुरुवर आज भी विद्यमान हैं|

गुरुदेव से शुद्ध आलोचना लेने पर अपनी आत्मा हल्की हो जाती है, जैसे माथे से भार उतारने के पश्‍चात् भारवाहक स्वमस्तक अत्यंत हल्का महसूस करता है| वंदित्तु सूत्र में कहा है कि -

कयपावो वि मणुस्सो आलोइय निंदिय गुरुसगासे|
होई अइरेगलहुओ ओहरिय भरुव्व भारवहो
Continue reading “आज भी प्रायश्चित्त विधि है” »

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