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दोहृद (दोहला) का फल

दोहृद (दोहला) का फल
कल्पसूत्र में सिद्धार्थ त्रिशला के जिस दोहृद (इच्छा) को पूर्ण न कर सके थे, उसे पूर्ण करने के लिए स्वयं इन्द्र महाराज को हार खाकर इन्द्राणी के कुण्डल देने पड़े थे|

कर्मणा-चोदितं जन्तोर्भवितव्यं पुनर्भवेत्|
यथा तथा दैवयोगा-द्दोहृदं जनयेत् हृदि
पूर्व जन्म के कर्मानुसार गर्भ में जैसा बालक-बालिकाओं का भवितव्य होता है, उसी प्रकार गर्भवती स्त्री को दोहृद (दोहला) इच्छा जागृत होती है|

गर्भवती स्त्री को यदि किसी राजा के दर्शन की इच्छा हो तो वह धनवान, महान् भाग्यशाली पुत्र को जन्म देती है| उसे प्रसूति के समय प्राय: कष्ट नहीं होता है|

गर्भवती स्त्री की सेवा भक्ति करने की, सिंहासन पर बैठकर राज्य-शासन करने की, तीर्थयात्रा, धार्मिक उत्सव महोत्सव आदि की आकांक्षा (दोहला) जागृत हो तो वह स्त्री कुलदीपक-शासन प्रभावक संतान को जन्म देती है|

विशेष :- श्री जैनागम-श्री भगवती सूत्र, स्थानांग सूत्र, तन्दूल वेयालिय एवं श्री अभिधान राजेन्द्र कोष भाग ३ पृ.८३९ आदि ग्रन्थों में गर्भ स्थिति, संरक्षण, अंगोपाग आहारादि का मननीय विस्तृत वर्णन है| जिज्ञासु गण गुरु मुख से श्रवण कर अथवा स्वयं पढ़ कर लाभ लें|

पंडित राज वाग्भट्ट का अभिप्राय है कि गर्भ स्थिति के नव में मास में प्रसूतिगृह की और दाई की व्यवस्था बड़ी सावधानी से करना आवश्यक है|

1. प्रसूतिगृह में स्वच्छ वायु और प्रकाश के लिए मार्ग खिड़कियां होनी चाहिए|

2. प्रसूतिगृह के आस-पास गन्दी और विषैली गैस (वायु) उत्पन्न करने वाली वस्तुए न हों| मकान में अधिक शीत न हो|

3. प्रसूतिगृह में रहने वाली स्त्रियां स्वस्थ हों एवं उनके वस्त्र स्वच्छ धुले हों तथा उन्हें चाहिए कि वे प्रत्येक काम मनोयोग और स्वच्छता से करें|

4. प्रसूता और नव-जात शिशु की सेवा में सु-योग्य सेवाभावी दाई रखें| अज्ञान, स्वच्छन्द रोगीष्ट और सनकी दाईयों से काम न लें|

सौभाग्यसुन्दरी और रुपसुन्दरी दोनों रानियॉं वृद्ध महिलाओं के मार्गदर्शन के अनुसार ही आचरण करती थी|

प्रतिहारी-बहिन आज तुम घर न जाना| राजमाताएं कुछ अस्वस्थ हैं| दासी-हॉं, बहिन ! कुछ ऐसा ही ज्ञात होता है| आज सुबह से उन्हें कष्ट और घबराहट मालूम हो रही है| भाग्य की कसौटी पर कौन नहीं कसा जाता, उस पर विरला ही खरा उतरता है| यह तो मानना पड़ेगा कि सच-मुच दोनों रानियों ने प्रसव-विज्ञान के नियमों का ठीक तरह से आचरण किया है| संभव है वे आज ही सकुशल सफल हो जाएं|

मालिन-सच हे बहिन ! वास्तव में यह कड़ी परीक्षा का समय है| देखो कल की बात है| मेरी पडोसन मरते मरते बची| भगवान ने ही उसके नन्हें नन्हें बच्चों की लाज रखी| अभी भी उसका जीवन संकट में है| प्रधान-वैद्या बहिनजी कहती थी कि इस अभागिन ने अपना मुंह वश में न रखा ! गर्भावस्था में कंकर, पत्थर, कोलसे, राख, मिट्टी और खट्टे नमकीन रुक्ष पदार्थ खा खाकर अनर्थ कर डाला; प्रकृति के विरुद्धाचरण कर मरणासन्न कष्ट को आमंत्रित किया| रसना (जिह्वा) की लोलुपता का ही यह परिणाम हुआ कि बच्चे को काट काट कर बाहिर निकालना पड़ा| यदि विदुषी वैद्या का समय पर सहारा नहीं मिलता तो सारे शरीर में विष फैल जाता| जहां सर्वत्र विष व्याप्त हुआ कि फिर शेष क्या था ? निश्चित ही मृत्यु|

कंचुकी-सम्राट् अंत:पुर में पधार रहे हैं| दोनों रानियां अपने वस्त्रों को सम्भाल कर बोली-पधारें|

दोनों रानियों की निर्बलता देख, प्रजापाल ने कहा – देवियों ! लेटी रहो ! कष्ट न करो ! फिर भी दिवार का सहारा ले पलंग से नीचे उतरकर विनम्र शब्दों में बोली आर्यपुत्र ! सु-स्वागतम् ! अशक्ति से दोनों के भाल पर पसीने की बिन्दु मोती सी चमक रही थी, आंखो में मादकता, ललाई थी| उनके मन्द स्वर में वह आकर्षण, ममता थी, जिसे श्रवण कर महाराज प्रजापाल मन्त्रमुग्ध हो गए| इस दृश्य ने राजा के हृदय में स्फूर्ति और नवजीवन का संचार कर दिया| उन्हें अब पूर्ण विश्‍वास हो गया कि वे शीघ्र ही सम्राट् होने के साथ पिता होने का भी गौरव प्राप्त करेंगे| साथ ही दोनों महारानियां जनता द्वारा आरोपित बांजपन के कलंक से मुक्त हो मॉं कहलायेगी|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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