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दुःख और तृष्णा

दुःख और तृष्णा

दुक्खं हयं जस्स न होइ मोहो,
मोहो हओ जस्स न होइ तण्हा

जिसमें मोह नहीं होता, उसका दुःख नष्ट हो जाता है और जिसमें तृष्णा नहीं होती उसका मोह नष्ट हो जाता है

तृष्णा बड़े-बड़े धैर्यशालियों के भी छक्के छुड़ा देती है – आँख वालों को भी अन्धा बना देती है, अन्धेरी रात में आँखवालों को जिस प्रकार पास में पड़ी हुई वस्तु भी दिखाई नहीं देती, उसी प्रकार तृष्णाग्रस्त व्यक्ति को अपने पास रही हुई सम्पत्ति भी दिखाई नहीं देती और वह अधिक से अधिक सम्पत्ति पाने की कोशिश में लगा रहता है – जीवन भर घानी के बैल की तरह परिश्रम करता रहता है|

तृष्णा के कारण प्राप्त वस्तुओं पर उसकी ममता भी विस्तृत होती जाती है| ममता या मोह के बन्धन से वही मुक्त हो सकता है, जिसकी तृष्णा नष्ट हो गई हो|

ज्ञानी जानते हैं कि मोह का बन्धन ही दुःख का एक मात्र महान कारण है; इसलिए वे उस बन्धन से छूटने का उपदेश दिया करते हैं| इस प्रकार यदि हमें दुःख से बचने की इच्छा हो तो हम मोह का बन्धन छोड़ दें और यदि हम मोह का बन्धन छोड़ने के लिए उत्सुक हों तो तृष्णा का त्याग करें – यही हमारे लिए श्रेयस्कर है|

- उत्तराध्ययन सूत्र 32/8

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