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लाभ और लोभ

लाभ और लोभ

जहा लाहो तहा लोहो, लाहा लोहो पवड्ढइ

ज्यों-ज्यों लाभ होता है, त्यों त्यों लोभ होता है और लाभ से लोभ बढ़ता रहता है

स्वार्थ-सिद्धि के लिए प्रत्येक संसारी जीव निरन्तर प्रयत्न करता रहता है| इस प्रयत्न में कभी उसे सफलता प्राप्त होती है और कभी विफलता|

सफलता से उत्साह बढ़ता है और विफलता से वह नष्ट हो जाता है| यदि निरन्तर सफलता मिलती रहे; तो व्यक्ति का निरन्तर उत्साह भी बढ़ता रहेगा और वह वैसे ही कार्य करता रहेगा|

एक डाकू को जब अपने डाके में सफलता मिलती है अर्थात् माल भी हाथ आ जाता है और कोई उसे पकड़ भी नहीं पाता, तब वह उससे प्रेरित होकर निरन्तर एक के बाद एक डाका डालने लगता है और धीरे-धीरे बहुत बड़ा कुख्यात डाकू बन जाता है| ऐसा क्यों होता है ?

ज्ञानियों ने इसका कारण बताते हुए कहा है कि लाभ और लोभ का घनिष्ट सम्बन्ध है| जहॉं लाभ होता है, वहीं लोभ होता है और ज्यों-ज्यों किसी को लाभ होता रहता है, त्यों-त्यों उसके लोभ की मात्रा भी बढ़ती रहती है| यदि लाभ नहीं होता तो लोभ भी नहीं बढ़ता|

- उत्तराध्ययन सूत्र 8/17

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