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उत्तम तप

उत्तम तप

तवेसु वा उत्तमं बंभचेरं

ब्रह्मचर्य तपों में उत्तम है

परमार्थ के लिए या आत्मकल्याण के लिए जो विविध कष्टों में सहिष्णुता का परिचय दिया जाता है, वही तपस्या है| शास्त्रों में दो प्रकार की तपस्या का वर्णन आता है – बाह्य तप और अभ्यन्तर तप| अनशन, ऊनोदरी, वृत्तिसंक्षेप, रसपरित्याग, कायक्लेश और प्रतिसंलीनता – ये छः बाह्यतप हैं और प्रायश्‍चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, ध्यान एवं कायोत्सर्ग ये छः अभ्यन्तर तप| साधक दोनों प्रकार के तप करता है|

भूख, प्यास, शीत, उष्णता आदि बाईस परीषहों में भी सहिष्णुता की आवश्यकता होती है| इनमें स्त्री के लिए पुरुष और पुरुष के लिए स्त्री को भी एक परीषह माना गया है| स्त्री या पुरुष के प्रति वासनात्मक दृष्टि से मन को आकृष्ट न होने देना ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना है| जो ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता है; वह ब्रह्मचारी है – उत्तम तपस्वी है; क्यों कि ज्ञानियों ने ब्रह्मचर्य को भी उत्तम तप माना है!

- सूत्रकृतांग सूत्र 1/6/23

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