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विनय का नाशक

विनय का नाशक

माणो विणयणासणो

मान विनय का नाशक है

यहॉं मान का अर्थ-अभिमान है, सन्मान नहीं| जिस प्रकार क्रोध और प्रेम एक-साथ नहीं रह सकते; उसी प्रकार अभिमान और विनय भी एक साथ नहीं रह सकते|

जिस समय मनुष्य घमण्ड करता है, उस समय उसके मित्रता, कोमलता, नम्रता आदि गुण नष्ट हो जाते हैं| अपने को वह सबसे बड़ा आदमी समझने लगता है और जो व्यक्ति अपने को बड़ा समझ लेता है, वह अपनी प्रशंसा ही सुनना चाहता है, निन्दा नहीं| अपनी निन्दा या आलोचना करनेवाले व्यक्ति को वह अपना शत्रु मान लेता है – उससे द्वेष करता है और उसे जान से मार डालने को तत्पर हो जाता है|

घमण्डी व्यक्ति सदा चापलूसों से घिरा रहता है| चापलूस लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए झूठी प्रशंसा के पुल बॉंधा करते हैं| इससे उनका घमण्ड दिन दूना रात चौगुना बढ़ता रहता है|

घमण्डी व्यक्ति कभी अपनी उन्नति नहीं कर सकता; क्यों कि जो अपने को पूर्ण मान लेता है; वह भला अपने विकास के लिए प्रयत्नशील कैसे हो सकता है| विकास तो विनय से ही सम्भव है| विनीत अभिमानी नहीं बनता| वह जानता है कि मान विनय का नाशक है|

- दशवैकालिक सूत्र 8/38

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1 Comment

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  1. Dilip Parekh
    दिसम्बर 7, 2016 #

    मान यानि अभिमान से विनय का नाश होता है| अभिमान से पाप होता है.
    // पाप मूल अभिमान // ॐ

    विनय यानि नम्रता. विनय यानि स्विकारात्मकता. विनय यानि सरलता. विनय यानि लचीलापन. ‘मैं’पना से छुटकारा. विनय से विद्या प्राप्ति. बिना विनय कभी श्रेय पंथ नहीं मिलता. //ॐ//

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