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साधु-सम्पर्क

साधु सम्पर्क

कुज्जा साहूहिं संथवं

साधुओं से सम्पर्क रखना चाहिये

संस्तव का अर्थ है – परिचय, सम्पर्क या संगति|

संगति पूरे जीवन को प्रभावित करती है| वह उन्नति के द्वार खोल देती है| एक कीट – कितना साधारण जीवन होता है उसका? परन्तु फूलों के साथ रहकर भगवान की मूर्ति के सिरपर जा पहुँचता है वह| एक छोटी नदी या नाला गंगा के साथ मिलकर कहॉं जा पहुँचता है? रत्नाकर समुद्र में|

इसके विपरीत कुसंगति अवनति के द्वार खोलती है| बुरे लोगों के साथ रहने से व्यक्ति दुर्गुणों को अपनाने लगता है – दुर्व्यसनों में रमने लगता है – उसका सर्वतोमुखी पतन प्रारम्भ हो जाता है|

हम यदि दुष्टों की निन्दा करते हैं और सज्जनों की प्रशंसा तो हमें क्यों न दुष्टों से दूर रहकर सज्जनों के समीप रहने का निर्णय करना चाहिये? सज्जनों की संगति से जीवन सद्गुणमय बन सकेगा; परन्तु साधुओं की संगति से वह वैराग्यमय, निःस्वार्थ, परम शान्त, तेजस्वी और सुखी बन सकेगा|

अतः सज्जनों की संगति से भी साधुओं की संगति को अधिक श्रेष्ठ माना गया है| यदि हम अपने जीवन को उन्नति के चरम शिखर तक ले जाना चाहते हैं तो हमें साधुओं से सम्पर्क रखना चाहिये|

- दशवैकालिक सूत्र 8/53

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