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सत्य में धैर्य

सत्य में धैर्य

सच्चम्मि धिइं कुव्वह

सत्य में धृति करो-स्थिर रहो

सत्य क्या है? यह जानने के लिए सत्पुरुषों की जीवनी देखनी चाहिये| उनका चाहे जैसा आचरण रहा हो, हमारे लिए भी वही आचरणीय है| सत्पुरुषों का मार्ग ही सन्मार्ग है और सन्मार्ग पर चलनेवाले ही सत्पुरुष हैं| सत्पुरुषों के आचरण को सदाचार कहते हैं|

सत्पुरुष रागद्वेष से रहित होते हैं – हमें भी रागद्वेष के त्याग का प्रयास करना चाहिये| सत्पुरुष दयालु होते हैं – परोपकारी होते हैं; तो हमें भी दया और परोपकार को अपनाना चाहिये| यही बात उनके अन्य सद्गुणों के विषय में भी कही जा सकती है; क्यों कि उनके सभी सद्गुण ग्रहण करने योग्य होते हैं|

परन्तु सत्य के मार्गपर चलनेवालों को उसका पवित्र फल या उत्तम लाभ शीघ्र नहीं मिलता और मार्ग में अनेक बाधाएँ भी आती रहती हैं, जिनमें धीरज रखना आवश्यक हो जाता है| तभी प्राणियों को आत्मकल्याण के लिए प्रेरित करते हुए ज्ञानियों ने कहा है – सत्य में स्थिर रहो – डटे रहो| सदाचार का सुफल पाने के लिए आवश्यक है – सत्य में धैर्य|

- आचारांग सूत्र 1/3/2

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