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एकज्ञ-सर्वज्ञ

एकज्ञ सर्वज्ञ

जे एगं जाणइ से सव्वं जाणइ|
जे सव्वं जाणइ से एगं जाणइ||

जो एक को जानता है, वह सबको जानता है और जो सबको जानता है, वह एक को जानता है

जिसे एक (आत्मा) का ज्ञान है, उसे सब (अनात्म पदार्थों) का ज्ञान है और जिसे सब (अजीव तत्त्वों) का ज्ञान है, उसे एक (आत्मतत्त्व) का ज्ञान है|

जिसे आत्मस्वरूप का सम्यग्ज्ञान हो जाता है, वह अनात्मतत्त्वों में रमण नहीं करता; क्यों कि वह आत्मभि पदार्थों के स्वरूप को – उनकी क्षणिकताको भी जान लेता है|

इसी प्रकार जो जड़-पदार्थों के स्वभाव को समझ लेता है, वह उनसे भि चिदानन्दमय आत्मतत्त्व में ही रमण करता है – सब अन्य पदार्थों को जानने के बाद वह एक आत्मतत्त्व को जानता है और उसीको स्वीकार करता है|

दार्शनिक भाषा में कही गई इस अद्भुत बात का यही रहस्य है कि हमें आत्मस्वरूप को भलीभॉंति समझने का सबसे पहले प्रयास करना चाहिये ? क्यों कि जो एकज्ञ है, वही सर्वज्ञ है और जो सर्वज्ञ है, वही एकज्ञ|

- आचारांग सूत्र 1/3/4

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2 Comments

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  1. mahesh badani
    मार्च 1, 2016 #

    I like very much Jain Tatvagyan

  2. mahesh badani
    मार्च 1, 2016 #

    I like Jain Tattva Gyan

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