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उच्च नीच गोत्र

उच्च नीच गोत्र

से असइं उच्चागोए, असइं नीआगोए,
नो हीणे नो इहरित्ते

यह जीव अनेक बार उच्च गोत्रमें और अनेक बार नीच गोत्र में जन्म ले चुका है; परन्तु इससे न कोई हीन होता है, न महान|

उच्च गोत्र में पैदा होने से व्यक्ति अपने को महान समझ बैठता है और नीच गोत्र में पैदा होने से अपने को हीन या तुच्छ समझने लगता है; परन्तु ये दोनों ही बातें भ्रमपूर्ण हैं, क्यों कि व्यक्ति अनेक बार उच्च नीच गोत्रों में जन्म ले चुका है| इसलिए उच्च गोत्र में पैदा होने पर उसे अभिमान नहीं करना चाहिये और नीच गोत्र में पैदा होने पर अपने को दीन या हीन नहीं समझना चाहिये|

महत्ता का उच्च गोत्र से कोई सम्बन्ध नहीं है| मनुष्य महान बनता है – पवित्र कार्यों से – सदाचार से और नीच बनता है – अपवित्र कार्यों से – दुराचार से | इस प्रकार उसका आचरण ही वास्तव में उसकी उच्चता या नीचता को निर्धारित करनेवाला निर्णायक है| कौन नहीं जानता कि उच्च गोत्रीय रावण, कंस, दुर्योधन आदि निन्दनीय हैं और नीच गोत्रीय मेतार्य और हरिकेशी मुनि वन्दनीय है! तब क्या महत्त्व रखते हैं – ये उच्च नीच गोत्र?

- आचारांग सूत्र 1/2/3

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