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अभिनंदन जिन! दरिसण तरसीए

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श्री अभिनंदन जिन स्तवन
राग : धन्यासिरि-सिंधुओ – “आज निहेजो रे दीसे नाईलो रे…’’ ए देशी

अभिनंदन जिन! दरिसण तरसीए,
दरिसण दुरलभ देव;
मत मत भेदे रे जो जई पूछीए,
सहु थापे अहमेव.

…अभिनंदन.१

सामान्ये करी दरिसण दोहिलुं,
निरणय सकल विशेष;
मदमें घेर्यो रे अंधो किम करे,
रवि-शशि-रूप विलेख.

….अभिनंदन.२

हेतु-विवादे हो चित्त धरी जोईए,
अति दुरगम नयवाद;
आगमवादे हो गुरुगम को नहीं,
ए सबळो विषवाद.

…अभिनंदन.३

घाती डूंगर आडा अति घणा,
तुज दरिसण जगनाथ;
धीठाई करी मारग संचरुं,
सेंगू कोई न साथ.

…अभिनंदन.४

दरिसण दरिसण रटतो जो फिरुं,
तो रणरोझ समान;
जेहने पिपासा हो अमृतपाननी,
किम भांजे विषपान.

…अभिनंदन.५

तरस न आवे हो मरणजीवन तणो,
सीजे जो दरिसण काज;
दरिसण दुरलभ सुलभ कृपा थकी,
’आनंदघन’ महाराज.

…अभिनंदन.६

अर्थ

गाथा १:-
हे अभिनंदन प्रभु! आपके दर्शन प्राप्त करने की तीव्र इच्छाने मेरे अंतर को बेचैन किया है| आपके दर्शन की तृषा मेरे हृदयमें जागी है, परंतु देवाधीदेव का दर्शन प्राप्त होना बहुत ही दुष्कर है| विभिन्न बातों का अनुसरण करनेवाले, विभिन्न धर्मो का आचरण करनेवाले विबुध जनॉं के पास जाकर मैं उन्हें परमात्मा के दर्शन के लिए उपाय पूछता हूँ, तो सब एक ही बात कहते है, बस हमारे पास आ जाओ! हम ही परमात्मा हैं|

गाथा २:-
सामान्यतः भगवान का दर्शन होना बहुत ही दुष्कर है, तो फिर सर्व प्रकार के तत्वों के निर्णय करने के पश्चात प्राप्त होनेवाला विशेष दर्शन विशेष दुर्लभ होता है. यह तो निःसंदेह सत्य है| मद के प्रभाव से पीडित व्यक्ति सूर्य एवं चंद्र के बिंब को ही देखने के लिए असमर्थ होता है, तो फिर वह उनके स्वरुप का विश्‍लेषण किस प्रकार कर सकता है?

गाथा ३:-
तर्क में मन पिरोकर उनकी सहायता के प्रभु के दर्शन करने जाएं, तो विभिन्न दृष्टिबुंदुओंसे, विभिन्न दृष्टीकोनों से उत्पन्न विभिन्न नयवाद एवं आभीप्रायों के कारण, प्रत्येक मंतव्य का रहस्य ज्ञात नहीं होने के कारण अत्यंत जटिल समस्याओं का सामना करना पडता है| आगमवाद के सहायता दर्शन करने जाते, किसी गुरु की सहाय अब तक प्राप्त नहीं हुई है| दर्शनप्राप्ती के मार्ग में यह भी एक प्रचंड विपत्ति है|

गाथा ४:-
(प्रभु दर्शन प्राप्ती में आनेवाले अनेक विघ्नो का वर्णन करते हुए
श्री आनंदधनजी महाराज कहते हैं|) हे जगत के नाथ आपके दर्शन के आड, आत्मा के गुणो का घात करनेवाले घाती कर्मरुप अनेक अनेक पर्वत है, ऐसी विपरीत स्थिति होते हुए भी- आपके दर्शन की मेरी तृषा तृप्त करने के लिए मैं हठपूर्वक, साहस कर अकेला ही चलने का प्रयास करूं, तो भी मेरे साथ चलनेवालें गुरुरुप मार्गदर्शक की अभी मुझे प्राप्ति नहीं हुई है, यह भी एक मुश्किल है|

गाथा ५:-
हे प्रभु अदि मैं दर्शन-दर्शन ये शब्द रटते रटते घूमने लाग जाऊं तो लोग मुझे तिरस्करणीय वन्य पशुमान बैठेंगे| अत ऐसा करना भी ठीक नहीं है| अमृत पीने की लालसा जिसे है ऐसा मानव विषपान कदापि करता नहीं है, इसलिए हे जिनराज संसार के समस्त सुख आत्मा के लिए विषपान से भी अधिक घातक होने के कारण मैं आपके दर्शन के लिए तृषार्त हूँ|

गाथा ६:-
यदि आपके दर्शन प्राप्त करनें का कार्य सिद्घ हो जाए तो फिर जीवनमरण की तृषा सदा के लिए शांत हो जाएगी, यद्यपि आपके दर्शन दुर्लभ हैं, फिर भी आनंद के धनरुप हे महाराजा! यदि आपकी कृपा हो जाए तो यह अति दुर्लभ कार्य अति सुलभ हो जाएगा| अतः आप कृपा करें मैं भी स्वंय को आपकी कृपा प्राप्त करने के लिए सुपात्र बनाने के लिए प्रयास कर रहा हूं|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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2 Comments

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  1. N.J. Shah
    अक्टूबर 23, 2012 #

    This stavan is not fully uploaded.

  2. Pramod Jain
    अक्टूबर 23, 2012 #

    Excellent Work…. Team.

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