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क्षमा-याचना – आत्मा की शुद्धिकरण

क्षमा याचना   आत्मा की शुद्धिकरण
पॉंच कर्तव्यों में मुख्य कर्तव्य है ‘‘क्षमा’’| और ग्यारह कर्तव्यों में मुख्य कर्तव्य है ‘आलोचना शुद्धि द्वारा आत्मशुद्धि’| ‘‘जीवोको माफ कर दो और आत्मा को साफ कर दो|’’ यह ही पर्वाधिराज पर्युषण का सूत्र है| इसलिए हम कमसे कम इन पर्वदिनों तक भी अपने मन के अहंकार को दूर किनार करके सालभरमें जिनके भी साथ कटु प्रसंग बने हैं उन सभी व्यक्ति के प्रति क्षमा-याचना करके ‘‘मिच्छामि दुक्कडम्’’ का कर्णमधुर हृदयस्पर्शी झंकार सुनाए तो उन को जो शाता और प्रसन्नता की अनुभूति होगी, उससे पुण्य का लाभ तो होगा ही किन्तु साथ साथ हमें भी ‘‘हम इतने तो सज्जन हुए’’ ऐसी भावना अपूर्व तुष्टि देने में निमित्त बनेगी| जी हलका होगा, मन उदार होगा और मुक्त मन के आनंद की अनुभूति होगी| ख्याल रखना ! अहम् और इस आनंद की बिलकुल नहीं पटती| हॉं! आनंद की किंमत ही है अहंत्याग… अभिमान का विसर्जन|

हमारा अन्यके प्रति दुर्व्यवहार का प्रायश्चित तब ही प्रमाणित होगा कि जब हम सच्चे दिलसे अन्य के प्रति क्षमा-याचना करें| हमारा पश्चाताप और हमारा प्रायश्चित, हमने अपने आप तैयार किया हुआ माफीपत्रक है| उसमें अन्य को दिया हुआ मिच्छामि दुक्कडं, हमारी सही है| हृदय के सच्चे भावों की राजमुद्रा यदि उस पर मुद्रित हो गई, तो समझना कि हमारा माफीपत्र स्वीकार हो गया है और अब हम आजसे अपराधमुक्त होकर गुणयुक्त बनेंगे| इसलिए पर्युषणके दिन यानी ऐसे सुंदर कार्य के लिए भावपत्र को तैयार करने के दिन| और संवत्सरी पर्वका दिन यानी उस भावपत्र पर सही-सिक्का करने का, राजमुद्रा लगाने का श्रेष्ठ दिन|

क्षमा याचना   आत्मा की शुद्धिकरण
राजकुमारमें से चौर-लुटेरा बना हुआ वंकचूल गुरुदेव के सत्संगसे कुछ धर्मबुद्धिवाला बन गया था| उसने गुरुदेव समक्ष मामूली लगे ऐसे चार नियम ग्रहण किये थे | उसमें एक नियम था, ‘‘रानी को माता समान मानना’’| एकबार वंकचूल राजमहलमें चोरी करने गया तब राजासे रुठी हुई रानीने वंकचूल के पास अघटित याचना की| किन्तु नियममें निश्चल रहने वाले वंकचूलने रानी की मॉंगका स्वीकार नहीं किया| तब क्रोधित होकर रानीने हो हल्ला मचाकर उसे पकड़वाकर कैद कर दिया| दूसरे दिन वंकचूल को सभामें राजा समक्ष उपस्थित किया गया| रात्रि की घटना को राजाने प्रत्यक्ष देखी-सुनी थी| इसलिए वंकचूल को बहुमानपूर्वक बंधनमुक्त करके राजाने वंकचूल से रात्रि की घटना के बारे में पूछताछ की| तब वंकचूलने रानी के कोई भी दोष-अपराध को व्यक्त किये बिना एक ही बात पर जोर दिया कि मैं चोरी करने के लिए ही आया था, इसलिए चोर के रूपमें मुझे देखकर रानी चीखने लगी और मैं पकडा गया| राजा के बार बार पूछने पर भी वंकचूलने यह एक ही जवाब दिया | वंकचूल की ऐसी महानता से तुष्ट होकर राजाने वंकचूल को पुत्रवत् स्वीकार कर के सेनाधिपति बना दिया| राजा जब रानी को फॉंसी की सजा देने चला, तब वंकचूलने राजा को रोककर कहा कि, ‘‘यह तो मेरी माता है, ‘पुत्र को इनाम और माता को सजा’, ऐसी बात का स्वीकार कौन सुपुत्र करेगा?’’ और रानी को फॉंसी से माफी दिलाई|

वंकचूल के मनमें रानी के अपराध के प्रति जरा सा भी रोष नहीं था, क्योंकि उसका गणित यह है कि चोरी करने आना वह मेरा सबसे बड़ा अपराध है, उस के अंतर्गत जो कुछ प्रसंग बने वे सभी प्रसंग मेरे अपराध के अंतर्गत ही माने जाएँगे| इसलिए रानी दोषित है ही नहीं और जिसे मैंने माता समान माना है उसके दोष कैसे देख सकता हूँ ?

बस, यह ही उपशम अमृतरस की कमाल है, जिसकी प्राप्ति सिर्फ स्वयं के दोष ही दिखाई दे तब होती है| खुद भगवान महावीरस्वामीने भी ऐसा ही विचार किया था कि, ‘‘मुझे पाकर लोग संसारदुःखसे मुक्त हो जायेंगे और यह बेचारा संगम मेरे निमित्तसे ही संसारमें दुःखी दुःखी बन जाएगा’’ इस तरह संगम के अपराध पर भी स्वयं को ही निमित्तभूत मानने से संगम के अपराध दिखे ही नहीं और इसलिए ही संगम के प्रति करुणा से परमात्मा की आँखे भर आई|

यह ही उपशमभाव की कमाई और आनंदोत्सव की मेजवानी है| सदा प्रसन्नता और मस्तीमें रहने के लिए यह बात ही मजेकी है कि अन्य की भूल को देखना ही नहीं| पर उसके लिए अन्य के प्रति हृदयमें ठसाठस भरा प्रेमभाव जरुरी है| वात्सल्य भाव आने पर अपराधी को क्षमा-प्रदान करने का मन होता है, मैत्रीभाव आने पर दूसरों की भूल को सहन करना सहज बन जाता है| लेकिन पूर्णप्रेमभाव प्रकट होने पर तो अन्य की गलतियॉं ही दिखाई नहीं देती|

कंपनी के नये सेल्समेनने सीनियर सेल्समेन को फरियाद करते हुए कहा, ‘‘यह सेल्समेन की जोब भारी त्रासदायक है| जहॉं वहॉं अपमान सहने का कडुआ अनुभव होता है|’’ सीनियर सेल्समेनने कहा – ‘‘अरे ! क्या बात करते हो ! कभी हमारा अपमान होता ही नहीं हैं|’’ नये सेल्समेनने पूछा, ‘‘आश्चर्य की बात है ! आप किस तरह काम करते हो कि आपको अपमान का अनुभव ही नहीं होता ?’’ सीनियरने कहा- ‘‘मेरा ४० साल का अनुभव है| मुझे तो कभी अपमान का अनुभव ही नहीं हुआ| हॉं, कभी बार बार बेल बजाने पर भी कोई दरवाज़ा न खोले ऐसा होता है| कोई मेरी बात सुने बिना ही दरवाजा बंद कर दे ऐसा भी होता है| कभी कभी ऐसा भी होता है कि कोई दो-चार अपशब्द सुना दे तो कभी कभी कोई धक्का मार के बाहर भी निकाल देते हैं, परंतु यह सब तो व्यवसाय का ही हिस्सा है, इसलिए ऐसा चलते रहता है| इन बातोंको कोई वजूद नहीं देना चाहिए और उसे अपमान समझने की भूल मत करना !’’
नया सेल्समेन तो सुनकर दंग रह गया ! स्वयं जिसमें अपमान समझ रहा था, उसमें सीनियर सेल्समेन को तो कुछ महत्व का या दमदार नहीं लगता| सेल्समेन के व्यवसायमें तो ऐसा चलता ही रहे, उसमें अपमान नहीं मानना चाहिए ! मानो तो अपमान, नहीं तो व्यवसाय का ही एक हिस्सा ! कोई भी अप्रिय घटना को सरलतासे स्वीकारने की कैसी अद्भुत चाबी !

क्षमा याचना   आत्मा की शुद्धिकरण
एक दंपतीने शादी के दिन एक-दूसरे को एक डायरी भेंट दी और कहा ‘‘हमें दिनभर में एक दूसरे की जो खामियॉं दिखाई दे, उसे डायरी में नोट करेंगे| सालके अंतमें डायरी की अदलाबदली करेंगे | बादमें उसे पढ़कर अपनी भूलों को सुधारने का प्रयत्न करेंगे|’’
साल के अंतमें पतिने अपनी डायरी पत्नी को दे दी और पत्नीने अपनी डायरी पति को दे दी| पत्नीकी डायरीमें कहीं कहीं पतिकी खामियॉं की नोट थी, फिरभी टिप्पणमें लिखा था कि ‘‘ये कोई ऐसी खामियॉं नहीं हैं कि जो असह्य हो|’’ पतिने उन भूलों को सुधारने की प्रतिज्ञा की| पत्नीने पति की ओर से दी हुई डायरी को हाथमें लेकर देखा तो पूरी डायरीमें कुछ नहीं लिखा था, सिर्फ अंतिम पन्नेमें इतना ही लिखा था कि; ‘‘ओ मेरे हृदयकी रानी ! ढूंढने पर भी तेरी एक भी गलती मेरी नजरमें नहीं आयी, अतः मुझे माफ करना !’’ और उसी समय पत्नी की अक्कल पर से परदा हटा कि, प्रेम की लड़ाई में पति जीत गये और मैं हार गई| अपने जीवनसाथी की भूलों को देखना यही सबसे बडी खामी है, जो मुझमें है लेकीन मेरे पति में नहीं है| यह सोचते उसकी आँखो से अश्रुधारा बहने लगी|

बात यह है कि आपको यदि उपशम अमृतरस का पान करके सदा मस्त रहना है, तो पावन पर्वाधिराज की उपासना ऐसे शुभ भावसे करें कि अपने हृदयमें सबके प्रति स्नेह का सागर उमड़ पडे| अपनी आँखोमें सभी के लिए प्रेम के फँवारे प्रकट होंगे तब कल्याण का मार्ग हाथभर ही है|

आर्य प्रभवस्वामी के दो शिष्य शय्यंभव ब्राह्मण के यज्ञमंडपमें गये| वहॉं गाली सुननी पडी, धक्के खाने पडे, तिरस्कृत हुए| इतना ही नहीं गोचरी भी नहीं मिली| फिर भी दोनों शिष्य प्रसन्न थे ! क्यों ? बस यही विचार होगा कि गुरुदेवने हमे शय्यंभव ब्राह्मण को ‘‘अहो कष्टम् अहो कष्टम् तत्त्वं न ज्ञायते परम्’’ सूत्र सुनाने का कार्य सोंपा है| कार्य के अंतर्गत जो कुछ भी होता है, वह तो कार्य का एक हिस्सा ही माना जाता है| उसमें अपमान मानकर लिये हुए काम का त्याग नहीं करना चाहिए|

जिस तरह रोटी को तैयार करने के कार्य के अंतर्गत ही – आटा छानना, आटा गूँधना, लोई तैयार करना, रोटी बेलना, रोटी को तवे पर चढ़ाना, रोटी को उलट-पुलट करना ये सभी कार्य गिनाये जाते हैं| इसलिए आटेसे हाथ बिगडना, आटा छानते या रोटी बेलते हाथ को श्रम लगना, चुल्हे या गेस की गरमी सहना या फिर गरम गरम रोटी और तवे से हाथ का जलना….. ये सब फरियाद के कारण नहीं माने जाते हैं| रोटी बनाने के अंतर्गत गिने जाते हैं| उस कार्य में फरियाद करनेवाला रोटी नहीं बना सकता| बस उसी तरह सर्वत्र समझना चाहिए| इसलिए ही आर्य प्रभवस्वामी के दो शिष्य दुनिया की दृष्टि से दिखनेवाले ऐसे अपमान और तिरस्कार के बीच भी स्वस्थ रहकर शय्यंभव को सूत्र सुनाने का गुरुनिर्दिष्ट कार्य स्वस्थतापूर्वक पूर्ण कर सके|

कनुने पुलिस चौकी में मनु के लिए फरियाद की ‘‘मनुने मुझे थप्पड लगाई’’ पुलिसने कहा- ‘‘तब आप क्या कर रहे थे ?’’ कनुने कहा, ‘‘मैं तो बिलकुल शांतिसे उसकी जेब काट रहा था !’’ आप ही कहो ! कनु शांत था ! मात्र जेब ही काटता था ! मनु अशांत था ! थप्पड मारता था ! हमारी फरियाद भी ठीक कनु जैसी ही है| जैसे जेबकतरें को थप्पड लगाने की फरियाद करनेका अधिकार नहीं है| उसी तरह बात-बातमें दूसरों का मानभंग करना, बात काटना, रुठ जाना, नमक-मिर्च लगाकर खरी-खोटी सुनाने वाले हम अन्य की फरियाद करते हैं, तब ठीक कनु जैसा ही अनुचित कार्य करते हैं |

क्षमा याचना   आत्मा की शुद्धिकरण
नेमिनाथ भगवान का जीव प्रथम भवमें चित्रगति नामक श्रावक था| चित्रगति को धर्मगुरु का मिलाप करानेवाले राजकुमार सुमित्र बादमें दीक्षा लेकर ध्यान कर रहे थे| तब सुमित्र के भाई, जिसको सुमित्र पर अत्यंत द्वेष था, उसने ध्यानस्थ सुमित्र को अपना निशान बनाकर तीर छोड़ा| सुमित्र मुनि घायल हुए और अंतिम समय आ पहुँचा, तब ऐसे शुभ विचार करने लगे कि- अरे ! भाई तो कैसा परमार्थी है ! स्वयं नरक का स्वीकार करके मुझे स्वर्गमें भेज रहा है! और समाधि सहज हो गई|

हॉं, योग्य आत्मदलवाले जीवो पर उपसर्ग करनेवालों के लिए मजाकमें ऐसा कह सकते हैं कि वे तो तीर्थंकर से भी अधिक परोपकारी हैं ! तीर्थंकर तो स्वयं पार उतरके बाद अन्य को संसारसमुद्र पार कराते हैं, जब कि उपसर्ग करनेवाले तो स्वयं डूबकर अन्य को तारने के लिए सज्ज हुए हैं| अहो ! कैसी परमार्थबुद्धि !

मूल बात यह है कि, आपने प्रारंभ किये कार्यके अंतर्गत जो कुछ भी बात बने उसे उस कार्यका एक हिस्सा ही समझना चाहिए| आगे बढ़कर ऐसा स्वीकार कर लो की वह मेरे कर्मक्षयमें सहायक है ! उसमें अपमान मानना ही नहीं है| अपमान मानोंगे तो दुःखी होना पड़ेगा| जब कि नहीं मानने पर कोई प्रश्न ही नहीं है| क्योंकि मान-अपमानआदि अनुभूतिका मूल आधार अन्य का व्यवहार नहीं, बल्कि आपकी मान्यता है|

एक महात्माको दहकता बुखार आया था| फिर भी उनके मुख पर अजब सी प्रसन्नता छाई हुई थी| एक भाईने ऐसे बुखारमें भी इतनी प्रसन्नता का कारण पूछा, तब महात्माने कहा, ‘‘भाई ! मैं दुश्मन के दुःख को देखकर द्रवित होनेवाला महापुरुष नहीं हूँ| मैं तो बिलकुल मामूली इंसान जैसा हूँ| मैं तो दुश्मन को दुःखी देखकर खुशी मनानेवाला तुच्छ हूँ|’’ उस भाईने कहा, ‘‘यहॉं दुश्मन की तो बात ही कहॉं है ? मैं तो बुखार में भी आपकी सामान्य से ज्यादा प्रसन्नता का कारण पूछ रहा हूँ|’’ तब महात्माने कहा, ‘‘मैं भी आपके प्रश्न का ही प्रत्युत्तर दे रहा हूँ| यह शरीर अनेकविध असंयम का कारण है, इसलिए ज्ञाताधर्मकथा में विजयचोर के दृष्टान्तसे शरीर को आत्मा का शत्रु माना गया है| अब यह दुश्मन यदि बुखार से परेशान हो जाए तो मेरे जैसे सामान्य मानव को तो आनंद ही होगा न ? दुश्मन को दुःखी देखकर मेरे जैसा तुच्छ मानव प्रसन्न ही रहेगा न ?’’

यह है क्षमाभाव को आत्मसात् करनेकी चाबी|

इस तरह आज हमने तीन कर्तव्य को देखा-समझा|….. शेष बादमें….|
‘‘जिनवाणी से विरुद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामि दुक्कडम्’’

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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1 Comment

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  1. Sovan
    सितम्बर 16, 2012 #

    EXCELLENT ARTICLE !

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