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गुरुदेवश्री का आश्‍वासन

गुरुदेवश्री का आश्‍वासन
अरे पुण्यशाली मानव! तू वास्तव में धन्यवाद का पात्र है| पाप हो जाना, कोई आश्‍चर्य नहीं है| मोहनीय कर्म के उदय से किसने कौन-से पाप नहीं किये? क्या मोह ने तीर्थंकर की आत्मा को भी छोड़ा है? क्या उन्होंने अपने पूर्व जीवन में भयंकर पाप नहीं किये? क्या उन पापों से उन्हें सातवी नरक तक नहीं जाना पड़ा? परंतु जीवन की काली-श्याम किताब को धोकर तुझे उज्जवल बनने का मनोरथ हुआ हैं| अतः तू धन्यवाद का पात्र है| तू तो काली किताब का एक-एक पन्ना खोलकर कालिमा को धो रहा है| अतः तू विशेष रूप से धन्यवाद का पात्र है| बालक जैसी सरलता से एक एक पाप निष्कपट भाव से प्रगट कर दे| अरे! आत्मा पर से झिड़क दे इन पापों को|

हे भाग्यवंत! तेरे द्वारा सरलतापूर्वक हो रही आलोचना से तेरे प्रति मेरे हृदय में वात्सल्य का सागर उछल रहा है, क्योंकि शास्त्रों में कहा है कि आलोचना लेनेवाला ही वास्तव में आराधक है| हृदय रुपी गंदी गटर में आराधना का इत्र डालने से क्या सुगंध आ सकती है? नहीं| पाप, शल्य व दोष तो मुर्दे के समान हैं| मुर्दे पर कितने ही ङ्गूल चढ़ाये जायें, थोड़ी देर के लिए सुगंध आती रहेगी, परंतु अन्दर तो बदबू बढ़ती ही रहेगी| पाप शल्य व दोषों की आलोचना न लेने से थोड़ी देर के लिए आनंद आ सकता है, परंतु भावों की अभिवृद्धि तो मुर्दे की तरह दोषों को आत्मा में से बाहर ङ्गेंकने से ही होगी| तूने आज मेरे सामने हृदय खोलकर आलोचना कही, जिससे तेरा हृदय साङ्ग हो गया है, अब तेरा जीवन आराधना की सुगंध से महक उठेगा| अतः तू आज धन्यवाद का पात्र है, परन्तु याद रखना, भूलना मत| एक भी पाप को कहने में गलती मत करना, शरम मत रखना| हृदय में एक भी शल्य मत रखना| तूं वास्तव में भारहीन हो जायेगा| तेरा सिर हल्का हो जायेगा| तेरा हृदय स्वच्छ हो जायेगा| सिर पर से सारा बोझ उतर जायेगा|

हे देवानुप्रिय! तेरी आलोचना सुनकर मैं तो तेरी पीठ थपथपाता हुआ धन्यवाद दे रहा हूँ| वस्तुतः तूने अद्भुत पराक्रम किया है| खूब हिम्मत रखकर पापशल्यों को जड़मूल से उखाड़ ङ्गेंके हैं| अद्भुत साधना की है, अभ्यंतर तप का आस्वाद लिया है| किन शब्दों में तेरे पुरुषार्थ की प्रशंसा करूँ? मुझे ऐसे शब्द ही नहीं मिल रहे हैं| अरे! मेरा शब्दकोष भी वामन हो गया है! अब दिल में एक भी पापरूपी कॉंटा मत रखना, अन्यथा जैसे अश्‍वपालक के घोड़े के पैर में कॉंटा लग गया था और अश्‍वपालकने कॉंटा नहीं निकाला, जिससे पैर में मवाद भर गई और अंत में संपूर्ण पैर कटवाना पड़ा, उसी प्रकार तू भी अंदर पाप रखकर घा़ेडे की तरह दुःखी मत होना| तू अंदर किसी भी प्रकार की शर्म मत रखना| मुझ पर दृढ़ विश्‍वास रखना| जो तूने आलोचना कही है, वह किसी के भी कान तक नहीं जायेगी| मैं मरुँगा, तो मेरे साथ ही आयेगी| उसे मैं हृदय रुपी कब्र्रिस्तान में गाड़ चुका हूँ| ज्यादा क्या कहूँ? आलोचना का प्रायश्‍चित देने का अधिकार उसीको है, जो अपरिश्रावी होता हैं अर्थात् आलोचना सुननेवाला और प्रायश्‍चित देनेवाला ऐसा व्यक्ति होता है, जिसके हृदय से वह बात कभी बाहर न निकले|

प्रायश्‍चित देनेवाला गुरु पत्थर के घड़े जैसा होता हैं| जिसमें से एक बूंद भी बाहर न निकल पाये| अतः तू कोई काल्पनिक भय या लज्जा मत रखना| शास्त्रों में ऐसे-ऐसे दृष्टांत आते हैं कि माता और पुत्र, पति-पत्नी जैसे पाप करने वाले जीव आलोचना से शुद्ध हो गये, पति-पत्नी बनकर पाप से भारी बने हुए भाई-बहिन आलोचना के द्वारा शुद्ध हो गये| अरे! उसी भव में केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष में पहुँच गए|

अरे पुण्यशाली आत्मा ! तू मेरी एक बात सुन ले| महानिशीथ सूत्र में कहा है कि आलोचना लेने के भाव का भी एक ऐसा महाप्रभाव हैं कि आलोचना सुनाते-सुनाते कितने ही महापुरुषों ने केवलज्ञान प्राप्त कर लिया| अमुक आत्माओं ने तो आलोचना शुद्धि का इतना प्रायश्‍चित आया हैं, इतना सुनते ही केवलज्ञान प्राप्त कर लिया| आये हुए प्रायश्‍चित को वहन करते-करते कितने ही आत्माओं ने केवलज्ञान प्राप्त कर लिया| ज्यादा तो क्या कहूँ? आलोचना सरलतापूर्वक कह देने की तीव्र उत्कण्ठा से उठकर भवोदधितारक गुरुदेवश्री के पास जाते-जाते बीच में ही कितने ही भव्यात्माओं ने केवलज्ञान प्राप्त कर लिया|

धन्य हो उन महापुरुषों को! धन्य हो उनकी शुद्ध बनने की उत्कंठा को! तू भी ऐसा ही महापुरुष भविष्य में बनेगा| अरे महात्मन्! तू भी अनेक जीवों का तारणहार बनेगा, क्योंकि तूने अपनी आत्म-भूमिका शुद्ध बना ली हैं| अब यह मुख्य रूप से ध्यान रखना कि सद्गुरु का योग मिलने के पश्‍चात शुद्ध आलोचना न कही, तो रूक्मिणी आदि के समान अनेक भावी जीवन बिगड़ जाएंगे| तू ऐसा मत मानना कि ‘‘गुरुदेवश्री मुझे हल्का मानेंगे| अरर! बाहर से इतना धर्मी दिख़ने वाला मानव अंदर से कितना श्याम!’’ क्योंकि शास्त्रों के जानकार गुरुदेवश्री ने तो शास्त्र और अनुभव के बल पर तुझ से भी अनेक गुने पापात्माओं का जीवन जाना हैंै| वे इस तथ्य को समझे हुए हैं कि पाप करने वाला खराब होने पर भी पाप की आलोचना लेने वाला महान आराधक हैं| पापभीरु आत्मा ही आलोचना लेने के लिए तैयार होती हैं| पापभीरुता यह तो आत्मा का गुण हैं| ऐसे गुणवाले के प्रति धिक्कार आ जाए, तो प्रमोदभाव चला जाए

एवं अपेक्षा से साधुता को खोकर गुरुदेवश्री कहलानेवाली आत्मा मिथ्यात्व में पहुँच जाये| अतः ऐसे विचार भी गुरुदेवश्री स्वयं के दिल में कभी आने नहीं देते| इसलिए तू निःसंकोच होकर आलोचना कह देना, जिससे शुद्ध होकर शीघ्र मोक्ष का भोक्ता हो जाएगा| आलोचना कहनी एक सुकृत हैं| सुकृत करनेवाले को गुरुदेवश्री कभी ङ्गटकारते नहीं, ङ्गटकारे तो सुकृत की अनुमोदना खत्म होकर गुुरुदेव को भी अनेक भव करने पड़ते हैं|

रूक्मिणी आदि के उदाहरण जानकर अरे महामानव! तू दिल में तिलतुषमात्र भी पाप मत रखना| तू महान आराधक बनेगा| इसमें कोई संदेह नहीं है|

अरे आराधक आत्मा! पापरूपी अपराध जैसा किया हो, वैसा ही कह देना| जरा-सा भी संकोच मत रखना| कई बार जान बुझकर पाप किया हो, तो कई बार अनजान में भी किया हो, किसी समय किसी की प्रेरणा से भी किया हो, तो किसी समय जबरदस्ती से भी किया हो, कई बार धर्मस्थानों में भी किया हो, कई बार होटलादि में किया हो, कई बार दिन में किया हो, कई बार रात में, कई बार रागभाव से किया हो, अतः उसे करने में आनन्द भी आया हो, कई बार अनिच्छा से या द्वेष से भी करना पड़ा हो, यह सब सरल भाव से कह देना| कहने की हिम्मत न हो अथवा याद न रहे, तो लिख देना| लिखने के पश्‍चात् ३-४ बार पढ़ लेना| बार-बार याद करके विस्तारपूर्वक लिखने में जरा-सा भी भय रखना मत| शास्त्रों में कहा है कि यकायक, अज्ञान, भय, दबाव, व्यसन, संकट, मूढ़ता व रागद्वेष से जो भी अकार्य किया हो, वह सरलता से मायारहित और अहंकाररहित कह देना चाहिए|

सहसा अण्णाणेण व भीएण व पिल्लिएण वा|
वसेणायंकेण व मूढेण व रागदोसेहिं॥
जं किंचि कयमकज्जं उज्जुयं भणई|
तं तह आलोएज्जा मायामयविप्पमुक्को॥
अरे जीव! तू गुनाह करने से डरा नहीं, तो अब आलोचना के समय क्यों डरता है? पाप करते समय शर्म नहीं रखी, तो ङ्गिर प्रायश्‍चित के समय क्यों शर्म रखता है? अरे आत्मन्| आलोचना और प्रायश्‍चित तो आत्मा के भवोभव सुधार देते हैं| अरे केवलज्ञान तक पहुँचा देते हैं| महान समाधि की ओर ले जाते हैं|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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