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श्री गणधर भगवान की देशना

 श्री गणधर भगवान की देशना

वित्तेन ताणं न लभे पमत्ते,
इमम्मि अदुवा परत्था|

प्रिय महानुभावो !

आलसी और स्वार्थी मनुष्य केवल धन से अपना संरक्षण नहीं कर सकते हैं| उन्हें न यहां शांति मिलती है, न परलोक में|

मानव सुख की खोज करने चला है, पर मार्ग में भटक गया है| उसे अपने लक्ष्य का पता है, पर राह भूल गया है| मानव ने सुख देखा है पैसे में, उसके श्रम का केन्द्र हो गया है पैसा| आज मनुष्य पैसे के लिए अपनी मानवता बेंच रहा है|
भाई, भाई का नहीं, मॉं बेटी की नहीं, पिता पुत्र का नहीं, पति पत्नी का नहीं, मालिक मजदूर का नहीं, सेठ मुनिम के आपस में लड़ाई झगड़े, मन मुटाव का कारण है पैसा| कई क्रोधी निर्दयी मनुष्य मानवता को भूल एक दूसरे के प्राण तक ले लेते हैं| आज मानव को पैसे से जितना मोह है उतना मानव से नहीं| उसके दिल में प्रेम नहीं, पैसा है| क्योंकि उसने अपने सुख की खोज पैसे में की है|

पैसे का सुख अपूर्ण है| पैसे से आप चश्मा खरीद सकते है किन्तु पैसा आपको आँख नहीं दे सकता है| पैसा आपको कलम दिला सकता किन्तु लेखन कला दिलाने में असमर्थ है| पैसे के द्वारा आप रोटी, रोटी ही क्यों रसगुल्ले, जलेबी, घेवर, मोहन थाल भी खरीद सकते है, किन्तु पैसे से आप भूख नहीं खरीद सकते जो कि सूखी रोटी और चने भी स्वादिष्ट बना देती है| भूख के अभाव में सुन्दर मिष्टान्न भी कड़वे हैं| पैसे से तलवार खरीद सकते हैं किन्तु पैसा आपको वीरत्व नहीं दे सकता है| पैसे से आप जगत् की भौतिक पदार्थ अपने आधीन कर सकते हैं किन्तु मानसिक शांति एवं अद्वितीय आध्यात्मिक आनन्द नहीं पा सकते हैं| पैसे का सुख, सुख नहीं सुखाभास हैं| पैसा साध्य नहीं जीवन का एक साधन है|

सुख है ज्ञान सहित त्याग, तपश्चर्या, अनासक्त प्रवृत्ति एवं आत्म स्वभाव की रमणता में आप अपनी आत्मा से पूछियेगा कि -

(१) हे आत्मन् ! तेरे जीवन की अनमोल घड़िया किस भाव बिक रही हैं ?

(२) केवल रोटी कपड़े और जगत् के भौतिक पदार्थो तक ही तेरा मनुष्य भव सीमित है ?

(३) गिनती के चन्द सिक्कों में अपने जीवन की कीमती घड़ियों को बदल लेना क्या बुद्धिमानी है ? आप शांत चित्त से बैठकर विचार करियेगा| यदि आप अपने भूतपूर्व जीवन का अध्ययन करेंगे तो आपको एक नई रोशनी मिलेगी|

हाय ! मैंने कितना ग…वा…या ? अंतर की आँखे खोलो, अपनी अनन्त दर्शन, ज्ञान, चारित्र युक्त शक्तिमान् विशुद्ध आत्मा का अनुभव करो|

यह दृढ संकल्प करो की मैं सिर्फ रोटी कपड़े का दास नहीं, भौतिक पदार्थों का भूखा नहीं, किन्तु ‘मैं अजर, अमर, दृष्टा ज्ञाता सच्चिदानंद विशुद्ध आत्मा हूं|’

संसार के सुख-दु:ख पूर्व संचित पाप पुण्य के विकार हैं, पहले बांधे हुए कर्म हैं उन्हें तो जैसे तैसे भोगना ही पड़ेगा| तू इतना घबराता क्यों है? इसमें हर्ष शोक की कोई बात नहीं| अपने शुभाशुभ कर्मों को शांति से भोग, अवश्य एक दिन इन कर्मो का अंत होगा| तू आत्मशक्ति का दीपक ले आगे बढ़ता चल, रात के बाद सुनहरे प्रभात का होना निश्चित है|

प्रेम, समभाव, संतोष एवं सहृदयता आत्मा की संपत्ति है| मन को केन्द्रित करो| स्थिर मन में एक दिव्य गुप्त शक्ति है, उस शक्ति के समक्ष संसार की विपुल संपत्ति आपके चरणों की दासी बन कर रहेगी| एक दिन आप जिन लोगों के घर-घर भटक कर उनकी कृपा व उनसे कुछ गिनती की मुद्राए प्राप्त करने को गिड़गिड़ाया करते थे वे ही स्त्री पुरुष आपको विकसित दिव्य शक्ति से प्रभावित हो हाथ जोड़े आपके चारो ओर चक्कर काटते दिखाई देंगे|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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