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ऋतु (मासिक) धर्म का पालन

ऋतु (मासिक) धर्म का पालन
मदनसेना ! ऋतुस्त्राव-रजोदर्शन को मासिक-धर्म कहते हैं| स्वास्थ्य के लिये इस का मास के अंत में होना आवश्यक है| यदि मासिक-धर्म ठीक समय और बिना कष्ट के उचित मात्रा में न हो तो शीघ्र ही उसकी चिकित्सा करना चाहिये| इसमें संकोच और विलंब करना बड़ा घातक है|

रजस्त्राव का ज्ञान होते ही स्त्रियों को बड़े शान्त भाव से किसी एकान्त स्थान में बैठ मन ही मन भगवान का स्मरण, आत्मचिंतन करना चाहिये| किसी भी पदार्थ का स्पर्श न करें| अपने पतिदेव, बीमार स्त्री-पुरुष और पवित्र वस्तुओं पर अपनी परछाई (छाया) न पडने दें| किसी से भाषण न करें, भूमिशयन करें| मासिक-धर्म के दिनों में घस-पस, गड़बड़ करने से परिवार और जीवन पर उसका बड़ा बुरा प्रभाव पड़ता है| आचार-मुरब्बे सड़ जाते हैं, पापड़ अपना रंग बदल देते हैं| ऋतुधर्म वाली स्त्री की गड़-बड़ी से कई छोटे-छोटे बच्चों की आंखें चली जाती हैं|

कई लडकियॉं और महिलाएँ ऋतुधर्म के समय रोजाना स्नान कर पुस्तकें पढ़ती हैं, भोजन बनाती हैं| कपड़े सीना, कशीदा निकालना, गेहूं, चने आदि धान्य साफ करना, बैलों को घास डालना, दूध-दुहना, बर्तन साफ करना आदि कार्य करने लगती हैं, यह धर्म और स्वास्थ्य के विरुद्ध है|

मासिक धर्म की असावधानी के कारण आज अनेक लड़कियॉं, महिलाएँ प्रत्यक्ष प्रदर, हिस्टीरिया, पागलपन, वंध्यत्व (बांझ) डाकण, चूड़ेल आदि रोगों का शिकार बन वर्षों से दु:ख पा रही हैं|

तपागच्छीय शिवराज के पुत्र खीमचंद ने घोल गांव में वि. सं. १८६५ कार्तिक वद अमावास्या को, ऋतुवंती स्त्री की सज्झाय में स्पष्ट कहा है -

वेदपुराण कुरानमां रे, श्री सिद्धान्तमां भाख्युं
ऋतुवंती दोष घणो कह्यो रे, पंचागे पण दाख्युं
मदनसेना ! वास्तव में ऋतुधर्म के समय प्रमाद करने से वर्षों तक इसका कटु-फल भोगना पड़ता है, अत: बडी सावधानी से रहना चाहिए| साथ ही चौथे दिन स्नान कर सर्व प्रथम अपने भर्तार के ही दर्शन करें| यदि पतिदेव की अनुपस्थिति हो, तो अपने इष्टदेव ‘दर्पण’ या सत्पुरुषों के चित्र का दर्शन करना विशेष हितकर है| ऐसा विद्वानों का अभिप्राय है|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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