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यात्रात्रिक – साल का तीसरा कर्तव्य

यात्रात्रिक   साल का तीसरा कर्तव्य

अट्ठाई महोत्सव

देवताएँ प्रभुके जन्मादि कल्याणकों के उत्सव को मनाने के बाद छलकते प्रमोद-हर्षको सार्थक करने के लिए नंदीश्वर द्वीपमें जाकर अट्ठाई महोत्सव करते हैं| भगवानने बताई हुई पर्युषणआदि आराधना निर्विघ्न रूपसे बहुत ही उल्लास सभर संपन्न हुई| ससे उद्भवित हर्षको पूर्ण करने हेतु स्वयं या तो समस्त संघ इकट्ठा होकर अट्ठाई महोत्सव करता है|

पापी जीव अपने कोई कार्यकी सफलता से आनंदित होकर बड़ी होटलमें पार्टी रखकर आनंद को मित्रमें फैलाकर व्यक्त करता हैं|

तो धर्मी जीव धर्मकी सफलता के आनंद का महोत्सव मनाकर आनंद का गुलाल बिखेरता है| अट्ठाई महोत्सव में नैवेद्य, फल इत्यादि उत्तम और घरनिर्मित होने चाहिए| उत्तम गीतार्थ-गुरुभगवंत की निश्रामें होनेवाले इस महोत्सव में हर पूजा-पूजनके तात्पर्य को जानना चाहिए| झूठा-शोरगुल-दिखावा नहीं होना चाहिए| वीडियो-फोटो के ज्यादा ठाट-बाट में भक्तिका रस फीका-गौण हो जाता है|

पूजा-पूजनों में देर से आये हुए आमंत्रित महेमानों का स्वागत करने के लिए बार बार पूजा-पूजन से उठना पडे, उसमें भगवान की भक्ति के नाम पर स्वजनभक्ति का कार्यक्रम हो जाता है|

इन दिनो में जो स्वामिवात्सल्य का आयोजन होता है, उसमें चूल्हा, पानी और बरतनों में पूर्ण जयणा का पालन होना जरुरी है|

शादी-भोज जैसा खाना, केटरर्स, भाडे के टट्टू जैसे वेइटर्स…. ये सब स्वामिवात्सल्य के लिए कलंक समान हैं| उसमें भी रात्रिमें रसोई बनाना, अगले दिन बनी हुई – बासी बनी हुई मिठाई, द्विदल, बाजारु आटा इत्यादि से कईबार लाभ नुकसानमें ट्रान्सफर हो जाता है| संघकी श्राविकाएँ गेहूँ बीनना इत्यादि कार्य करें और श्रावक लोग पानी-चूल्हा इत्यादि जयणाके कार्य का भार उठा ले तो स्वामिवात्सल्य सार्थक होगा|

साधर्मिक वात्सल्यमें गरीब-श्रीमंत इत्यादि सभी साधर्मिक यदि एक पंक्तिमें बैठे, तो एक दूसरे के प्रति प्रेमभाव बढ़ता है, गरीबी-श्रीमंताईका अंतर दूर होता है, एक दूसरे के गुणोंका और आर्थिक आदि परिस्थितियों का ख्याल आता है| इन दिनोमें याचक की दीनता किये बगैर गरीब श्रावकको शुद्ध घी की मिठाई इत्यादि का भोजन करने मिलता है, जिससे शरीरसंबंधी कमजोरी दूर हो जाती है| श्रीमंत श्रावक परोसते समय लड्डु इत्यादि में सुवर्णकी अँगूठी, मुहर इत्यादि रखकर किसीको मालुम न हो उस तरह आर्थिक मदद करके गरीब श्रावककी साधर्मिक भक्ति कर सकता है|

श्रावकों की पंक्ति में श्रावकों को परोसना चाहिए और श्राविकाओंकी पंक्तिमें श्राविकाओंको परोसना चाहिए| परोसने के लिए भाडे के वेईटरों को नहीं लाना चाहिए| एक भाईने गरीब-भिखारीतुल्य मजदूर को सुबह खीचडी खिलाई थी, दोपहर को शादी-भोजमें उसके हाथ से ही परोसी जाती मिठाई खाने की नौबत आई| मजदूर ने कहा, ‘‘आपने मुझे सुबह में खीचडी खिलाई थी, अभी मैं आपको मिठाई खिला रहा हूँ!’’ बात यह है कि हृदयका प्रेमभाव, मनका आग्रहभाव श्रावकों के परोसने से ही जीवंत रहता है|

इस तरह ही महोत्सवके आनंदमें तपस्वी आदिका बहुमान करना चाहिए| पहिरावनी-भेंट के नाम पर गरीब साधर्मिकोंकी ऐसी भक्ति करनी चाहिए कि जिससे भविष्यमें उसको प्रायः अर्थचिंता न रहे|

इस तरह अट्ठाई महोत्सव के दौरान राहसे गुजरते और अगल-बगलमें रहनेवाले जैनेतर भाईओंको प्रभुभक्ति के निमित्तसे प्रभावना देकर अरिहंत परमात्मा और जैन धर्मके प्रति ऐसा अहोभाव खडा करना चाहिए की जिससे उन्हें अट्ठाई महोत्सव की टीका-निंदा-आलोचना करनेका मन ही न हो| उसी तरह जीवदयाकी टीप भी करनी चाहिए| प्रभुभक्ति तब ही सच कहलाती है जब उसमें प्रभुके प्यारे सभी जीवोंकी दुआ मिले| इस प्रसंग के निमित्त को पाकर गुरुभक्ति भी विशेषतः करनी चाहिए| प्रभुकी कृपासे ही आराधनाका संयोग, साधन और शुभभावोंकी उत्पत्ति होती है, हुई है, ऐसी भावना से भावित होकर कृतज्ञभावसे की हुई इस भक्तिमें ऐसे मशगुल हो जायें की हम अरिहंतमय बन जायें|

रथयात्रा

यात्रात्रिक   साल का तीसरा कर्तव्य
परमात्मा को रथमें बिराजित करके भव्य जुलुस निकालना चाहिए| उसमें प्रभुके जीवनको उजागर करती हुई, महापुरुषोंकी याद दिलानेवाली, वैराग्य, प्रभुभक्ति, जीवदयादि दर्शक रचनाएँ करनी चाहिए| जुलुस ऐसा भव्य और शिष्टमय होना चाहिए कि देखनेवालोंको भी अहोभाव हो जाए| रुपये देकर होनेवाले धर्मान्तरणोंमें संस्कार नहीं बदलते| अहोभाव से जन्मांतरमें जनम लेते ही जैनधर्म मिले तब संस्कारसे जैन बनते हैं|

जैनियोंने शाहुकार-महाजनो की प्रतिष्ठा को शोभा दे ऐसे वेशमें चप्पल वगैरह का त्याग करके गौरवसमेत शामिल होना है| जैनों के लिए यह जुलुस देखने के लिए नहीं, किंतु उसमें जुड़ने के लिए है| देखना जैनेतरोंके लिए है| सुशोभित पालखी या रथमें परमात्माको बिराजित करके पूजाके वस्त्रमें इन्द्रका रूप धारण करके रथ वहन करने से अपने हृदयमें परमात्मा के प्रति बहुमानभाव बढ़ता रहता है|

रथयात्रा में जहॉं जहॉं प्रभुकी दृष्टि जाती है, वहॉं वहॉं से महामारी-बैर-विरोध आदि दूर हो जाते हैं| प्रभुकी अमीमय दृष्टिसे सभीका कल्याण होता है|

तीर्थयात्रा

यात्रात्रिक   साल का तीसरा कर्तव्य
१) एकलआहारी-एकाशन
२) भूमिसंथारी-भूमिपर – संथारे में शयन
३) पादचारी – नंगे पैर, पैदल विहारादि करना
४) ब्रह्मचारी – ब्रह्मचर्यका पालन करना
५) आवश्यककारी – गुरुके सत्संगमें प्रतिक्रमणादि आवश्यक करना
६) सचित्त परिहारी – कच्चा पानी इत्यादि सचित का परित्याग, ये छः‘रि जो कर्मलताका छेदन करने में छुरी समान हैं, उनका पालन करने के साथ तीर्थयात्रा करनेमें

१) तीर्थाधिपतिका सतत स्मरण और प्रतीक्षा रहती हैं| इससे सतत शुभभाव रहता है|

२) पूरा दिन पूजा, प्रतिक्रमण, जयणापूर्वक विहार, प्रवचन श्रवण इत्यादि सत्प्रवृत्तिमें सतत रक्त रहने का होता है और ट्रेन-बसके यात्रा-प्रवास की तरह बात-चीत, गप्पबाजी, ताश खेलना इत्यादि दूषणोंका अभाव रहता है|

३) मार्ग में आये हुए संघो के साथ बहुमान और भक्तिभाव से संबंध जुड़ता है| जीर्णोद्धार-अनुकंपा इत्यादि का लाभ मिलता है और रास्ते में आने वाले सभी गॉंवो के जिनालयोंके दर्शनआदि का लाभ मिलता है|

४) गुरुभगवंतो की नज़दीकियॉं बनती हैं और विहारवगैरह की प्रेक्टीस होने के कारण मानवभवके सारभूत दीक्षाकी भावना में विहार के कष्ट की कल्पना से मानसिक रुकावट नहीं होती|

५) गुरु भगवंतो की प्रेरणासे जीवनमें सहनशीलता, समाधि, सत्व इत्यादि गुण खिलते हैं|

६) वाहनमें प्रवास करते समय विकलेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीवों की जो विराधना होती है वह दोष पैदल विहार में नहीं रहता| बस-ट्रेन आदि की चपेट में आकर कुत्ते-बिल्ली जैसे कइ-कितने जीवोंकी तबाही होती है |

७) सतत प्रतीक्षा और बेसब्री से रटन के कारण तीर्थमें पहुँचने के बाद प्रभुके दर्शन मात्रसे अपूर्व आनंदकी अनुभूति होती है और इसलिए ही हृदय प्रभुभक्तिमें सविशेष हुलसता है|

८) छोटे गॉंव में रहते हुए साधर्मिकोंकी परिस्थिति और गुरुभगवंतो को विहारादि में होती मुश्केलियों का ख्याल आता है| फिर उसके मुताबिक यथाशक्ति लाभ लेने से धन सार्थक होता है| योग्य स्थान पर योग्य समय पर किया हुआ सद्व्यय स्वातिनक्षत्र में कालू मछलीके मुँहमें पडे हुए बरसात के बुंदसे बनते हुए महा मूल्यवान मोती जैसा बन जाता है|

९) सतत शुभभावनाएँ और शुभानुभव की यह स्मृति जीवनभर के लिए अनुमोदना की बड़ी कमाईका साधन बन जाती है| इसलिए सालभरमें एकबार अवश्यमेव छ’रि पालित तीर्थयात्रा करनी ही चाहिए|

जब इन्कमटेक्स इत्यादि की दरें उंची थी, तब ज्यादा टैक्स भरने वाले एक व्यापारीने होटलमें जाकर भोजन करके मुँह धोया| वेइटरने बील रखा| बील चूकाने के बाद वेइटर के हाथमे टीप का एक रुपया रखते हुए व्यापारीने कहा, यह है तेरी टीपके दस रुपये, आवकवेरा इत्यादि सभी टैक्स काटने के बाद |

मुझे आपसे यह कहना है कि आप भले ही दौड़-धूप करके ज्यादा कमाई करते होंगे| परंतु उसमें से सरकार, हप्ताखोर और परिवार…. सभी के टेक्स भरपाई करने के बाद आपके खाते में क्या बचता है ? सभी के लिए इतनी दौड़-धूप करते हो, तो कभी कभी आत्मा को जिस छरि पालित संघसे टेक्स फ्री लाभ होता है उसके लिए क्यों समय नहीं निकालते ?

प्राचीन कालमें भरत चक्रवर्तीने और विक्रमादित्य राजाने निकाला हुआ शत्रुंजय का संघ, कुमारपाल राजा का संघ, पेथड़शाह का संघ और वस्तुपाल-तेजपाल के तेरह संघ, इन सभी का वर्णन सुनो, वर्तमानमें भी निकलते हुए संघो की बातें सुनो | बादमें एकबार तो अवश्यमेव ऐसे संघ के यात्रिक बनें | यदि शक्ति और भावना साथ दे तो स्वयं ही संघवी बनें| आर्थिक दृष्टिसे कमजोर साधर्मिकों को भी साथमें ले जाकर यात्रा करें| नौकरों को भी यात्रा कराएँ| क्योंकि तीर्थभूमिओंकी यात्रा से समकित निर्मल होता है|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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