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स्नात्र महोत्सव – साल का चौथा कर्तव्य

स्नात्र महोत्सव   साल का चौथा कर्तव्य
रोज तो सामान्य रूढ़िगत स्नात्र पढ़ाना चलता है| उसमें विधि पालन की उतनी दरकार नहीं होती| पर सालमें एकबार तो ५६ दिक्कुमारी और ६४ इन्द्रों समेत महामहोत्सव पूर्वक स्नात्र पढ़ाना चाहिये|

परमात्माके जन्माभिषेक के समय पर इन्द्रो को इतने आनंद की अनुभूति होती है कि उसके सामने देवलोक का सुख घास समान भी नहीं लगता| फीर भी वे चौथे गुण स्थानक पर ही रहते हैं| उनके पास १) साक्षात् जिनेश्वर देव २) सुवर्ण का मेरु ३) रत्नमय आदि कलशें ४) क्षीरसमुद्र इत्यादि का शुद्ध जल और ५) भक्तिभाव इत्यादि … सभी सामग्री भव्य होने पर भी तीव्र अविरतिका उदय होने से वे पॉंचवा आदि गुणस्थानक पर कभी भी पहुँच नहीं सकते| जब कि १) प्रतिमारूप भगवान २) जर्मन-सिल्वर का सिंहासन-बाजोठ ३) जर्मन-सिल्वर के कलश एवं ४) कूएँ इत्यादि का पानी … इस तरह सामग्री की अपेक्षासे न्यूनता महसुस करते हुए भी भक्तिभर श्रावक भावनाके वेगमें अगर दौडने लगे तो ‘‘असल से भी नकल बढ़कर होती है’’ यह न्याय से पॉंचवा आदि गुण स्थानक को स्पर्श कर लेते हैं और यदि चौथा आरा जैसी अनुकूल सामग्री हो तो केवलज्ञान की संप्राप्ति भी कर लेते हैं|

बार बार भाषण देने से उकता गये आईनस्टाइन को जब एकबार भाषण करने जाना था, तब आईनस्टाइनने ड्राइवर का स्थान लिया और ड्राइवरने आईनस्टाइन का | ड्राइवरने तो आईनस्टाइन से भी ज्यादा लच्छेदार भाषण दिया| भाषण के अंतमें विद्यार्थी गणित के समीकरण लेकर आये| तब गणित के ‘‘ग’’ से भी घबराता ड्राइवर, ‘‘अरे ! इसे तो कारमें बैठा हुआ मेरा ड्राइवर भी आपको समझा सकता है|’’ ऐसा कहकर सफ़ाईपूर्वक खिसक गया| भाषण में असल से भी नकल का डंका बज गया | इस तरह स्नात्र पूजा इत्यादिमें भाव लानेमें देवोंसे भी मानव अधिक आगे बढ़ सकते हैं|

एक युवकने गॉंव के बाहर स्नात्रपूजा के लिए आये हुए श्रावकों से, ‘‘मेरे पास अच्छी किसमका अत्तर है| आप मुझे भी लाभ दीजिए| मैं दौड़कर लेकर आता हूँ| आप थोडी देर मेरी प्रतीक्षा करने की कृपा करो|’’ ऐसी बिनती की| बहुत प्रतीक्षा करने पर भी वह युवक नहीं आया| तब ‘‘युवक हमारी हँसी उड़ाकर चला गया’’ ऐसा मानकर ठाठसे स्नात्रपूजा पढ़ाकर सभी श्रावक गॉंव में वापस लौटे|

स्नात्र महोत्सव   साल का चौथा कर्तव्य
बात यह थी कि युवक की तीव्र इच्छा होने पर भी वह जा न सका क्योंकी आज ही उस युवक की शादी थी| इसलिए माता…पिता इत्यादि ने उसे विवाहसंबंधी विधिविधानमें जोड़ दिया था| जैसी विधि खत्म हुई की तुरंत वह अत्तर लेकर दौडा| परंतु स्नात्र महोत्सव तो अब पूर्ण हो गया था| युवककी आँखोंमें अश्रुकी धारा और हाथमें अत्तर की शीशी ! मैं कितना कमभागी ! मेरा भाग्य ही फूटा हुआ है ! पूर्वभवमें किसीको धर्मकार्यमें अंतराय किया होगा इसलिए ही संसार की गंदी नालीमें मेरी सामग्री का उपयोग होता है, किंतु प्रभु भक्ति की गंगा में नहीं ! वह युवक इस तरह की भावनामें आगे बढ़ता गया| बढ़ते-बढ़ते करारे कर्मों को तोड़कर, श्रेणिका प्रारंभ करके वहॉं ही केवलज्ञान की प्राप्ति कर ली| यह है भावना की ताकत !

कुमारपाल राजा हररोज १८०० करोड़पतियों के साथ बड़े ठाठसे स्नात्र महोत्सव मनाते थे| एकबार आखिर में आरती करते करते भावना हुई कि, ‘‘मैं अठारह देशका राजा ! फिर भी छः ऋतुओंके फुल प्रभुको अर्पण नहीं कर सकुं तो मेरी प्रभुभक्ति धूल में मिली|’’ अत्यंत भावोल्लास में आकर वहॉं ही संकल्प कर लिया कि ‘‘जब तक छः ऋतुके फूलोंसे परमात्मा की आँगी न रचाऊँ, तब तक अन्न-पानी का त्याग यानी कि ‘‘चौविहार उपवास’’| इस सत्वके प्रभावसे अट्ठमतप के अंतमें उद्यानमें एक साथ ही छः ऋतुके फूल खिले और उनसे उत्कृष्ट परमात्मभक्ति की| बस इसलिए ही तो कहा जाता है कि ‘‘आरती उतारी राजा कुमारपाले’’|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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