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संघपूजा – साल का पहला कर्तव्य

संघपूजा   साल का पहला कर्तव्य
जैसे पर्युषण के पॉंच कर्तव्यों का पालन करना है, ठीक उसी तरह सालभर के ग्यारह कर्तव्य का भी यथाशक्ति पालन अवश्य करना चाहिए|

पइवरिसं संघच्चण साहम्मिअभत्ति
तह य जत्ततिगं|
जिणगिहण्हवणं जिणधणवुड्ढि
महपूअ (धम्म) जागरिआ॥
सुअपूआ उज्जवणं तहेव तित्थपभावणा सोही॥

सालभर में (१) संघपूजा (२) साधर्मिक भक्ति (३) यात्रात्रिक (४) स्नात्रपूजा (५) देवद्रव्यवृद्धि (६) महापूजा (७) धर्मजागरण (८) श्रुतपूजा (९) उद्यापन (१०) तीर्थप्रभावना और (११) प्रायश्चित्त….. ऐसे ग्यारह कर्तव्यों का पालन करना चाहिए|

संघपूजा

हर एक तीर्थंकर पूर्वके तीसरे भवमें तीर्थंकर बननेमें कारणभूत साधना उस समय के संघ तीर्थ के सहारे ही करते हैं| इसलिए ही केवलज्ञान की प्राप्ति के बाद और समवसरणमें देशना देने से पहले परमात्मा चैत्यवृक्षको तीन प्रदक्षिणा देकर ‘‘नमो तित्थस्स’’ कहकर तीर्थको नमस्कार करने के बाद ही सिंहासन पर आरुढ़ होते हैं| (तीर्थ= १) ज्ञान-दर्शन-चारित्र २) आगममय प्रवचन ३) प्रथम गणधर और ४) चतुर्विध संघ|) संघ तो तीर्थंकर, गणधर, युगप्रधान आचार्य इत्यादि रत्नोंकी खान है| जिस तरह ‘‘यह पाट सुधर्मास्वामी की पाट है’’ ऐसा समझकर ही पाट पर बिराजित साधुको बोलने में विवेक रखना चाहिए| ठीक उसी तरह संघ की जाज़िम पर बैठे हुए हर एक जैन को इतना विवेक तो रखना चाहिए कि जो जाज़िम पर बैठकर पेथड़शा, झांझणशा, वस्तुपाल जैसे महान श्रावकोंने शासनप्रभावना के कार्य किये हैं, उस जाज़िम पर मैं बैठा हूँ… इसलिए यहॉं मुझे अंट-संट बात नहीं करनी चाहिए और व्यक्तिगत कोई भी राग-द्वेष के कारण संघकार्य में बाधक नहीं बनना चाहिए | अन्यथा संघआशातना का महापाप लग जायेगा|

एक सेठ अपनी भोजनशालामें, तीर्थयात्रामें आये हुए सभी यात्रिकों की साधर्मिक भक्ति करते थे| एक बार तीर्थयात्रा में आये हुए लेकिन प्रभुभक्ति में लीन हो जाने से भोजनशालामें देरसे पहुँचे हुए दो साधर्मिकों की भक्ति नहीं की | बादमें एक ज्ञानी गुरु भगवंतने कहा कि आपके यहॉं आनेवाले वे दो साधर्मिक में से एक तीर्थंकर का जीव था और एक गणधर का ! कहिये, यह सुनकर शेठ को कितना अफसोस हुआ होगा? आप संघ की कोई भी व्यक्ति को छोटा मत समझो| इसलिए तो संघवी झांझणशाने गुजरात के राजा को कहा था कि मेरे संघ का प्रत्येक व्यक्ति मेरे लिए मुख्य है| मेरे सिर पर है| उनमें से मैं किसीको भी कम नहीं गिन सकता|

गरीब पेथड़ मांडवगढ़ के महामंत्री, जैनशासन के प्रभावक पेथड़शा बने| जान बचाने के लिए भागते फिरते कुमारपाल अठारह देश के राजा परमार्हत् कुमारपाल बने| खाने के लिए दीक्षा लेने वाला भिखारी दूसरे भवमें संप्रति राजा बन गया| इसलिए संघमें अभी बिलकुल सामान्य दिखाई देनेवाले व्यक्ति की महत्ता कम आँकनी नहीं चाहिए|

संघ साथमें हो तो शत्रुंजय की यात्रामें उल्लास बढ़ता है| कार्तिक वदि (राज-मगसर वदि) एकम के दिन तो दादाके दरबार में पहुँचने के बाद जब दादा के दर्शन होते हैं, तब भावोल्लास प्रकट होता है| जब कि कार्तिक पूनम के दिन तो धर्मशालामें से निकलते ही भावोल्लास उछलने लगता है क्योंकि भावोल्लास से भरपूर संघ का महाप्रवाह चारों ओर फैला हुआ रहता है|

संघकी उपस्थितिमें जब चढ़ावे होते हैं तब कृपण भी पूरे भाव के साथ बडी बोली बोलकर उल्लासभरे हृदयसे दानधर्म के महासुकृत का लाभ लेकर नरकमें ले जाने वाली लक्ष्मी से पुण्य का और परलोक में सद्गति का संबल बटोरता है|

ढ.त., सिनेमा इत्यादि के कारण आज-कल सामुदायिक पाप बहुत बढें हैं| आज समाज में रहने के नाम पर भी ये सब पाप होते हैं| रविवार के दिन रात को होटल में जाना, सिनेमा देखने जाना इत्यादि पाप आज क्यों व्यापक दिखाई देते हैं? कहिये कि सभी लोगों को देख-देख कर हम भी ये सब करते हैं| समुदायमें किये हुए ऐसे पाप के प्रभाव से भूकंप इत्यादि सामुदायिक विनाश के प्रसंग उपस्थित होते हैं| इसके सामने यदि संघ के साथ सामुदायिक तप, जप, सामायिक, पूजा इत्यादि अनुष्ठान करें, तो सामुदायिक पुन्य जमा होता है | यह पुण्य ही सामुदायिक पाप के सामने हमें बचाएगा|

पीकअवर्समें (सुबह नौ बजे) मुंबई उपनगर के स्टेशन पर से चर्चगेट की ट्रेन पकड़नेवाले को चढ़ने के लिए परिश्रम नहीं करना पडता| क्योंकि भीड़ का एक धक्का ही उसको ट्रेन में चढ़ाने के लिये काफी है| इस तरह संघ का बड़ा हिस्सा जब सामुदायिक तपश्चर्यामें सम्मिलित होता है, तब तपमें निर्बल व्यक्ति को भी ज्यादा तकलीफ नहीं होती| क्योंकि समुदाय की शक्ति ही उसको तपकी ट्रेनमें चढ़ा देता है|

जिस तरह अकेला इंसान जो पाप नहीं करता वह जब समुहमें मिल जाता है तब ज्यादा जुनून से विचार किये बिना ही कर देता है| उसी तरह अकेला इंसान जो पुण्य-धर्म नहीं करता वह जब संघमें मिल जाता है और संघके उल्लासमें सम्मिलित होता हैं तब वह सहजतापूर्वक कर लेता है|

संघपूजा   साल का पहला कर्तव्य
यदि संघके सभ्य रात्रिभोजन त्याग, टी.वी. त्याग इत्यादि नियम लेने के लिए खडे हो जाए तो नियम लेनेमें बिलकुल ढीला व्यक्ति भी उठकर नियम-प्रतिज्ञा कर लेता है| हमने कईबार देखा है कि जिस संघमें बडी संख्या में पुरुषवर्ग पूजा करता है, उस संघमें नये व्यक्ति को पूजा करने के लिए ज्यादा प्रेरणा की जरुरत नहीं पडती और जहॉं पूजा करनेवाले पुरषों की संख्या कोई खास नहीं होती, वहॉं काफी लोग पूजा करने की इच्छा होने पर भी शर्म के मारे पूजा करने नहीं जाते|

संघ के सभ्य मिलकर यदि सुबहमें उपाश्रयमें गाथा रटते हैं, तो उस माहोल की असर में जिसे स्वाध्याय की रुचि नहीं है, वह भी गाथा रटने बैठ जाता है|

इस तरह हमारे पर संघके अनेकानेक उपकार हैं| संघ की बदौलत ही आज हमारे तक प्रभुशासन का प्रवाह अविरत पहुँचा है और अनेक आक्रमणों के बीचमें भी आज हमारें तीर्थ, आगम और धर्मकी मशाल जीवंत है| इसलिए तो यह संघ २५ वे तीर्थंकर समान है| संघ की पूजा तीर्थंकर की पूजा समान है| जिस जाज़िम पर श्री संघ बैठा था, वह जाज़िम पुरानी होते हुए भी एक भाई उस जाज़िम के दस हजार रुपये देनेके लिए तैयार हो गये| तीन हज़ार की जाज़िम का १० हजार मिलेगा उसके आनंद में मंडपवालेने उस जाज़िम को धो कर व्यवस्थित करके श्रावक भाई को दी| तब उस श्रावक भाईने कहा- अब मुझे नहीं चाहिए ! मैं जाज़िम के दस हजार नहीं देता था| मैं तो उसके पर बिराजित श्री संघकी पवित्र चरण रज का १० हजार देता था| आपने जाज़िम को धो कर साफ कर दी| अब मुझे इस जाज़िम का क्या काम? अब मैं नई खरीद लुँ तो भी मुझे सस्तेमें मिल जाएगी|

बात यह है कि संघ को स्पर्शी हुई धूल भी धूल नहीं, तेजंतूरी है, जो जंग लगे हुए लोहे जैसी हमारी आत्मा को पवित्र स्वर्ण समान बना देती है|

पुनड़ श्रावकने नागपुरसे छ’रिपालित संघ निकाला था| उस संघका सत्कार करने जब वस्तुपाल आगे बढ़कर लेने गये तब संघ के चलने से उठी हुई धूल सामने आ रही थी| यह देखकर नौकरने वस्तुपाल को एक तरफ सरकने के लिए विनती की| तब वस्तुपालने कहा, ‘‘अरे ! ये रज तो श्री संघकी रज हैं ! इनसे तो मेरे भवोभव की कर्मरज दूर हो जाएगी’’| वे स्वयं ही श्री संघके सभी सदस्योंके चरणकमलको दुधसे प्रक्षालन करने दिनभर बैठे | तेजपाल आदिने ‘थक जायेंगे’ इत्यादि बातें करके बार-बार खडे होने के लिये कहा, पर वस्तुपाल बैठे रहे| बस यही भावना को भावित कर रहे थे कि मेरे पूज्य श्री संघकी पूजासे तो मेरे भवोभव के संसार भ्रमण की थकान दूर हो जाएगी|

जगद्गुरु हीरसूरिजी महाराजने अपने जीवनके अंतिम दिनों में दवाई लेना बंद कर दिया था| लेकिन जब संघने भोजन लेना और माताओंने अपने बच्चों को स्तनपान कराना बंद करके नैतिक दबाव दिया तब जगद्गुरु को भी श्री संघकी बातका स्वीकार करना पड़ा और दवाई लेनी पड़ी|

महाप्राण ध्यान की सिद्धि के लिए आगमवाचना देने की संघकी बिनती का श्री भद्रबाहुस्वामी ने अस्वीकार किया| तब श्री संघने पुछवाया कि ‘‘संघ-आशातना का क्या दंड होता है ?’’ और तुरंत ही भद्रबाहुस्वामीने संघकी आज्ञाका स्वीकार कर लिया|

श्री सिद्धसेन दिवाकर सूरिको, सूत्रोका संस्कृतमें रूपांतर करने की बात पर प्रायश्चित लेने के लिये कहने का सामर्थ्य श्री संघका था| और आचार्यभगवंतश्री ने वह प्रायश्चित स्वीकार भी कर लिया|

श्री कालिकाचार्यने राजाकी बिनती को मान्य करके संवत्सरी की आराधना भाद्रपद शुक्ल पंचमी के बदले चतुर्थी के दिन की| दूसरी साल मात्र संघकी शांति, एकता और एकवाक्यता के खातिर अन्य आचार्य भगवंतोंने भी पंचमी के स्थान पर चतुर्थी के दिन संवत्सरी पर्व की आराधना की|

किंवदंती है कि महोपाध्याय यशोविजयजी महाराज अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन करने के लिये स्थापनाचार्य के चार कोने में चार धजा रखते थे| तब ‘‘गौतमस्वामी कितनी धजा रखते थे ?’’ ऐसा हृदयवेधक प्रश्न करके संघकी एक सामान्य बूढ़ी औरतने उपाध्यायश्री का अभिमान उतार दिया|

संघ इसलिए ही महान है| कुमारपाल राजाको संघपतिका बिरुद खटक रहा था| वे स्वयं को संघसेवक ही मानते थे| आखिर कलिकाल सर्वज्ञने समाधान दिया कि ‘‘संघ है पति = मालिक जिसका वह संघपति’’ आप ऐसा अर्थघटन करना|

संघपूजा   साल का पहला कर्तव्य
पंचवस्तु में पूज्य श्री हरिभद्रसूरिजी कहते हैं कि संघके एक भागरूप आचार्यकी वस्त्रादि से पूजा करने से भी विशेष लाभ की प्राप्ति श्री संघकी पूजा करने में है| उसमें मुहपत्ती इत्यादि उपकरणोंसे साधु-साध्वीजी की और यथाशक्ति पहिरावनी द्वारा श्रावक-श्राविका की पूजा करनी चाहिए| यदि संघकी पूजा करने से तीर्थंकर से लेकर तमाम उत्तम आराधकों की पूजा का लाभ मिलता है तो कौन संघपूजा से वंचित रहेगा ! जो हिसाब करना जानता है वही व्यापारी कहलाता है|

एक व्यापारीने बेंक में जाकर मेनेजरसे कहा, ‘‘मुझे लोन लेना है|’’ मेनेजरने कहा, ‘‘लोनके बदले में आपको आपकी जायदाद गिरवी रखनी पडेगी और १८% ब्याज भरना पडेगा|’’ व्यापारीने कहा, ‘‘कितनी जायदाद गिरवी रखनी पडेगी ?’’ मेनेजरने कहा, ‘‘जितनी लोन लेंगे उससे सवा गुनी किंमती जायदाद गिरवी रखनी पडेगी|’’ व्यापारीने पूछा, ‘‘उससे अधिक जायदाद गिरवी रखुं तो ?’’ मेनेजरने कहा, ‘‘वह तो बहुत अच्छा|’’ व्यापारीने कहा, ‘‘लीजिए मेरे शेर सर्टीफीकेट, गहने, महत्व के दस्तावेज… देखो ! मेरी यह पूरी जायदाद की किंमत लगभग १० लाख रू. हैं|’’ मेनेजरने सब देखकर कहा, ‘‘बराबर है| इसके पर आपको ८ लाख की लोन मिलेगी| बताइए आपको कितनी लोन चाहिए ? कितने माह पर्यन्त ? व्यापारीने कहा- कीजिए दस्तखत, लगाईए मुहर और दीजिए छः माह के लिए मुझे १०० रू. लोन| मेनेजर रकम सुनकर चौंक गया| उसको व्यापारी खिसके दिमाग का लगा| मेनेजर के बहुत समझाने पर भी व्यापारी माना नहीं| दस लाख रू. की जायदाद पर १०० रू. की लोन लेकर करार पर दस्तखत करके चलते बना| छः माह के बाद जब पुनः आया और ब्याज अनुसार रकम देकर १०० रू. की लोन वापस लौटाकर गिरवी रखी हुई अपनी जायदाद को मुक्त करवाई| बादमें मेनेजरने १०० रू. की लोन के लिये इतनी बड़ी जायदाद गिरवी रखने का प्रयोजन पूछा| तब व्यापारीने कहा, ‘‘देखो ! इसमें मुझे ब्याज के रूप में नव रू. और अन्य खर्च मिलाकर प्रायः ५० रू. में सब निपट गया| यदि मैंने इसके स्थान पर लॉकर इत्यादि लिया होता, तो कितना खर्च और किराया देना पडता| फिर भी चोरी की संभावना होती| यहॉं तो मुझे कोई डर नहीं था| १०० रू. के बदले में इन सभी की आपने मुफत में चौकीदारी की| मुझे लाभ हुआ न ?’’

यदि व्यापारीको लाभ दिखाई दे, तो कैसी कैसी युक्तियॉं लगाकर लाभ की प्राप्ति कर लेता है| उस तरह हमें भी संघपूजा में विशेष लाभ दिखाई दे, तो उस लाभ की प्राप्ति के लिये श्रावक कैसा कैसा प्रयत्न और पुरुषार्थ करेगा ? अरे ! शक्ति के अभाव में आखिर कुमकुम से तिलक करके भी संघपूजा का लाभ लेना चाहिए|

पूज्यपाद आचार्यदेव श्री विजय भुवनभानुसूरीश्वरजी महाराज कई बार व्याख्यान में कहते थे कि कोई भी खर्च वगैरह करो, तो शीर्षक धर्मका रखो| जुड़ाव धर्म के साथ रखो | घर के लिये सामान बसाया तो साथ-साथ कुछ सामान संघ के लिये- उपाश्रय के लिये भी बनाएँ| घर के प्रसंगमें स्वजनों को जिमाते हो, तो उसके साथ साथ संघपूजन करके साधर्मिक भक्ति भी करें| इसी तरह संसार का भी कोई शुभ कार्य करना हो, तो मंगल स्वरूप प्रथम संघपूजा करें | यह महामंगल है| इस तरह सर्वत्र संघको आगे रखने से भवोभव संघ के साथ हमारा संबंध बना रहेगा| इससे तो तीर्थंकर-गणधर पदवी भी प्राप्त हो सकती है| संसारकार्य में आसक्ति कम होती है| सर्वत्र धर्म आगे रहने से जीवन धर्ममय बना रहता है| उसी तरह घर के ऐसे प्रसंगोमें संघके महान तपस्वी, ब्रह्मचारी, रात्रिभोजन त्यागी इत्यादि महानुभावों का बहुमान करना चाहिए| वस्तुपाल तो हर सालमें तीन बार संघपूजा करते थे|

जिनको पूजते हैं उनकी कभी भी निंदा नहीं की जाती| संघ का या तो श्री संघके कोई भी व्यक्ति का कभी भी बूरा बोलना नहीं और सुनना भी नहीं चाहिए| स्थानांगसूत्र में दुर्लभबोधिता के पांच कारण बताये गये हैं| उनमें से एक कारण है, ‘‘संघकी आशातना’’ | आप पुत्र की निंदा नहीं सुन सकते क्योंकि आपको पुत्र पर प्रेम है| पिता की बूराई सहन नहीं होती, क्योंकि पिताजी पूज्यस्थान पर है| इसलिए ‘‘संघ अज्ञ है’’, ‘‘संघके ज्यादातर सभ्यो में ज्ञान, सुझ-बुझ नहीं है’’, इत्यादि वचनोंसे संघकी नीचता करना भयंकर पाप है| ऐसा पाप जो कइ भवों तक संघका मिलाप ही नहीं होने देगा|

जिससे संघमें मनभेद-बिलगाव खड़ा हो, टुकडे हो जाय और संघमें संघर्ष का वातावरण होने से सभी की समता और आराधना खतरे में पड जाये ऐसा दुष्कृत्य कभी भी मत करना| याद रखो, पूर्वाचार्योंने संघकी एकता व एकवाक्यता के लिए भाद्रपद शुक्ल पंचमी के स्थान पर चतुर्थी के दिन संवत्सरी पर्व की आराधना करने का ऐतिहासिक निर्णय किया था| संघके टुकडे यानी कि तीर्थभेद, तीर्थनाश की प्रक्रिया…| ऐसा करने से भवोभव तक जैन धर्म की प्राप्ति नहीं होगी|

तथैव कभी भी संघसे पृथक् होकर आराधना नहीं करनी चाहिए| तप-प्रतिक्रमण इत्यादि सभी आराधना संघ के साथ ही यथाशक्ति करनी चाहिए| आराधना के लिए भी जो संघसे अलग होगा, उसे भविष्यमें केवलज्ञान की प्राप्ति होगी तब भी प्रायः अंतकृत्केवली इत्यादि होकर होगी, शासन प्रभावक न हो ऐसी शक्यता बढ़ जाती है|

जो व्यक्ति अवसर पर अपनी चालु आराधना को छोड़कर भी संघकार्य-संघके हित के लिए यथाशक्ति प्रयत्न करता है, वह भविष्य में तीर्थंकर या तो गणधर बनकर मोक्ष प्राप्त करता है| मगर जो व्यक्ति स्वयं के व्यक्तिगत अनबन, राग-द्वेष को आगे करके उस व्यक्ति द्वारा होते हुए संघ हित के कार्य में रुकावट का प्रयत्न करता है, वह शायद विशिष्ट तप-दान-शील आदि धर्म करता होगा तो भी संघकी आशातना का बड़ा पाप करता है|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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