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साधर्मिक भक्ति – साल का दूसरा कर्तव्य

साधर्मिक भक्ति   साल का दूसरा कर्तव्य
प्रभु के शासन में साधर्मिक के प्रति सद्भावका इतना महत्व है कि यह एक ही कर्तव्यको पर्युषणके पॉंच कर्तव्यों में और वार्षिक ग्यारह कर्तव्यों में यानी कि दोनोंमें स्थान प्राप्त हुआ है| श्री संभवनाथ भगवानने पूर्वके तृतीय भवमें साधर्मिक भक्ति करके तीर्थंकर बनने की भूमिका को प्राप्त की थी|

पुणिया श्रावक-दंपती क्रमशः एकांतर उपवास करके भी रोज एक साधर्मिक को भोजन कराने द्वारा साधर्मिक भक्ति करते थे| सभी संपन्न श्रावक यदि अपने अपने विस्तार के एक एक साधर्मिक परिवार की सभी जिम्मेदारियों का सबहुमान स्वीकार कर ले तो साधर्मिकभक्ति, स्थिरीकरण, उपबृंहणा इत्यादि अनेक धर्मोके लाभ ले सकते हैं और इस तरह सम्यक्त्व के आचार का पालन भी कर सकते हैं| वर्तमान में सिर्फ ९०० रुपये के तनख्वाहदार एक भाईने अपने बोनस की पूरी रकम साधर्मिक भक्ति की टीप में लिखा दी|

अपना साधर्मिक को कर्जदार के रूप में मृत्यु पाकर दूसरें भवमें पशुयोनिमें जन्म लेकर भी कर्ज पूरा करना पडे ऐसी परिस्थिति को रोकने के लिए मोतीशा सेठने अपनी मृत्यु के पहले तमाम साधर्मिकों का कर्ज माफ कर दिया था|

‘‘मेरे साधर्मिक के सिर पर देवद्रव्य का कर्ज न रहे और उससे अनंत संसारमें भ्रमण न करना पडे’’ ऐसे शुभ आशय से एक भाईने शंखेश्वर तीर्थ में साधर्मिकों के चढ़ावे की रकम जो भरपाई करनी बाकी थी, वह पूरी रकम भरपाई कर दी| पूरे दो करोड़ रुपये चूकते किया|

साधर्मिक भक्ति   साल का दूसरा कर्तव्य
दो जुड़वॉं भाई| देखने में समान| एक भाईकी रोज फरियाद थी कि मेरी जगह पर मेरा भाई सर्वत्र लाभ प्राप्त कर लेता है| सह-भोजमें आमंत्रण मुझे मिलता था और वह जिमकर आ जाता था| पीकनीक पर जाने के लिए पैसा मैने चूकाया था और वह घूमने चला जाता था| एवोर्ड मुझे मिलता था और लेने के लिए वह पहुँच जाता था| एक दिन वह बहुत ही खुशखुशाल था| किसीने पूछा ‘‘आज आप इतने आनंदमें क्यों हो?’’ उसने कहा- मेरी जगह पर सर्वत्र मेरे भाईको जानेकी आदत पडी हुई है, यह आदत एक दिन उसको भारी पड़ने वाली है क्योंकि मृत्यु मेरी होगी और अग्निसंस्कार के लिए वह पहुँच जाएगा ! अग्निसंस्कार उसका ही हो जाएगा !

बात यह है कि साधर्मिक अपना जुड़वा भाई है| किन्तु हर एक स्थान पर हम आगे पहुँच जाते हैं, व्याख्यान में- संवत्सरी प्रतिक्रमणमें आगे जाकर जगह रोक लेते है, जिससे साधर्मिक को बैठने की जगह भी न मिले| हम सह-भोजकी प्रथम पंक्तिमें पहुँच गये और साधर्मिक को धूपमें खड़ा रहना पडे| उपरसे बादमें उसे बचा खुचा ठंडा भोजन खाने को मिले| तेज वाहन के सहारे तीर्थमें सबसे पहले पहुँचकर हम चढ़ावे इत्यादि सब हमारे हिस्से में ले लेते हैं और साधर्मिक के हिस्से में बचता है लाइनमें खड़ा रहना ! अब यह परिस्थिति बदलनी चाहिए| साधर्मिकभक्ति का अर्थ यह है कि सभी सुकृत में अपने तन-मन-धन के व्यय पर भी साधर्मिक को लाभ देना चाहिए| इसके बारे में विशेष जानकारी प्राप्त करने हेतु पूज्यपाद आ.दे.श्री. वि. भुवनभानुसूरीश्वरजी महाराजा लिखित ‘‘साधर्मिक मेरी दृष्टिमें’’ पुस्तक पढ़िये|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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1 Comment

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  1. Dilip Parekh
    सितम्बर 2, 2016 #

    साधर्मिकभक्ति का अर्थ यह है कि सभी सुकृत में अपने तन-मन-धन के व्यय पर भी साधर्मिक को लाभ देना चाहिए|

    BAHUT BADHIYA

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