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पर्युषण महापर्व – कर्तव्य दूसरा

पर्युषण महापर्व   कर्तव्य दूसरा

कर्तव्य दूसरा – साधर्मिक भक्ति

द्वितीय कर्त्तव्य… साधर्मिक भक्ति ‘‘मेरा सो मेरा ही’’ ऐसी स्वार्थ वृत्ति को दूर करता है| बुद्धिनिधान अभयकुमार नामक साधर्मिक ने कालसौरिक कसाइर्२ के पुत्र सुलस को जैनधर्म-अहिंसा की प्रेरणा देकर हिंसक धंधे से दूर होने के लिए जोर-बल दिया था| मृत्यु के समय भाई के प्रति द्वेष रखने के कारण नरकमें जाकर संसार वनमें भटकने के लिए तैयार युगबाहु को पत्नी मदनरेखाने कल्याणमित्र की भूमिका बजा कर-सच्चा रिश्ता साधर्मिक का इस बात को सिद्ध करके… भाई के प्रति वैरभाव से जो असमाधि उत्पन्न हुई थी, उसको दूर करके सद्गति दिलाई और संसारमें भटकने से बचा लिया था|

साधर्मिक मेरे जैन शासनकी पीढ़ी को इक्कीस हजार साल तक जिम्मेदारीपूर्वक वहन करनेवाला है… इसलिए साधर्मिक मेरे सिर पर है.. यह भावना पेथडशा के पुत्र झांझणशा ने अपने संघके अति सामान्य कोटि के साधर्मिक के लिए व्यक्त की थी|

विविध आराधना-साधनामें जुड़े हुए साधर्मिक की भक्ति तो पुण्य के पातालकूप समान है, यह बात तब सिद्ध हुई, जब भरुच के श्रावकने विजयसेठ-विजया सेठानीकी भक्ति करके ८४००० साधु की भक्ति का लाभ लिया था|

दुनियाके-बाज़ार के स्थान पर- जहॉं धर्म याद आना भी दुर्लभ है… वहॉं अपने तिलक से और व्यवहारसे धर्म की याद दिलानेवाले साधर्मिक की भक्ति का धर्म अन्य सभी धर्मों से उपर है| पति के साथ शादी करनेवाली स्त्री पति के स्वजन के साथ अपने स्वजन की तरह व्यवहार करती हैं| उसी तरह प्रभु को अपना माननेवाला व्यक्ति प्रभु के स्वजन एैसे जैन को साधर्मिक मानके उसे गले लगाता हैं|

एगत्थ सव्वधम्मा, साहम्मिअवच्छल्लं तु एगत्थ|
बुद्धितुलाए तुलिआ, दोवि अ तुल्लाई भणिआई॥

शास्त्रमें कहा हैं कि बुद्धिरूपी वज़नकॉंटे में एक तरफ अन्य सभी धर्मों को रखे और दूसरी तरफ मात्र एक साधर्मिक भक्ति को रखे, तो दोंनो का वज़न समान होगा| अर्थात् अन्य सभी आचरण किये हुए धर्मसे जो पुन्यकमाई होती है, वह ही पुन्यकमाई साधर्मिक भक्ति करने मात्रसे प्राप्त होती है| क्योंकि आज का साधर्मिक कल का तीर्थंकर, गणधर, युगप्रधानाचार्य या शासनप्रभावक श्रावक भी हो सकता है| यहॉं साधर्मिक यानी दीन-गरीब ऐसा अर्थ नहीं समझना| कई बार ऐसी गलत मान्यता देखने में आती है| साधर्मिक यानी- हम जो देव-गुरु-धर्म को मानते हैं, पूजन-वंदनादि करते हैं, उन को ही देव-गुरु-धर्म को मानकर, पूजन-वंदनादि करके अपनी आत्मा का कल्याण करनेवाला जीव|

थराद के आभु श्रावक की साधर्मिक भक्ति की प्रशंसा की जाती थी, इसलिए परीक्षा करने हेतु पेथड़शा मंत्री के पुत्र झांझणशा – चतुर्दशी के दिन हज़ार साधर्मिक को लेकर यकायक आभु श्रावक के यजमान होकर आये| आभु श्रावक तो चतुर्दशी होने से पौषध में थे| तब छोटेभाई जिनदासने पौषधमें रहे हुए बडे भाई आभु की सलाह लेकर उत्कृष्ट द्रव्योंसे भक्ति करके सभी साधर्मिक को उत्तम पहिरावनी दी| आज – कल लाख रुपिये का सुकृत करनेवाले को भी साधर्मिक को घर ले जाकर प्रेमसे भोजन कराना अच्छा नही लगता| अरे भाई ! यह जिमाना सिर्फ भोजन कराना नहीं है, यह तो धर्म-संबंध जोड़ने की भूमिका है|

मुंबई का एक बिलकुल नास्तिक युवक सुरेन्द्रनगर आया| वहॉं उपाश्रयमें बिराजमान आचार्य भगवंत को नमन किये बिना-हाथ जोड़े बिना ही पत्र देकर कहा… कि.. मैं यहॉं व्यापार के प्रयोजन से आया हूँ| इस होटल में ठहरा हुँ| आपके भक्तने आपको यह पत्र पहुँचाने के लिए दिया है| प्रत्युत्तर देना हो तो पत्र लिखकर रखना, मैं शाम को आकर ले जाऊँगा| बस इतना ही कहकर जब चलने लगा, तभी वहॉं के ट्रस्टी पूजा करके वंदन करने उपाश्रयमें आये| यह युवक अन्यत्र से आया है ऐसा जानकर अपने घर ले जाने के लिए आग्रह करने लगे| उस युवकने कहा- मैं सिर्फ कहनेभर का जैन हूँ| मैं तो प्रभुदर्शन करने के लिए भी नहीं जाता| मुझे उसमें श्रद्धा ही नहीं है| मैं कोई साधु को भी वंदन करने के लिए नहीं जाता| जमीनकंद भी खाता हूँ| रात्रिभोजन भी करता हूँ| मैं सब अपलक्षणों से पूरा हूँ | मुझे किसीके घर जिमना अच्छा नहीं लगता| इसलिए मैं आपके घर नहीं आ सकुंगा| मैंने तो इस साधु भगवंत को भी वंदन नहीं किया| मैं तो सिर्फ पत्र पहुँचाने आया हूँ| ट्रस्टी श्रावकने उसकी बात को पकड़ ली| आप उपाश्रयमें पधारें और आचार्यभगवंत के पास आये इसलिए हमारे लिए आदरणीय साधर्मिक ही हो| आपको घर पर आना ही पड़ेगा| आचार्य भगवंतने भी उस युवक को संकोच रखे बिना जाने के लिए कहा|

अति आग्रह से युवक को उनके घर जाना पड़ा| जिमकर आते ही तुरंत वह युवक आचार्य भगवंत के चरणोमें आकर उनकी गोदमें सिर रखकर सिसक-सिसककर रोने लगा| जीवनमें किये हुए सभी पापों का एकरार करने लगा| आचार्य भगवंत के पास जमीनकंद-रात्रिभोजन त्याग-जिनपूजा इत्यादि अनेक नियम ग्रहण किये| युवक की जीवनधारा और विचारधाराने यकायक ण टर्न लिया| ऐसे यकायक परिवर्तन को देखकर आश्चर्यचकित आचार्यभगवंतने युवकसे परिवर्तन का कारण पूछा…तब युवकने कहा- मेरे अत्यंत नास्तिक होने पर भी इस श्रावकने मुझे साधर्मिक मानकर मिष्ट-भोजन जिमाया| उनके घर की हरएक व्यक्तिने मेरे प्रति प्रेमभाव दिखाया और अंतमें कुमकुम से तिलक करके पहिरावनी भी दी| ऐसा अनुभव मैंने घर पर भी कभी नहीं किया| ऐसे स्वागत से तो मुझे बेचैनी होने लगी और मेरी अंतरात्मा बोल उठी कि… तू नाम मात्रका साधर्मिक है और ये तुझे उत्कृष्ट साधर्मिक समझ कर तेरा सत्कार कर रहे हैं, तुझमें ऐसे सत्कार की योग्यता है क्या ? अनजाने लोग एक मात्र जैन साधर्मिक की पहचान से तुझे इतना प्यार दे रहे हैं और तुझे जैन होनेकी कोइ फर्ज या योग्यता का विकास करने का जी चाहता है क्या ? साहब ! क्या बात करुं ? इस श्रावक का पवित्र भोजन जबसे मेरे पेट में गया है तबसे मेरे हृदयमें तुफान मचने लगा है| मैंने निर्णय किया है कि अब मुझे इस भोजन के और इस सन्मान के योग्य बनना ही पडेगा| और साहब ! आपके पास आकर मैंने मेरी जिंदगी की काली किताब खोल दी |

पर्युषण महापर्व   कर्तव्य दूसरा
बात यह है कि… यथार्थ साधर्मिक भक्ति क्या कमाल कर सकती है ? साधर्मिक भक्ति का अर्थ ही यह है कि – हमेशा साधर्मिक को अपना चहेता ही समझना| सवचंद सेठ की बहते आँसु के साथ लिखी हुई सवा लाख रू. की हुंडी सोमचंद सेठने साधर्मिक के रिश्ते से स्वीकार कर ली और उनकी इज्जत रखी | इस साधर्मिक-संबंध को अमर करती शत्रुंजय पर आज भी सवा-सोमा की टुंक स्मृति के रूप में खड़ी है| वर्तमान में भी एक भाई को पता चला की अपने एक कडे प्रतिस्पर्धी को दिवाला निकालने की नौबत आई है, तब उस भाईने रात के बारह बजे रोकड बीस लाख रू. खानगीमें देकर प्रतिस्पर्धी की इज्जत को बचा ली| ऐसा सत्कार्य करने के पीछे एक ही शुभाशय था कि मेरे साधर्मिक की इज्जत याने मेरे धर्म की और उस रीतिसे मेरी भी इज्जत है| आज-कल कई लोग साधर्मिक के ही पैसे लेकर दिवाला निकालते हैं| बादमें साधर्मिक को रोता हुआ छोडकर स्वयं तो जलसा मनाते हैं यह बिलकुल अनुचित कार्य है|

कुमारपाल राजाने अपने गुरु कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य सूरि महाराज को खद्दर वस्त्र पहनने के लिए मीठी टीका करते हुए कहा कि इसमें तो मेरी बेईज्जती हो रही है| तब कलिकाल सर्वज्ञ जी ने कहा… साधु की शोभा कीमती कपड़े से नहीं, निर्दोष सादे कपड़े से है| यदि आपको सच्ची शर्म आती है तो, मुझे ऐसे वस्त्र का दान करनेवाले साधर्मिक की कैसी कंगाल हालत होगी यह सोचकर शर्म आनी चाहिए| आप जैसे बडे राजा के राज्य में ऐसे साधर्मिक होना यह बडे शर्म की बात है| इस संकेत के बाद कुमारपाल राजा हर साल एक करोड़ सोनामुहर साधर्मिक-भक्ति के सत्कार्य में व्यय करतें थे| आज-कल के समृद्ध जैन उपभोग के साधनमें, फैशन में, मोज-शौक में जिस तरह पैसा का फिजूल खर्च करते हैं और बाद में साधर्मिक को ५० रू. देने के प्रसंग पर मुँह बिगाड़ते हैं, यह देखकर कहना पडता है कि, जो स्वयं के लिए अत्यधिक उदार है वह अन्य के लिए संकीर्ण है| हर महिने अपने पुत्र को पोकेट मनी के रूपमें ५-५ हजार रू. देनेवाले पिताजी के पास कोई साधर्मिक मदद की याचना करे तो उसे फिटकार-तिरस्कार के अलावा कुछ नहीं मिलता| तीन महिने पहले कोई साधर्मिक को १०० रू. दिया हो और बादमें फिरसे लेने के लिए आये तो उसे डॉंटते हैं कि… बार बार क्यों मांगने के लिए आ जाते हो ? उस समय तो आपको १०० रू. दिया था| तो मेरा आपसे यह प्रश्न है कि आपके घरखर्च में १०० रू. कितने दिन तक चलते हैं?

आज भी ऐसे महानुभाव दिखाई देते हैं जो हर बात में साधर्मिक को आगे करते हैं| एक धनवान ने पुत्र की शादी के अवसर पर, समाज में श्रीमंतो को २००-३०० रू. की थाली जिमवाने का दिखावा का जो रिवाज था उसे तोड़कर मेहमानों को २५-३० रू. वाली थाली जिमाकर भक्ति की| बादमें बचाई हुई रकममें से करीब ७-८ साधर्मिक को १-१ लाख रू. का बीमा करके दिया| साधर्मिकों के नाम जाहिर किये बिना ही यह साधर्मिक भक्ति की बात अपने मेहमानवर्ग के आगे पेश की और उन को भी इस रीतिसे अपने धनको सार्थक करने की बिनती की| विहार के क्षेत्र में धंधे टुट जाने के बावजूद साधर्मिक आज भी साधु-साध्वीजी भगवंत की भक्ति करते हैं| यदि आपकी शक्ति हो तो कम से कम एक साधर्मिक कुटुंब की जिम्मेदारी का संकल्प करना चाहिए और उनके मेड़ीकल-पढ़ाई इत्यादि का खर्च भी उठाना चाहिए| गरीब साधर्मिक को लाभ नहीं मिलने के कारण बहुत लोग चढ़ावा का विरोध करते हैं| यह विरोध उचित नहीं है| उचित तो यह है कि स्वयं चढ़ावा लेकर उन्हें लाभ दे! निश्चय करें कि कभी भी साधर्मिक के पैसे डूबाना नहिं… और गिरते हुए साधर्मिक को साथ देना और कभी भी साधर्मिक की निंदा तो करना ही नहीं | स्वजन का संबंध अनंतबार मिलता है जब कि साधर्मिक का संबंध अनंतकाल के बाद मिलता है| साधर्मिक भक्ति-साधर्मिक वात्सल्य की शुभ शुरुआत भरत-चक्रवर्ती से हुई है|

अपने गॉंवमें आनेवाले हर एक साधर्मिक को श्रीमंत बनानेवाले श्रावक, साधर्मिक भक्ति के विषय में इन्द्र की परीक्षा में पार उतरनेवाले दंडवीर्यराजा इत्यादि कई श्रावक अतीतकालमें हुए हैं| वर्तमानकालमें भी साधर्मिक को नौकर के रूपमें नहीं, किन्तु मित्रके रूपमें मानकर, पगार नहीं प्रोत्साहन देनेवाले श्रावक, स्वयं चढ़ावा लेकर प्रथम पूजा का लाभ साधर्मिक को देनेवाले श्रावक, साधर्मिक को पूजा-प्रवचन-प्रतिक्रमण में सहायता करनेवाले श्रावक, साधर्मिक के उत्कर्ष हेतु करोडो रूपियों का लाभ लेनेवाले और साधर्मिक की निंदा-अवहेलना रोकने हेतु सक्रिय प्रयत्न करनेवाले श्रावक… सचमुच संसाररूपी जलते हुए रेगिस्तान में प्रेम-आश्वासन की मीठी प्याउ समान हैं| वे मारक धनको तारक बनाते हैं, समुद्र के खारे पानी समान वस्तु को बादलके मीठे पानी समान बनाते हैं| प्रमोदभावना और गुणानुराग द्वारा गुणोकी गंगा को अपने आत्मघरकी ओर बढ़ाते हैं|

सांतनु का द्रष्टांत :

सांतनुं का पुण्य खत्म होने पर वह अत्यंत निर्धन अवस्था में आ गया| तब ‘जिनदास सेठ के वहॉं चोरी करो, वह श्रावक है इसलिये आपको पकडवायेगा नहीं|’ ऐसी पत्नी की सलाह मानकर प्रतिक्रमण करने के बहाने उपाश्रय में गया| वहॉं प्रतिक्रमण करने आये जिनदास सेठने सामायिक में साधु की तरह बनने के लिए निकाला हुआ हीरों का हार सांतनुं ने चुरा लिया| पता चलने पर भी जिनदास सेठने हो-हल्ला नहीं मचाया| दूसरे दिन सांतनुं उसी हार को गिरवी रखने जिनदास सेठ के पास गये| फिर भी मानो कुछ हुआ ही नहीं, कुछ पता ही नहीं, ऐसा व्यवहार करके हार गिरवी रखकर रुपये दिये| सांतनुं ने उस रुपयोंसे व्यापार करके धन कमाया और फिरसे श्रीमंत बने| अब जिनदास सेठ को उनके रुपये वापस लौटाने गये| जिनदास सेठ उनका गिरवी रखा हार वापस देने लगे| तब सांतनुं अपनी चोरी की बात पर रो पडे| सेठने कहा ‘गलती आपकी नहीं, मेरी है| मैंने मेरे साधर्मिक का ख्याल नहीं रखा| मैं साधर्मिक वात्सल्यका धर्म चूक गया|’
ऐसी साधर्मिक भक्ति बहुत जरुरी है|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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