post icon

पर्युषण महापर्व – कर्तव्य पहला

पर्युषण महापर्व   कर्तव्य पहला

“कर्तव्य पहला – अमारि प्रवर्तन”

धर्मका मूल दया है -

दया धर्मका मूल है, पापमूल अभिमान,
तुलसी दया न छोड़ीये, जब लग घटमें प्राण||

जब दया जीवनकर्तव्य है, तब पर्युषण का तो महाकर्तव्य बनता ही है| इसे प्रथम नंबर का कर्तव्य समझना, क्योंकि दयासे अपना हृदय मृदु-कोमल बनता है और कोमल हृदयमें दूसरे सभी धर्म अच्छी तरह से बास कर सकते हैं| भूमि को जोतकर मुलायम बनायी हो, तो ही उसमें बीज को बोया जा सकता है| इसलिए यहॉं पर्युषणमें दया-अमारि प्रवर्तन का पहला कर्तव्य पालन करके हृदयको कोमल-मुलायम सा बनाना है, जिससे उसमें साधर्मिक भक्ति, क्षमापना, त्याग, तपश्चर्यादि धर्मो को बोया जा सके|

अमारि यानी मारना नहीं| खुद कोई जीवको न मारे वह खुद का अमारि पालन-आचरण कहलाता है, किन्तु दूसरा भी कोई जीवको न मारे ऐसी व्यवस्था बनानी वह दूसरों के पास अमारि प्रवर्तन करवाया कहलाता है| कोई भी धर्म अमारि और दयाकी उपेक्षा कर ही नहीं सकता| दयारहित धर्म वास्तवमें धर्म ही नहीं है| वैसे ही धर्म में माननेवाले दयाशून्य हृदय के नहीं होते, इसलिए ही वे सहजतासे अमारि प्रवर्तन करते हैं| जीवमात्र पर दयाकी भावना चाहिए, क्योंकि जैसा स्वयं के लिए ऐसा जगतके लिए| सभी जीवोकी ढ़ेर सारे विषयोमें इच्छा-रुचि भिन्न-भिन्न दिखाई देती हैं, जैसे कि सिंहका भोजन अलग है – गाय का अलग, मनुष्य का अलग और चिंटी का अलग… मनुष्यों में भी सभीकी रुचियॉं अलग-अलग दिखाई देती हैं| किन्तु सभी जीवोंकी एक इच्छा समान है… सभी जीनेकी इच्छा करते हैं| कोई मरने की इच्छा नहीं करता| खुद अपनी तरह ही अन्य जीवो को भी दुःख पसंद नहीं है – सुख पसंद है|

जो थोड़े से दुःख में व्याकुल हो जाते हैं, वे दूसरे को दुःख कैसे दे सकते हैं ? क्योंकि जगतमें यह सनातन नियम है कि जैसा दिया वैसा पाया| इसलिए जिसे सर्व जीवों को अभयदान मिले ऐसी अभिलाषा नहीं है, वह श्रावक कहने योग्य नहीं है| जो सर्व जीवों को अभयदान देनेवाला नहीं है, वह साधु कहने योग्य नहीं है|

अमारि प्रवर्तन पहले घरमें शुरु कीजिए| पर्युषणमें आठ दिन और पारणा की पंचमी, मात्र नौ दिन हरी सब्ज़ी-भाजी त्याग का नियम लेनेमें यदि आप हिचकिचाते हो तो आपमें सत्व कितना ? १८ देशके सम्राट कुमारपाल महाराजा हर साल चातुर्मासके चार महिने हरी सब्ज़ी-भाजी का त्याग करते थे| मात्र पर्युषणके नौ दिन ही नहीं, चातुर्मास भरमें सभी १२०-दिन हरी सब्ज़ी-भाजी का त्याग करते थे| कितना सत्व! हृदय कितना कोमलता और करुणा से भरा !

महाराजा कुमारपालकी जीवदया और जीवो के प्रति करुणा ऐसी थी कि – अपने लश्करके ११ लाख घोड़े को भी पानी छानकर पिलाते थे| क्योंकि नहीं छाने हुए पानीमें लाखोकी संख्यामें त्रस जीवकी हिंसा होती है| इन जीवों की उनके दिलमें दया थी| महाराजा सवारी पर निकलते तब घोड़ेकी पलान पर बैठनेसे पहले पूंजणीसे पलानको पूंजते थे| जिससे वहॉं कोई जीवजंतु मरे नहीं|

दुर्गतिके द्वार और दुर्गतिमें घुमना कैसे बंद होगा ? नहाने-धोनेके लिए पानी चाहिए, किन्तु पानी छानेगा कौन ? पानी छाननेमें प्रमाद के कारण जीवों की हिंसा चालु रहे, क्या इस तरह दुर्गति के द्वार बंद होंगे?

साधु बनने की इच्छा करे वह श्रावक है| श्रावकको साधु बनकर सर्व जीवोंको अभयदान देनेकी कामना होती है| ऐसे श्रावक को मिट्टी-नमक-पानी-सब्जी-भाजी-हरी वनस्पति इत्यादि एकेन्द्रिय जीव पर भी कितनी दया होती है ? उनकी हिंसाके प्रसंग पर भी उसका हृदय आक्रंद करने लगता है|

पर्युषण महापर्व   कर्तव्य पहला
पानी की एक-एक बुंद में, पंखे के (जिसकी हवा तुम्हे पसंद है) प्रत्येक चक्कर में असंख्य जीवों की बिना कोई गुनाह मौत होती है| हरी सब्जी-भाजी, फल इत्यादि बहुत भाता है, धनिया उपरसे छिडककर टेस्ट लेने में मजा आता है, पर जैन कहलाते आपको क्या इन सब जीवों की हिंसा दिखाई देती है ? जिनकी गिनती जीवों की माता के समान होती हैं ऐसे जैन को क्या इसमें दर्द होता है ?

एक जैन कन्या का विवाह तय हुआ| कन्या ससुराल गई| घर पर तो रसोई बनाने की चिंता नहीं थी, परंतु ससुरालमें तो खाना पकाना ही पडेगा| इसलिए वह रसोई घर में गई| वहॉं तो सब्जी काटना-छीलना और चूल्हा सुलगाना| उसके लिए रखे हुए उपले को देखा| एक उपले को हाथसे तोड़ा तो उसमें उसने छोटे-छोटे कीट को देखे| जीवविचार पढी हुई वह कन्या यह सब साक्षात देखते ही कॉंप उठी | पूरी जिंदगी ऐसा कत्लखाना चलाने की कल्पनासे हृदय कॉंपने लगा| घर लौटकर के निर्णय किया- शादी नहीं करनी है और दीक्षा ले ली|

आखिर आपको इतना तो ख्याल होना यदि ऐसी ही चाहिए कि जैसा भाव वैसा भव| मुझे एकेन्द्रिय में, पानी में या वनस्पतिमें जाना नहीं है और किसीके हाथसे कटना-छीलना भी नहीं है| यदि ऐसी इच्छा हो, तो ही वनस्पतिकी रक्षा करने का मन होगा| हरे धनिये के स्वाद में यदि आयुष्य का बंध हुआ तो हरे-धनिये के रूपमें ही उत्पन्न होना पडेगा| आमका मजा लूंटने के पहले निश्चित कर लो कि कहॉं उत्पन्न होना है, रत्नागिरि की वाड़ीमें या वलसाड़ की ? देखना…. होटेलीयन मित्रोंके पीछे और जीभके स्वादसे कहीँ अपनी दुर्गति न हो जाये| आप श्रावक हैं, आप परम अहिंसा के आचारक और उपदेशक प्रभु के साथ जुड़े हुए हो| आपकी दुर्गति हो उसमें जैनधर्म पर कलंक है… क्योंकि जैनधर्म की गारंटी है कि जैन श्रावक भी मरके अवश्य वैमानिक दैव होता है, क्योंकि वह स्वाद, शौक या लोभ से भी गलत-पाप नहीं करता, हिंसक धंधा नहीं करता, आरंभ-समारंभ से कमाई नहीं करता, क्योंकि श्रावक यमदूत नहीं, प्रभु का दूत है, यतनावाला है, अहिंसा का उपासक है| गन्ना मीठा है, उसके सारभूत गिनाई जाती मिसरी ज्यादा मीठी है, और उसके कुचे नीरस हैं| मिसरी का संग्रह होता है, उसकी ही कीमत है और कुचे फेंकने लायक बन जाते हैं| मानवभव जीवमैत्री की मधुरता से गन्नके समान है| उसमें भी दुर्जन-दुष्टों के प्रति भी मैत्र्यादि भावो से जैनी ज्यादा सारभूत है, एकेन्द्रिय तक की अहिंसासे जैनोंका मैत्रीभाव वास्तविक है| इसलिए जैन मानवोमें भी सारभूत मिसरी समान है, उसका सद्गतिमें संग्रह होता है| शौक के लिए, भोजन के लिए, अनुकुलता के लिए या प्रमाद के लिए जो लोग जीवोंकी हिंसा करते हैं, उनके हृदयमें से मैत्री का मधुर रस खत्म हो गया है| इसलिए वे सभी कुचेके समान हैं| दुर्गति में पटक जानेवाले हैं|

पर्युषण महापर्व   कर्तव्य पहला
आप सब्जी लेने जाते हैं तो भी आपका हृदय सब्जी खानेके शौकमें न होकर जीवदया के भाव में होना चाहिए| मटर-भिंडी आदि में रहा हुआ ढोला-पिल्लू आपके हाथमें आए तो अभयदान को प्राप्त करेगा| आपको थोड़े पैसे के खर्चमें जीवदयाका लाभ मिलेगा| नहीं तो होटलआदिवाले कम दाम में ले जायेंगे तो सब्जी के साथ बेचारें उबल जायेंगे|

मकान – रास्ता और फर्नीचर की प्रशंसा कभी मत करना, क्योंकि पृथ्वीकाय – वनस्पतिकाय – अप्कायादि की घोर हिंसाकी अनुमोदना का पाप लग जाता है| कैसा सुंदर मकान ! कैसा मनोहर फर्नीचर ! कैसा सुंदर आस्फाल्ट का रोड़ ! वगैरह शब्द सिर्फ शब्द ही नहीं, असंख्य भवोमें दुर्गति को खींचकर लानेवाले लसदार कर्मोसे भरे हुए हैं| ऐसे शब्द श्रावक के मुँह पर शोभा नहीं देते|

कुमारपाल राजा के राज्य में ‘‘मार’’ शब्द नहीं बोला जाता था| एक सेठानीने जूँ को मारा तो उसे जिनालय बंधवाने का दंड किया| दंड भी कैसा ! खुदके भंडार भरने का नहीं, परंतु परमात्मा के जिनालय बनाने का ! दंड भरनेवाले का भी हित हो जाए और जिनालय के दर्शन करने वाले का भी हित हो जाए|

बहनोई अर्णोराजाने ‘‘मुंडिया को मार’’ इतना मजाक में बोला था तो क्षमा मँगवाने के लिए युद्ध किया| और आज हम जैनी कि जो ‘‘सब्जी काटा’’ इत्यादि के बदले ‘‘सब्जी को सुधारा-समारा’’ ऐसा बोलकर हिंसक शब्द प्रयोग नहीं करनेवाले आज ‘‘फोन करुँगा’’ इत्यादि के बदले ‘‘मोबाइल मारुँगा’’, ‘‘रींग मारुँगा’’ ऐसे शब्दप्रयोग करने लगे हैं| यह उचित नहीं| हमें तो ‘‘एक कंकर से दो पंछी को मारा’’ ऐसा भी नहीं बोलना चाहिए| किन्तु ‘‘एक पंथ और दो काज’’ ऐसा शब्द प्रयोग करना चाहिए| अपनी वाणी में भी हिंसा को बढ़ावा मिले या हिंसा की अनुमोदना हो ऐसे शब्दप्रयोग नहीं होने चाहिए| क्योंकि घोर हिंसा में डूबे हुए इस जगत को अब अहिंसा का पाठ मात्र जैनों के पास से ही मिले ऐसे संयोग खडे हुए हैं| इस तरह आज अहिंसा की मोनोपोली मात्र जैनो के पास ही है, इसलिए ही जैनी के रूपमें आपकी जवाबदारी ज्यादा है|

कुमारपाल राजा चातुर्मास के चार महिने अहिंसा की भावना से पाटण को छोड़कर बाहर नहीं जाते थे| आपको तो चातुर्मास में यात्रा के नाम पर भी गॉंव नहीं छोड़ने का नियम है न ? अठारह देशमें अखंड अमारि प्रवर्तक कुमारपाल राजाने कंटकेश्वरी देवी को सालों की परंपरारूपसे दिया जानेवाला भैंसा का बलिदान अपने जान जोखों पर बंध करवाया था| हमारी अगर ऐसी संवेदनशीलता होगी तो ऐसे पर्वदिनो में बूचड़खाने में जाते कितने सारे पशु-पंछीओं को बचाने की भावना होगी ? कुमारपाल राजाने पौषध में मकोड़ा शरीर पर चिपकने पर मकोड़े को बचाने हेतु उतनी चमड़ी काट के अलग कर दी| आपको मच्छर काटे तो झापट नहीं मारोगे न ?

कुमारपाल राजा घोडे पर सवार होने से पहले पुंजते थे… आपका सभी काम पुंजने-प्रमार्जने पूर्वक ही होता है न ! अमदावाद के एक भाई ने पर्युषणमे यह पुंजने-प्रमार्जने की बात सुनी| दूसरे दिन गैस-स्टव चालु करने से पहले प्रमार्जने गया तब करीबन १५० चींटीयॉं जिंदा बाहर निकली| तब से वे हर एक बात में सावध हो गये| आप भी कपडे धोने डालने से पहले, दूधमे सक्कर मिलाने से पहले, गैस-स्टव इत्यादि चालु करने से पहले, कोई भी बर्तन का इस्तेमाल करने से पहले, खिडकी-दरवाजा बंद करने से पहले, कपडे इत्यादि पहनने से पहले…. इत्यादि-इत्यादि कार्यों करने से पहले यदि सावधानी पूर्वक देखने-प्रमार्जने की आदत रखोगे तो बहुत सारी जीवहिंसासे बच सकोगे | इसलिये तो कहा जाता है कि श्रावक के घर पर चरवली, चरवला और चँद्रवा सुलभ ही होते हैं|

पर्युषण के पांच कर्तव्यों में प्रथम अमारिप्रवर्तन सभी धर्मों के मूलरूप है, सभी धर्मों को हरे-भरे रखनेवाली करुणारूप नदी समान है, सभी जीवों को दिया जा सकें ऐसा उत्कृष्ट दान है| तमाम जीवों को आनंदित कर देनेवाली अद्भुत सौगाद है| विशेष तप-जप आदि नहीं करनेवाले साधु को पंच परमेष्ठी में नींवका स्थान देनेवाला, अरिहंतो को जन्म देने वाला, दुश्मन को भी दोस्त बनाने वाला है यह अमारि प्रवर्तन|

पर्युषण महापर्व   कर्तव्य पहला
अमारि प्रवर्तन अपने जीवन में हिंसक-हिंसाजन्य साबुन, चमड़े के बूट-चप्पल-पाकीट-पट्टा, टीक ट्वेन्टी, पेस्टीसाईड, बाजार के अखाद्य पदार्थ इत्यादि के त्याग से शुरु करके घरमें पानी, अग्नि, वनस्पति इत्यादि के उपभोग में मर्यादा रखके और दुनिया में जयणा व जीवदया के लिए तन-मन-धन से प्रेरक-बल बनकर फैला सकते हैं| कमसे कम इतना तो निश्चय करो कि सिर्फ अपने लिए पंखा चालु नहीं करना, सिर्फ अपने लिए ही चूल्हा जलना नहीं चाहिए| देखिये, आप जिसे गुरुभगवंत मानते हो, वे गुरुभगवंतो ने नौ तरह के जीवों की रक्षा किस प्रकार की, उनके द्रष्टांत सुनिये….

महानिशीथ सूत्र में बताये हुए श्री वज्रआर्यसूरि ने सचित्त पृथ्वी की विराधना करने के बजाय सिंह का भक्ष्य हो जाना पसंद किया और पृथ्वीकाय की रक्षा की|….अपने उन्मार्ग-गामी शिष्यों को ठिकाने पर लाने के लिए ये आचार्यभगवंत उनके पीछे-पीछे गये| शिष्य तो सचित्त-अचित्त मिट्टी की परवाह किये बिना दौड रहे थे| आचार्य भगवंत पृथ्वीकाय की हिंसा न हो इसलिए जयणा का पालन करते जा रहे थे| उसमें यकायक सामने से सिंह आया| यदि सचित्त पृथ्वी पर पैर रखके भाग जाते तो बच जाते, किन्तु पृथ्वीकाय की हिंसा न हो इसलिए आचार्य भगवंतने भाग जाने की जगह वहीं ही अनशन कर लिया| सिंह के भक्ष्य बनके वहीं कैवल्यज्ञान की प्राप्ति करके मोक्ष में पहुँच गये|

उत्तराध्ययन सूत्र में सूचित किया है कि….पितामुनि के द्वारा प्रेरणा होते हुए भी भारी प्यासमें मृत्यु को पसंद करने वाले परंतु सचित पानी के द्वारा अप्काय जीवो की विराधना पसंद नहीं करनेवाले बालमुनि के द्वारा अप्काय जीवो की रक्षा की गई|

कैवल्यज्ञानी पुष्पचूला साध्वी के कहने से कैवल्यज्ञान पाने के लिए अर्णिकापुत्र गंगा नदी पार करने गये तो वहॉं देवने मरणांत उपसर्ग किया, तब अपने शरीर से गिरते हुए खूनके बूंद से नदी के असंख्य अप्काय जीवों की विराधना देखकर कॉंप उठे और उनकी चिंतामें आचार्य भगवंतने कैवल्यज्ञान प्राप्त कर लिया| आपको स्नान-घर में नहाते, स्वीमिंग बाथ में जाते, बेसीन में हाथ धोते, बेहद दुर्व्यय हो रहे पानी में असंख्य जीवों की हिंसा होती हुई दिखाई दे और हृदय कॉंप उठे, तो ऐसा दुर्व्यय बंद होगा|

हार्निया के ओपरेशन बाद होश में आते ही गरमागरम चाय पिलाने की डॉक्टर की सिफारिश होने पर भी, शारीरिक अवस्था को गौण करके अपने लिए बनाई हुई चाय का स्पष्ट निषेध करके पूज्यपाद गुरुदेवश्री विजय भुवनभानुसूरीश्वरजी महाराजाने तेउकाय की रक्षा की|

मरणांत पीड़ा में भी, हार्टअटेक से अधिक घबराहट-पसीना होने पर व्याकुलता को दूर करने के लिए मुनिराज के द्वारा की गई वस्त्र से हवा डालने की चेष्टा को वायुकाय की विराधना के रूप में गिनाकर रोकनेवाले पूज्यपाद परम गुरुदेव श्री विजय प्रेमसूरीश्वरजी महाराजाने वायुकाय के जीवों को अभयदान दिया|

सर्पदंश से बेहोश होने पर वैद्यमुनिने हरे पान के रससे ज़हर उतारा ऐसा जानने मात्र से वनस्पति की विराधना के प्रायश्चित के रूपमें जिंदगीभर हरी-वनस्पति का त्याग करके पूज्यपाद आचार्यदेव श्री सोमसुंदरसूरि महाराजाने वनस्पतिकाय के जीवों की रक्षा की|

उदर में कृमि की पीडा से एक साधु पीडित थे| उन की बहन श्राविका ने कृमि को निकालने का औषध मिश्रित कर के आहार बोहराया| साधु आहार कर के स्थंडिल गये| वहॉं पेट में से निकले और सूर्यताप से त्रस्त कृमिओं को देख कर स्वयं ताप सहन कर के उन को छाया से शाता दिया| बाद में बेइन्द्रिय जीवों की विराधना के प्रायश्चित्तरूप में अनशन कर लिया|

नागिलाने वहोराई हुई कटु तुंबडी की सब्जी के एक बुंदसे चींटियों की होती हुई विराधना को देखकर ज़हरीली तुंबडी की सब्जी खुद ही खा कर श्री धर्मरुचि अनगारने तेइन्द्रिय जीवों की रक्षा की|

उत्तराध्ययनमें सूचित किया गया है कि पूरी रात हज़ारो मच्छरों के दंश सहकर एक भी मच्छर मर न जाए ऐसा उपयोग रखकर कालधर्म पानेवाले मुनिने चउरिन्द्रिय जीवों की रक्षा की|

मस्तकपर चमड़े की बद्धि का कष्ट सहन करके केवलज्ञान-मोक्ष पानेवाले मेतारज मुनिने क्रोंचपंछी – पंचेन्द्रिय जीव की रक्षा की| ये अमारि के दृष्टांत हैं|

जीवदया पालन से भवपार होने वाले चारुदत्त, अघटकुमार इत्यादि के दृष्टांत हैं|

अकबर ऐसा क्रूर था कि अपनी प्रशंसा न करने वाले कवि गंग को हाथी के पैरौं तले कुचल दिया| वह इतना हिंसक था कि हररोज़ उसे चिड़िया की सवा सेर जीभ खाने के लिये चाहिये| जंगलोमें बहुत दिनों तक शिकार करते रहता था| वह बहुत ही कामी था| स्त्रियों का बाज़ार भरवाके मनपसंद स्त्री को जबरदस्ती से पकडकर जनानखाने में रख देता था| उसी अरसे में चंपा श्राविकाने छः महिने के उपवास शुरु किये| संघने तप की अनुमोदना व शासनप्रभावना के निमित्त को पाकर के हररोज़ बैंड-बाजा के साथ जिनालय में दर्शन-चैत्यपरिपाटी का आयोजन किया|

मासक्षमण और उससे बड़े तप वाले महानुभवो के लिए संघ को ऐसी सुंदर व्यवस्था बनाकर तपस्वी बहुमान के साथ सुंदर शासन प्रभावना करनी चाहिए|

एकबार अकबरने बैंड-बाजा को देखकर पूछताछ करवाई| चंपाश्राविका के छः महिने के उपवास सुनकर चौंक उठे| रमज़ान में हररोज दिन के बारह घंटे का रोज़ा भी कष्टदायक लगे, वहॉं यह बात तो आश्चर्यकारक ही लगेगी न ! उपवास की सच्चाई की जॉंच करने के लिए चंपाश्राविका को अपने वहॉं रखी| विशुद्ध तप और उसमें भी अप्रमत्तभाव से धर्मसाधनामय दिनचर्या से बादशाह प्रभावित हो गये| सम्यक्त्व के आठ प्रभावक में पांचवे प्रभावक के रूपमें तपस्वी को गिनाया है, यह बात सार्थक हुई| बादशाहने पूछा- आप इतना कठिन तप कैसे कर सकते हो ? किसके प्रभाव से कर रहे हो ? (आज का ज़माना व्यापारीकरण का है| सचीन तेंडुलकर सेन्च्युरी लगावे उसमें भी स्पोन्सर की गई कोई कंपनी के बूटका प्रभाव हो सकता है ! आजके खिलाड़ी के कपड़े, बूट, बेट सभी अलग अलग कंपनियॉं ने स्पोन्सर की हुई देखने मिलती हैं|) सच्चा जैन समझता है कि मेरे जीवन में जो कुछ, जहॉं कुछ, जितना कुछ भी शुभ, अच्छा, मनपसंद होता है, वह मेरे देव-गुरु के प्रभाव-कृपा से होता है| पूर्वभव में की गई जैन-धर्म की आराधना के प्रभाव से होता है| अर्थात् मेरी हर अच्छी बात के लिए देव-गुरु-धर्म ही स्पोन्सरर हैं| चंपाश्राविका ने ‘मुझे तप करने का अभ्यास है, मुझे तप करना रास आता है’ इत्यादिरूप में स्वप्रशंसा करने के बदले देव-गुरु के प्रभाव को बतलाया| उसमें प्रथम देव का स्वरूप समझाकर अरिहंत परमात्मा की महिमा का वर्णन किया| (आप प्रभु के स्वरूप-जीवन-महिमा का वर्णन कर सकते हो क्या ? भगवान कौनसे २० स्थानक की आराधना करते हैं ? भगवान का करुणाभाव कैसा होता है ? भगवान के पंच कल्याणक का स्वरूप कैसा है? भगवान कौनसे अठारह दोष से मुक्त हैं ? इत्यादि की आपको खबर है न ? यदि नहीं है तो, शीघ्र खबर पा लेना चाहिये| जिससे प्रभु के प्रति अहोभाव बढ़ेगा| और अन्यो को भी जैनधर्म के प्रति आकर्षित कर सकोगे|)

बादमें चंपाश्राविकाने गुरुके स्वरूप का वर्णन किया और जगद्गुरु हीरसूरि महाराज का परिचय दिया| (श्री हीरसूरि महाराज का स्वरूप अन्यत्र से जान लेना) अकबरने श्री हीरसूरि महाराज को निमंत्रण दिया| पहली ही मुलाकात में अकबरने बिछाई हुई लाल जाजीम पर पैर न रखकर जैन साधु की जीवदया का परिचय करवाया| जाजीम उठाने पर नीचे से चींटियों का घर निकला| बाद में तो निःस्पृह, करुणा के सागर, साक्षात् कोमलता की मूर्ति व सुविशुद्ध ब्रह्मचारी पूज्यश्री के प्रभाव से अकबर भी नये-नये राज्य जीतने के लोभ से मुक्त हुए| संपूर्ण मांसाहार व शिकार बंद कर दिये, स्त्रियों की वासना से भी मुक्त हुए| पूज्यश्री की प्रेरणा से प्रारंभ में तो पर्युषण के आठ दिन और अपनी ओर से आगे-पीछे दो-दो यानी कि बारह दिन अपने संपूर्ण राज्यमें अमारि का पालन करवाया| बादमें श्री शांतिचंद्र उपाध्याय ने कृपारसकोश ग्रंथ की रचना करके उसके माध्यमसे अकबर के हृदय में जीवदया का भाव बढ़ाया | युद्ध किये बिना कटक का राज्य जीतकर दिया| उसके बदले में अलग-अलग दिनों की गिनती से साल भरमें छः महिने तक पूरे राज्यमें अमारि का पालन करने का हुक्म दिया| अकबर ऐसे जीवदया के परिणामवाले हुए कि अपने तंबु के शिखर पर चिड़िया को अंडा रखते देखकर, जब तक उस अंडे में से चिड़िया तैयार होकर उड़ न जाये तब तक तंबु वहीँ ही रखने का आदेश दिया| अकबरने ही श्री हीरसूरीश्वरजी महाराज को ‘‘जगद्गुरु’’ की पदवी दी थी| मुस्लिम राजा के हृदय में ऐसी जीवदया बसी थी ! तो आपसे हमें कितनी बड़ी अपेक्षा होगी ?

पर्युषण महापर्व   कर्तव्य पहला
कोयल के मॉंस की कढ़ी छोड़कर कोयल को अभयदान देने से स्वरसाम्राज्ञी बनी हुई शान्ता आप्टे नाम की गायिका की जीवमैत्री अनुमोदनीय है| यह गायिका जब नृत्यकार थी, परन्तु गाने में कुशल नहीं थी तब एक यजमानने उसे नृत्य के लिए आमंत्रित किया और उसके स्वागत के लिए कोयल को पिंजरमें बंद करके रखी थी| उस ईलाकेमें कोयल के कंठमेंसे बनाई हुई कढ़ी लोकप्रिय थी| नृत्यांगनाने कोयल को पिंजरमें देखकर पूछताछ की, तब पता चला कि मेरे भोजन में कढ़ी बनाने के लिए कोयल का यह पिंजरा रखा गया है| नृत्यांगना यह सुनकर स्तब्ध हो गई| तुरंत ही कोयल को पिंजरे में से मुक्त करवाकर आकाश में उड़ा दिया बस, तबसे यह नृत्यांगना श्रेष्ठ कोकिलकंठी गायिका बन गई| कोयल की दुआ मिल गई|

उदयशंकर नृत्यकार गजेन्द्रमोक्ष नृत्य की पराकाष्ठा में जहॉं तालबद्ध पैर रखने गये, वहॉं ही तितली को देखकर उसे बचाने के लिए रुक गये| ऐसे यकायक रुक जाने के लिए बहुत ही परिश्रम करना पड़ा| उनकी जीवबंधुत्वभावना प्रशंसनीय है, क्योंकि उसमें नृत्य निष्फल जाने पर भी उनको तितली की जान बचानेका बहुत ही आनंद हुआ|

रानी के द्वारा अभयदान पर आनंदित चोर के दृष्टांत से सिद्ध हुआ अहिंसा-अमारि का प्रभाव| राजाने चोर को फॉंसी की सजा सुनाई| तब पहली रानीने चोर को एक दिन दस सोनामुहर खर्च करके भोजन करवाया| प्रतिस्पर्धा के भावसे दूसरी रानीने दूसरे दिन पचास सोनामुहर खर्च करके स्नान वस्त्रालंकार सहित भोजन करवाया| प्रतिस्पर्द्धा के भाव में तीसरी रानीने तीसरे दिन सौ सोनामुहर के व्यय से गीत-संगीत-नृत्य इत्यादि द्वारा बहुत अच्छा सत्कार किया| चौथी रानीने राजाको कहा ‘मेरे पास इनके सत्कार के लिए पैसे नहीं हैं| आप उनको माफ कर दो| बस, वही मेरी ओरसे सत्कार है|’ राजाने चोर को अभयदान दिया| चारो रानी में से सबसे सुंदर सत्कार किसने किया ? उसके विवादपर निर्णयमें चोरने कहा- मुजे मृत्यु दिखाई देती थी, इसलिए दूसरी रानीओं की भक्ति-सत्कार की मेरे मनमें कोई स्मृति नहीं है, और अंतिम रानी ने अभयदान दिलवाया इसलिए ही मेरी जान में जान आई | अभयदान मिलने मात्र से मुझे सब कुछ मिल गया है|

जैसे टी.वी., पंखा जैसी अन्य सभी अनुकूलताऐं इलेक्ट्रीसीटी पर निर्भर हैं| उसके बिना ये सभी अनुकूलताऐं व्यर्थ हैं| ऐसे जीवनमें अन्य सभी सुख-भोग या अन्नवस्त्र-खानपानादि आयुष्य पर आधारित हैं| आयुष्य पूर्ण हो जाये तो बाकी सभी का क्या अर्थ रहे ? इसलिए ही कहा जाता है की अभयदान देनेवाले ने सब कुछ दिया है और जीवदया का पालन नहीं करनेवाले ने सबकुछ लूँट लिया है| आप का घर यानी श्रावक का घर – सभी जीवोकी मॉं का घर| यहॉं तो दर में से निकलने वाली चींटी को भी मानो भरोसा रहता है कि मुझे कुछ तकलीफ नहीं होगी| इतनी सावधानी तो होनी चाहिए कि बारिश आने से पहले, जीवजंतु पैदा होने से पहले ही घर-फर्नीचर-गद्दी-शय्या-इत्यादिमें ऐसी रचना-व्यवस्था-पूर्वसावधानी हो जाये कि फिर चातुर्मासमें दीमक-खटमल इत्यादि का उपद्रव न हो और उनको खत्म करने की दुर्बुद्धि से हिंसक दवायें उपयोगमें नहिं लेनी पड़े| आपके घरमें आने-जाने का रास्ता भी ऐसा कर देना चाहिए कि बादमें चातुर्मासमें हरी-वनस्पति या निगोद पर पैर रखकर आने-जाने का पाप न हो|

पर्युषण महापर्व   कर्तव्य पहला
ख्याल रखना ! आज आपने किसी की जीवदयाका पालन किया होगा, तो कल कोई आपकी जीवदया का पालन करेगा| आप व्यापार-घर इत्यादि की चिंता में बहुत आर्तध्यान करते हो, जिससे संभव है कि उस आर्तध्यानमें आयुष्य का बंध हो गया तो बादमें पशुका जन्म ही मिलेगा| आज आपने कत्लखाने में जाते हुए पशुओंको बचाया होगा तो हो सकता है कि आपको ऐसी परिस्थितिमें कोई बचानेवाला मिलेगा| नागदत्त के पिताजी सही-गलत करके सिर्फ धन ही बटोरतें रहे थे| उसका परिणाम यह आया कि परलोकमें बकरा बनके कसाई के घर जाना पड़ा| तब पुत्र ने भी सिर्फ दो रुपिये के लिए पिताजी को बचाया नहीं और कसाई के हाथों कटकर नरक के दरवाजे देखने पडे|

आज भी ऐसे प्रसंग बनते हैं कि केन्सर जैसी बीमारी के अवसर पर हररोज़ -पशुको बुचडखाने से छुड़ाने का सत्कार्य करने के प्रभाव से केन्सर की बीमारी से मुक्त हो गये हो| देखो…. यदि आज आपको निर्बल-बीमार शरीर मिला है, तो हो सकता है कि पूर्व जन्ममें जीवदया का पालन नहीं किया होगा| इसलिए इस भवमें जीवदया का पालन करने में लग जाओ| अमारि-प्रवर्तन से हर्ष-आनंद-प्रसन्नता का माहोल खड़ा होता है| जिससे आराधनामें हमारा उत्साह बढ़ता है| प्रचुर वर्षा होने पर चारों ओर हरियाली-आनंदमय वातावरण हो जाता है| अमारि से ही पर्युषणमें नया उल्लास प्रकट होता है| साथमें हिंसामें चकचूर रहनेवाले की भविष्यमें कैसी दशा होगी ? वह भी जान लेना चाहिए| हाथ-पग-कान-नाक-आँख के बिना सिर्फ मॉंस के लौंदे जैसा मृगावतीपुत्रके दुःखका वर्णन करके भगवानने कहा था कि पूर्वभव की घोर हिंसा के प्रभाव से इसकी ऐसी दुःखद हालत हुई है| खटमल के दंशसे बचने के लिए क्रूर लेश्या से खटमल को जला देने वाला स्वयं ही गेसके चूल्हे से जल गया इत्यादि वर्तमानमें भी ऐसे प्रसंग बन रहे हैं| इन बातों को ध्यान में रखकर जीवदया-अमारिप्रवर्तन को वेगवंत बनाने से शाता…आरोग्य…दीर्घायुष्य मिलता और सामुदायिक मृत्यु के प्रसंग में भी चमत्कारिक जीवनदान मिलता है|

जो वचन से भी किसीका ताना, मर्मवचन, तिरस्कार… अपमानादि न करता हो… अन्य तरीके से भी मानसिक जुल्म न करता हो… नौकर के पास वेतन से अधिक काम, शक्ति से ज्यादा भारको वहन करवाना, भोजनादि के समय अंतरायइत्यादि नहीं करता है वह जीवदया के मर्म तक पहुँच गया है| वह धर्मध्यान के रसायणभूत चार भावनाओं में भी मूलभूत मैत्री भाव को सिद्ध करता है और अनादिकाल से लिपटी हुई हथियाने-हडपने की वृत्ति, शोषण करने की वृत्ति, गरज का लाभ उठाने की मानसिकता को दूर करता है|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
Did you like it? Share the knowledge:


Advertisement

No comments yet.

Leave a comment

Leave a Reply

Connect with Facebook

OR