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पर्युषण महापर्व – तीसरा दिन

पर्युषण महापर्व   तीसरा दिन

पर्वाणि सन्ति प्रोक्तानि, बहूनि श्री जिनागमे|
पर्युषणासमं नान्यत् कर्मणां मर्मभेदकृत्॥
दक्षिण ध्रुवमें कई सालोंसे बरफवर्षा होती है| इसलिए जमीन पर बरफ के ऐसे स्तर जमे हैं कि ५-६ माईल तक खुदाई करने पर भी जमीन का स्पर्श नहीं कर पाते| मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योगके कारण अनंतभवोंसे अपनी आत्मा पर भी लगातार कर्मोंकी वर्षा हो रही है| प्रत्येक आत्मप्रदेश पर अनंत अनंत कर्म के पडल जमे हुए हैं| जब तक ये कर्म नही हटेंगे, तब तक आत्मामें शुद्ध ज्ञान का प्रकाश नहीं फैलेंगा और वास्तविक सिद्ध स्वरूप के अनंत सुखकी अनुभूति नहीं होंगी| इन कर्मोंकी जमी हुई परतों को यदि दूर करना है, तो सामान्य आराधनारूप हथौड़ी के प्रहार से काम नहीं चलेगा| इसके लिए तो बोंब धड़ाके करने पडेंगे… पावरफुल सुरंग फोडनी पड़ेगी| यानी कि तीव्र तप, संयम, ब्रह्मचर्य और ज्ञान पुरूषार्थ करने पडेंगे| ऐसे पुरुषार्थ करने का अवसर यानी कि पर्वाधिराज पर्युषण| इस पर्वाधिराज में हमें ऐसी उग्र साधना करनी चाहिए कि जिसके बलसे करारे कर्म तुट जायें| कषायो की परतें पतली हो जायें| विषय-वासना की शिलाएँ तूट कर चूर चूर हो जायें|

वैलन्टाईन डे हो या अन्य लौकिक त्यौहार हो, उसे मनाने का तरीका कैसा ? दारु, डीनर और डीस्को से ! जिनशासन में पर्वोंको दर्शन, दया और दानसे (प्रभुदर्शन-जीवदया-सुपात्रदान या क्षमादि दान) मनाया जाता है| लोकनेता स्वयंको भाषण, भोजन, भांडण (निंदा-गाली प्रदान) और भ्रमण से सार्थक मानते हैं| पर्वमें नेता-नायक समान इस पर्युषणको (पापके) भयसे, (प्रभुके) भजनसे, (साधर्मिक को स्वामिवात्सल्य में) भोजनसे और (शुभभावनाओंके) भावनसे सार्थक करना है|

हम तीर्थो में जाते हैं तब तीर्थके अचिंत्य प्रभाव से भावनाओ में बाढ़ आ जाती है| पर्वतिथियॉं हमारे पास आती हैं, तब उनका दान, शील, तप, भावनाओंके स्वस्तिक से हर्षपूर्वक स्वागत सत्कार, आवभगत करना चाहिए|

काफी भारी किंमत चूकाने के बाद यह भव मिला है, अब उसे चना-मुरमुरा जैसे भोगों के खातिर व्यर्थ खर्च नहीं करना चाहिए| प्रमाद को पुष्ट करने के लिए अन्य अनेक भव हैं, किन्तु प्रमाद को तोडनेका एकमात्र भव है मनुष्य भव| अब प्रमाद नहीं करना चाहिए|

अनेकानेक सेल्समेन रखते हुए भी जब कंपनी के माल की बिक्री कुछ खास बढ़ी नहीं, तब बोसने जॉंच करवाई| तब पता चला कि कुर्सी के संग सभी सेल्समेन आलसी हो गये थे इसलिए कुर्सी छोड़कर खडे होने या बिक्री के लिए बाहर घूमने के लिये तैयार नहीं थे|

इसलिए माह के अंतमें सेल्समेनों की मीटींग बुलवाकर प्रारंभिक प्रवचन के बाद बोसने सभी सेल्समेनों को कहा, ‘‘आप अपनी कुर्सी के तल में देखिए|’’ सभी सेल्समेन चौंक कर सड़ाक से उठकर कुर्सी के तल में देखने लगे| तब वहॉं सभी को दस रुपये की नोट चिपकाई हुई दिखाई दी|

बोसने स्मित देते हुए कहा, ‘‘उस दस रुपये की नोट आप आपके पास ही रखो और इससे इतनी नसीहत लेना कि रुपये पाने के लिए कुर्सी पर से खडा होना पडेगा|’’

पर्युषण महापर्व   तीसरा दिन
मुझे भी आपको यही कहना है कि यदि आपको पशुताके संस्कारोंको तोड़ना हो, धर्मसंस्कारो की कमाई करनी हो, तो अनुकूलताओं की, प्रमाद की कुर्सी छोड़नी ही पडेगी| यह मनुष्य भव प्रमाद के लिये नहीं, प्रमाद को झाड़ने के लिए है| वित्तका सर्जन करते करते हमने कई भवोंका विसर्जन किया| अब वित्त के सर्जन को गौण करके चित्त का सर्जन करें| चित्तका सर्जन यानी कि चैतन्य की सरगम… सद्भाव का संगीत… ऐसा अवसर शायद कभी ही मिलता है| अब तक तो सभी भवोंमें हमने पशुता का ही प्रदर्शन किया है| इस भवमें जब हमें जिनशासनकी प्राप्ति हुई है, तब पशुताका उत्सर्ग = त्याग और मानवता का सर्जन ही श्रेष्ठ कर्तव्य है| जिस जिनशासन और परमात्माकी प्राप्ति करके सुलसा इत्यादिने तीर्थंकर पदके परवाने की प्राप्ति कर ली| ऐसे परमात्माकी प्राप्ति करने के बाद हम इंसान भी न बन सकें, तो इससे अधिक शरमजनक बात और क्या हो सकती है ? आज तक थप्पड लगाने वाले कर्मसत्ता के हाथों से और ज्यादा थप्पड़ खानेकी परिस्थिति का सर्जन करना क्या योग्य है ? नहीं… नहीं… अब तो भूतकालमें की हुई भूलोंका पुनरावर्तन नहीं ही होना चाहिए| फर्स्ट क्लास की टीकीट लेकर आप सेकन्ड क्लास में बैठ जाएँ, वह नही पुसाएगा|

देखिए ! सुहावना पर्युषण पर्व चल रहा है, ‘पशु’मेंसे परमात्मा बनने की भूमिका इस पर्वकी सुंदर आराधनामें समाई हुई है| ‘संज्ञा’ (आहार, भय, मैथुन, परिग्रह)के जीवनमेंसे प्रज्ञा द्वारा आज्ञामय जीवनमें आनेका मौका इस पर्वसे ही प्राप्त होता है| पर्वका स्वागत करने से स्थूलमेंसे सूक्ष्म में आनेकी कला प्राप्त होती है| त्यौंहारो की मौसम में पूरे सालभरकी कमाई कर लेनेकी होंशियारी व्यापारीमें होती ही है| इसलिए इस विषयमें कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है| प्रमादको छोड़कर, अन्य सभी बातों को गौण करके, आत्महित को लक्ष्यमें रखकर, कल्याणकी राह पकडने का यह मौका बखुबी अपना लीजिये|

यह पर्युषण पर्व इलेक्ट्रीक का करंट देनेवाली शाल जैसा है| प्रमाद की गहरी नींदमें मस्त जीव जो चातुर्मास प्रवेश के समय पर बजे हुए बेन्डवाजा रूप घंटी की आवाज से जाग्रत नहीं होते, और घंटानादसे भी जाग्रत नहीं होते, उन सभी को जाग्रत करने के लिए तो यह पर्वाधिराज के रूप में इलेक्ट्रीसीटी के झटके की ही आवश्यकता है| प्रभुके जन्मकल्याणक के अवसर पर विषय-प्रमाद की नींदमें से इन्द्रको जाग्रत करने के लिए सिंहासन कंपायमान होता है| जाग्रत होकर इन्द्र दूसरें देव-देवियों को जगाने सुघोषा घंट बजाने का आदेश करते हैं| इस तरह मनुष्य को प्रमादमें से जाग्रत करने के लिए ऐसे पर्व आते हैं| ये पर्व वासना की खाई से उपासना के पर्वत पर ले जाने, क्रोधादि काषायिक भावों की आग में से क्षमादि सामायिक भावों के बाग में ले जाने, धर्ममें प्रमाद के स्थान पर प्रमोद को आत्मसात् कराने के लिये ही पधारते हैं|

एक प्रोफेसर बसकी लाईनमें खडे थे| एक घंटे तक खड़े रहने पर भी बस दिखाई नहीं दी| बसड्राईवर हड़ताल पर थे| बादमें टेक्सी के लिए इधर-उधर टांपनेपर आधे घंटे के बाद टेक्सी मिली| सीधे कूदकर अंदर बैठे| टेक्सी ड्राइवर से कहा, आप टेक्सी भगाओ, १०० कि.मी. की रफतार से भगाओ, क्योंकि मुझे जहॉं जाना था उस स्थान पर पहुँचने में देढ़ घंटा देर हो गई है | टेक्सी ड्राइवरने टेक्सी को स्पीडमें लेते हुए पूछा, ‘‘टेक्सी किस दिशा में जाएँ ?’’ तब उलझन में पडे हुए प्रोफेसरने कहा, ‘‘अरे! देढ़ घंटा तक बस-टेक्सी पकडने की छटपटी में मुझे कहॉं जाना है, वह भी मैं भूल गया हूँ… कोई बात नहीं… काफी देर हो गई है, इसलिए आपको जहॉं ठीक लगे उस दिशा में टेक्सी ले जा क्योंकि अब विलंब करना योग्य नहीं है|’’ टेक्सी ड्राइवर क्या करेगा ?

हमसे किसीको आगे बढ़ते और कोई एक दिशामें दौडते देखकर ‘‘ये सभी आगे बढ़ गये हैं और दौड़ रहे हैं, हम पीछे रह जायेंगे… देर हो जायेगी… ऐसा सोचकर हम भी उनके पीछे दौड़ने लगे, किन्तु उसके पहले या तो दौड़ते समय भी किसीको पूछा तक नहीं कि हम किस लिये दौड़ते हैं और कौनसी दिशामें दौड़ते हैं ?

पर्युषण महापर्व   तीसरा दिन
बस यहॉं ही पर्वाधिराज की यथार्थ महत्ता है| ॠे (रुक जाओ… देखो… और चलो) के पटिये द्वारा सही चेतावनी देता है| प्रथम तो धन, साधन और प्रसाधनो की ओर बढ़ी हुई गति को रोको| बाद में आंतरिक दृष्टिसे देखो कि ये हमें सुख के रत्नो की खदान की ओर ले जाते हैं या अशांति-दुःखकी खाईकी ओर ले जाते हैं ! बाद में सही निर्णय और सही दिशाको पकड़कर उस ओर आगे बढे| अपने लाभ-न्याय के विषय पर जब मनुष्य सही निर्णय नहीं ले पाता, तब वह स्पेश्यालिस्ट को कन्सल्ट करता है| वकील आदि की सलाह लेता है| यहॉं गुरु भगवंत आपके सत्य हितके मार्ग की सलाह देनेवाले वकील-स्पेश्यालिस्ट है| जैसे बजेट जाहिर होने के बाद जिस तरह निपुण अर्थशास्त्री जाहिर भाषण द्वारा लोगों को खर्च, आवक और बचत के विषय पर मार्गदर्शन देता है| उसी तरह पर्वाधिराज के दिनोमें गुरुदेव सतत प्रवचनों के द्वारा आपको मानवभव के समय का खर्च कहॉं करना है ? उसके सामने हम क्षमादि की कमाई-आवक कैसे करेंगे ? और ढ.त., अखबार, गॉंवगपोड़े जैसे गलत स्थानो में होता समय का व्यय रोक कर उसकी बचत कैसे करेंगे ? यह सिखाते हैं|

मूसलधार वर्षा होने पर टेलिफोन, ट्रेन, टेक्सी, टी.वी. और टीफिन सेवाएं बंद-ठप्प हो जाती हैं| पर्युषण पर्व में जिनवाणी स्वरूप मुसलधार वर्षा होने पर भी हमारी व्यर्थ बातें, व्यापार धंधे के लिये भागदौड़, विषयप्रवृत्तिओं में व्यस्तता और विविध वानगी के चसके यदि चालु रहे, वह क्या योग्य है ? ये सब ठप्प होने ही चाहिए|

गटर में भरा हुआ और जमा हुआ कूडा बरसात के पानी के प्रवाह में बह जाता है और गंदी नाली भी साफ हो जाती है| तो पर्वाधिराज के दिनो में जिनवाणी के बहते प्रवाह में हमारे मनमें भरे हुए वासना-संज्ञा-भ्रांति आदि के कचरे का निकाल क्यों न हो जाय और हमारा मन स्वच्छ क्यों न बने ?

दुनियादारीकी प्रपंच-जंजाल में बह जाते, एक ही पन्ने की हजारों झेरॉक्स कोपी जैसे, एक-जैसे दिनोमें पर्वके दिन यानी आत्मा के लिए रजा-मजा के दिन! यानी कि रविवार ! कुछ नया-आत्मा को भाता हो, प्रिय हो ऐसा करने के-मज़ा लूटने के दिन !

हमारा भूतकाल अँधेरे में बीता ! गर्भकाल माताके उदरके अँधेरेमें व्यतीत हुआ ! मौत भी हमे अँधेरे में रखकर ही हमला करती है ! और परलोकभी अँधेरेमें! बस ऐसे अँधेरेसे अभ्यस्त ज्यादातर लोगोंका जीवन भी अविवेक के अँधेरेमें ही पूरा होता है| पर्वके दिन हमारे जीवनमें विवेक का उजाला फैलाने के लिए आते हैं| जिसका जीवन उजालेंमें, उसका परलोक भी उजासभरा ! तभी तो यह पर्व शानदार नहीं किन्तु प्राणवान गिना जाएगा !

इस तरह अनेकानेक दृष्टिकोणसे यह पर्वाधिराज महत्व रखता है| इसलिए उसे पूर्ण रीतिसे आराधना से सार्थक करना ही चाहिए| इन दिनोमें प्रमाद-आलस-लापरवाह का त्याग कर देना चाहिए| नये साल की शुरुआत में यदि कोई पूछे कि ‘‘पिछले साल आपने क्या किया ?’’ तब आपको ऐसा उत्तर देने की नौबत नहीं आनी चाहिए, कि ‘‘टाईम पास किया’’| इस तरह पर्युषण पर्वका पूरा लाभ उठायें| उपाश्रय के आसपास बने हुए धर्ममय माहोल में जीवट से कूदकर तपयोग, वैयावच्चयोग, भगवद्भक्तियोग, स्वाध्याय-ध्यानयोग में से कोई भी योग अपनाना चाहिए| साथ साथ ‘अवर अनादिकी चाल’ का भी त्याग करना चाहिए| क्रोध, अभिमान, माया, इच्छा, आसक्ति, ममता, ममत्व इत्यादि अनेक दुर्भाव अमर्यादित भवोंसे परछाई की तरह हमारे साथ रहे हैं| उन सबको दूर धकेलकर क्षमा, नम्रता, सरलता, संतुष्टि, सदाग्रह, सदाचार इत्यादि आत्मिक भावोंको प्रकट करने के लिए प्रयत्नशील बनना चाहिए| अनित्यता इत्यादि की भावनासे वैराग्य का सुचारु रूपसे विकास करना चाहिए और मैत्र्यादि भावोंसे सर्व जीवोंके साथ प्रेमभाव प्रकट करना चाहिए|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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1 Comment

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  1. miruchi
    अक्टूबर 5, 2012 #

    i need all this stories of paryushan mahapurva to be translated in english…i vl be thankful if u work on ma request

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