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रत्नत्रय

रत्नत्रय

सुदेव सुगुरु सुधर्म आदरु
जैन धर्म में देव, गुरु, धर्म का बड़ा ही महत्त्व है| देव वे होते हैं जो वीतराग बन चुके हैं| गुरु वे हैं जो वीतराग बनने की साधना करते हैं और आत्मा को वीतराग मार्ग पर ले जाने वाली साधना को धर्म कहते हैं| इन तीनों को रत्नत्रय कहते हैं|

देव … जैन धर्म ने राग द्वेष युक्त आत्मा को अपना देव नहीं माना है| राग का अर्थ है-अपने मन के अनुकूल लगने वाली वस्तु पर मोह और द्वेष का मतलब है – नापसन्द चीज पर घृणा| इन राग द्वेष पर विजय प्राप्त करने वाला ही जिन है| वही वीतराग है, उसे अरिहन्त भी कहते हैं| वही देव है|

गुरु … जैन धर्म ने गुरु उसे माना जिसका आध्यात्मिक उत्कर्ष हो, जिसके जीवन में संयम एवं सद्गुणों का प्राधान्य हो और जो साम्य भाव के द्वारा वीतरागता को प्रकाशित करता है|

धर्म … धर्म जीवन का मधुर संगीत है| जीवन में समरसता, सरसता और मधुरता का संचार कर वह मन और मस्तिष्क को परिमार्जित करता है| धर्म आत्मा को महात्मा और परमात्मा तक ले जाने वाला गुरु मन्त्र है| धर्म आत्मा का दिव्य प्रकाश है| वह बाहर नहीं अन्दर है | जो दुःख से, दुर्गति से, पापाचार और पतन से बचाकर आत्मा को ऊँचा उठाता है|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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