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डिट्टा का भाग्य

डिट्टा का भाग्य
एक गॉंव में एक आदमी रहता था| उसे लोग डिट्टा कहकर बुलाते थे| वह कुछ भी पढ़ा लिखा नहीं था, इसलिए बेकार था|

एक बार वह किसी दूसरे गॉंव गया| गॉंव के बाहर उसने एक गधा देखा, जो दूब चर रहा था| जब वह गॉंव में पहुँचा तो उसे एक कुम्हार दिखाई दिया, जो अपना गधा खो जाने के कारण परेशान था| कुम्हार के पूछने पर डिट्टा ने बताया कि तुम्हारा गधा गॉंव के बाहर है| कुम्हार वहॉं गया तो उसे गधा मिल गया| प्रसन्न होकर कुम्हार डिट्टा को अपने घर ले गया| जिस कमरे में डिट्टा बैठा था, उसके पास के कमरे में कुम्हारिन रोटी बना रही थी| रोटी सिकने पर राख झाड़ने के लिए वह उस पर ठपका लगाती| डिट्टा ने ठपके गिन लिए| जब वह भोजन करने बैठा, तो उसने कुम्हार से कहा कि आज इस चूल्हे पर पन्द्रह रोटियॉं बनी हैं| रोटियॉं गिनने पर संख्या सही निकली|

अब डिट्टा अपनी भविष्यवाणी के लिए सारे गॉंव में प्रसिद्ध हो गया| गॉंव के ठाकुर ने उससे अपनी ठकुराइन के हार के बारे में पूछा| डिट्टा ने कहा – इसका पता कल लगेगा| फिर वह ठाकुर की हवेली में ही सो गया| रात को लेटे-लेटे उसने नींद को बुलाया – आ निद्रा आ| निद्रा नामक दासी ने हार चुराया था| अपना नाम सुनकर वह डर गई| उसने तुरन्त वह हार डिट्टा को दे दिया| हार पाने के बाद ठाकुर ने अपनी मुट्ठी में मरा हुआ डिट्टा बन्द कर पूछा – बताओ ! इस मुट्ठी में क्या है? घबरा कर डिट्टा बोला – दूब चरन्ता गदहा देखा, ठपके रोटी पाई| हार मिला निद्रा से अब तो डिट्टा मौत आई॥ बात ठीक निकल जाने के कारण ठाकुर ने डिट्टा को बहुत बड़ा इनाम दिया| इसे कहते हैं भाग्य|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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