1 0 Tag Archives: जैन आगम
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दुर्गति की दिशा में

दुर्गति की दिशा में

आसुरीयं दिसं बाला, गच्छंति अवसा तमं

अज्ञ जीव विवश होकर अन्धकाराच्छदन
आसुरी गति को प्राप्त होते हैं

जिनमें सम्यग्बोध नहीं है, वे गुलाम बन जाते हैं और फलस्वरूप दुर्गति को प्राप्त होते हैं| Continue reading “दुर्गति की दिशा में” »

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बात लम्बी न करें

बात लम्बी न करें

निरुद्धगं वा वि न दीहइज्जा

थोड़े में कही जानेवाली बात को व्यर्थ ही लम्बी न करें

बुद्धिमान लोग सदा अपनी बात को नपे-तुले शब्दों में प्रस्तुत करते हैं| वे आवश्यक वाणी का ही प्रयोग करते हैं| वाणी का अनावश्यक विस्तार करके अपना और दूसरों का बहुमूल्य समय नष्ट करना वे उचित नहीं समझते| Continue reading “बात लम्बी न करें” »

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दुष्कर कुछ नहीं

दुष्कर कुछ नहीं

इह लोए निप्पिवासस्स,
नत्थि किंचि वि दुक्करं

इस संसार में जो निःस्पृह है, उसके लिए कुछ भी दुष्कर नहीं है

इस संसार में सबसे बड़ी बाधा अपनी आसक्ति है – स्पृहा है – इच्छा है – वासना है | जो अनासक्त नहीं है, वह अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर सकता – जो स्वार्थी है, वह परोपकार या परमार्थ नहीं कर सकता| Continue reading “दुष्कर कुछ नहीं” »

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सोचकर बोलें

सोचकर बोलें

अणुचिंतिय वियागरे

सोचकर बोलें

इस दुनिया में मौन रहने से काम नहीं चल सकता| व्यवहार के लिए कुछ-न-कुछ सबको बोलना पड़ता है| पशु पक्षी भी बोलते हैं| उनकी भाषा अलग होती है, संकेत अलग होते हैं; जिनके माध्यम से वे अपनी भावनाओं को प्रकट करते हैं – आवश्यकताओं की अभिव्यक्ति करते हैं| Continue reading “सोचकर बोलें” »

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क्रोध का नाश

क्रोध का नाश

उवसमेण हणे कोहं

क्रोध को शान्ति से नष्ट करें

क्रोध को क्रोध से नष्ट नहीं किया जा सकता| आग को आग से कैसे बुझाया जा सकता है ? आग को बुझाने के लिए जल चाहिये | इसी प्रकार क्रोध को नष्ट करने के लिए शान्ति चाहिये| Continue reading “क्रोध का नाश” »

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लोभ को छोड़िये

लोभ को छोड़िये

लोभमलोभेण दुगंछमाणे
लद्धे कामे नाभिगाहइ

लोभ को अलोभ से तिरस्कृत करनेवाला साधक प्राप्त कामों का भी सेवन नहीं करता

लोभ एक कषाय है| वह क्रोध, अभिमान और माया की तरह आत्मा को कलुषित करता है – उसकी साधना में बाधक बनता है| जैसे अन्य कषाय आत्म-शुद्धि के लिए त्याज्य हैं, वैसे ही लोभ भी त्याज्य है| Continue reading “लोभ को छोड़िये” »

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शुद्धात्मा

शुद्धात्मा

भावणाजोगसुद्धप्पा जले णावा व आहिया

जिसकी आत्मा भावनायोग से शुद्ध है, वह जल में नौका के समान है

डाकू भी छुरे का प्रयोग करता है और डाक्टर भी, परन्तु एक किसी की हत्या करके धन लूटना चाहता है और दूसरा आपरेशन करके रुग्ण या सड़े अंगको काटना चाहता है, जिससे बीमार व्यक्ति स्वस्थ हो सके| एक पापी है, दूसरा पुण्यात्मा- एक तक्षक है, दूसरा रक्षक!

चूहे को भी बिल्ली मुँह से पकड़ती है और अपने बच्चे को भी; परन्तु एक को वह खाना चाहती है और दूसरे को सुरक्षित रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना चाहती है| क्रियाएँ समान होने पर भी भावना में कितना अन्तर है?

किसी पुत्र को उसके पिताजी भी पीटते हैं और अन्य बालक भी; परन्तु पिताजी उसे सुधारना चाहते हैं और अन्य बालक शत्रुतावश ऐसा करते हैं| इस प्रकार पिटाई एक-सी होने पर भी भावों की भिन्नता से परिणाम भिन्न भिन्न होते हैं|

ज्ञानी कहते हैं कि भावों का ही अधिक महत्त्व है| अतः भावनायोग से जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है; वे जल में नौका के समान तैरते हुए उस पार चले जाते हैं; क्योंकि वे शुद्धात्मा हैं|

- सूत्रकृतांग सूत्र 1/15/5

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संग्रह न करे !

संग्रह न करे !

बहुं पि लद्धुं न निहे

अधिक प्राप्त होने पर भी संग्रह नहीं करना चाहिये

पानी का एक जगह संग्रह हो जाये और उसे इधर-उधर बहने का अवसर न मिले; तो वह पड़ा-पड़ा सड़ने लगता है| धन का भी यही हाल होता है| यदि वह अधिक मात्रा में एकत्र हो जाये जो उसे सुरक्षित रखने की चिन्ता सिर पर सवार हो जाती है| कुटुम्बी, चोर, डाकू सभी उसके पीछे लग जाते हैं और छीनने की कोशिश करते हैं| Continue reading “संग्रह न करे !” »

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विषय-विरक्ति

विषय विरक्ति

वंतं इच्छसि आवेउं, सेयं ते मरणं भवे

वान्त पीना चाहते हो ? इससे तो तुम्हारा मर जाना अच्छा है

थूक को चाटना किसे अच्छा लगता है ? कै (वमन) में मुँह से बाहर निकली वस्तु को भला कौन पीना चाहेगा? कोई नहीं| थूक और वान्त से सभी घृणा करते हैं और इन्हें पुनः उदरसात् करने की अपेक्षा मर जाना अच्छा समझते हैं| Continue reading “विषय-विरक्ति” »

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ज्ञान का सार

ज्ञान का सार

एवं खु णाणिणो सारं,
जं न हिंसइ किंचणं

अहिंसा या दया एक धर्म है; किन्तु इसका सम्यक् परिपालन करने से पहले ज्ञान होना आवश्यक है

जो व्यक्ति जीवाजीवादि नव तत्त्वों को अच्छी तरह से जान लेता है – इनके स्वरूप को हृदयंगम कर लेता है, वही सच्चा अहिंसक बन सकता है| Continue reading “ज्ञान का सार” »

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