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सदा जागृत

सदा जागृत

सुत्ता अमुणी, मुणीणो सया जागरंति

जो सुप्त हैं, वे अमुनि है मुनि तो सदा जागते रहते हैं

जो अमुनि हैं-असाधु हैं; जिनमें साधुता या साधकता का अभाव है, वे आलसी लोग सोते रहते हैं| जो सोते हैं, उनकी आँखें बन्द रहती हैं और उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता| इसी प्रकार जो असाधु हैं; उनके विवेक – चक्षु बन्द रहते हैं और इसीलिए उन्हें अपने कर्त्तव्य अकर्त्तव्य का भान नहीं रहता| वे किंकर्त्तव्यविमूढ़ बने रहते हैं| Continue reading “सदा जागृत” »

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सदा अमूढ़

सदा अमूढ़

सम्मद्दिट्ठि सया अमूढे

जिसकी दृष्टि सम्यक् है, वह सदा अमूढ़ होता है

मिथ्याद्दष्टि मूढ़ होता है; उसकी मूढ़ता सत्संग से मिट सकती है; किंतु सम्यग्द्दष्टि अमूढ़ होता है, उसकी अमूढ़ता कुसंगति से भी नहीं मिटती| Continue reading “सदा अमूढ़” »

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महापूजा – साल का छट्ठा कर्तव्य

महापूजा   साल का छट्ठा कर्तव्य
आज कल करोड़ो रुपये और कई सालों का परिश्रम लगाने के बाद जिनालय तैयार होता है| जिनालय का पाषाण लाने के लिए बार बार जयपुर इत्यादि स्थानों पर दोड़-धूप चलती हैं| किन्तु बादमें जिस भगवान को बिराजित करना है, और जिस भगवान की प्रतिष्ठा मात्रसे इमारत ‘‘देरासर’’ या ‘‘जिनालय’’ के रूपमें पहचाना जाता है, उस भगवान को लोग एक झटके में कोई भी कारीगर से किसी भी तरह बनाये हुए खरीद लेते हैं, यह अनुचित है| Continue reading “महापूजा – साल का छट्ठा कर्तव्य” »

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The Gods – Their Cars – Their Bells their Family – Part 3

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आत्मा का स्वाभाविक धर्म – सम्यक्त्व

आत्मा का स्वाभाविक धर्म   सम्यक्त्व
सम्यक्त्व का अर्थ है, निर्मल दृष्टि, सच्ची श्रद्धा और सच्ची लगन| सम्यक्त्व ही मुक्ति-मार्ग की प्रथम सीढ़ी है| जब तक सम्यक्त्व नहीं है, तब तक समस्त ज्ञान और चारित्र मिथ्या है| जैसे अंक के बिना बिन्दुओं की लम्बी लकीर बना देने पर भी, उसका कोई अर्थ नहीं होता, उससे कोई संख्या तैयार नहीं होती, उसी प्रकार समकित के बिना ज्ञान और चारित्र का कोई उपयोग नहीं, वे शून्यवत् निष्फल है| अगर सम्यक्त्व रूपी अंक हो और उसके बाद ज्ञान और क्रिया (चारित्र) हो तो जैसे एक के अंक पर प्रत्येक शून्य से दस गुनी कीमत हो जाती है, वैसे ही ज्ञान और चारित्र-दान, शील, तप-जप आदि मोक्ष के साधक होते हैं| मुक्ति के लिये सम्यग्दर्शन की सर्वप्रथम अपेक्षा रहती है| Continue reading “आत्मा का स्वाभाविक धर्म – सम्यक्त्व” »

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श्री पुण्डरिक स्वामी की चरण पादुकाएँ

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उपचार से भली सावधानी

उपचार से भली सावधानी
जीवों की उत्पत्ति होने के बाद उन जीवों की रक्षा करना बहुत मुश्किल हो जाता है| इसलिए घर में जीवों की उत्पत्ति ही न हो इस बात की सावधानी रखना उत्तम कार्य है|

इतनी सावधानी अवश्य रखिए :-

1) घर को सम्पूर्णतया स्वच्छ रखिए – गंदगी से जीवोत्पत्ति विशेष होती है|

2) पानी का उपयोग कम से कम कीजिए, गीलेपन से अधिक मात्रा में जीव पैदा होते हैं|

3) खाद्य पदार्थ जमीन पर न गिरें, अन्न के आकर्षण से अनेक जीव दौडे चले आते हैं| Continue reading “उपचार से भली सावधानी” »

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निगोद की रक्षा करें

निगोद की रक्षा करें
1. जो जगह अधिक समय तक गीली रहती हो, वहॉं निगोद की उत्पत्ति होती है| बाथरुम भी यदि सारा दिन गीला रहे तो उसमें भी निगोद की उत्पत्ति होती है| इसलिये घर का कोई भी स्थान अधिक समय तक भीगा न रहे इसकी सावधानी रखें| Continue reading “निगोद की रक्षा करें” »

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अप्काय की रक्षा करें

अप्काय की रक्षा करें
निम्नलिखित विशेष सावधानियॉं बरतें :-

1. पानी का उपयोग कम से कम कीजिए, उसका घी के समान संभल-संभल कर उपयोग कीजिए|

2. स्नान, कपड़े धोने में, बाथरूम में, शौचालय में भी पानी को छानकर उपयोग में लाएँ|

3. नल को अनावश्यक खुला न छोडें|
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अति मात्रा में नहीं लेते

अति मात्रा में नहीं लेते

नाइमत्तपाणभोयणभोई से निग्गंथे

जो अति मात्रा में अ-जल ग्रहण नहीं करता, वही निर्ग्रन्थ है

बहुत-से लोग हैं, जो स्वाद के लालच में ठूँस-ठूँस कर भोजन कर लेते हैं और फिर लम्बे समय तक बीमारी भोगते रहते हैं| Continue reading “अति मात्रा में नहीं लेते” »

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