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अधिक न हँसे

अधिक न हँसे

अतिवेलं न हसे मुणी

मुनि कभी मर्यादा से अधिक न हँसे

हँसना और सदा हँसमुख रहना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है | जो व्यक्ति उदास बन कर दिनभर मुँह फुलाये हुए बैठा रहता है – सबको अपना दुःखड़ा सुनाता रहता है – दूसरों के साथ मारपीट और बकझक करता रहता है, ऐसा चिड़चिड़ा आदमी क्या कभी स्वस्थ रह सकता है ? कभी नहीं| Continue reading “अधिक न हँसे” »

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अनन्तसुख का नाश मत कीजिये

अनन्तसुख का नाश मत कीजिये

माएयं अवमन्जंता, अप्पेणं लुंपहा बहुं

सन्मार्ग का तिरस्कार करके अल्प सुख (विषयसुख) के लिए अनन्त सुख (मोक्षसुख) का विनाश मत कीजिये

यदि कोई हीरे के बदले कङ्कर ले ले तो उसे आप क्या समझेंगे ? आप समझेंगे, वह मूर्ख है| सुमार्ग के बदले कुमार्ग को अपनाने वाले भी ऐसे ही मूर्ख हैं| Continue reading “अनन्तसुख का नाश मत कीजिये” »

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अतिवेल न बोलें

अतिवेल न बोलें

नाइवेलं वएज्जा

अधिक समय तक एवं अमर्याद न बोलें

‘वेला’ का अर्थ समय भी होता है और मर्यादा भी; इसलिए इस सूक्ति के दो अर्थ होते हैं| Continue reading “अतिवेल न बोलें” »

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सोचकर बोलें

सोचकर बोलें

अणुचिंतिय वियागरे

सोचकर बोलें

इस दुनिया में मौन रहने से काम नहीं चल सकता| व्यवहार के लिए कुछ-न-कुछ सबको बोलना पड़ता है| पशु पक्षी भी बोलते हैं| उनकी भाषा अलग होती है, संकेत अलग होते हैं; जिनके माध्यम से वे अपनी भावनाओं को प्रकट करते हैं – आवश्यकताओं की अभिव्यक्ति करते हैं| Continue reading “सोचकर बोलें” »

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तप से पूजा की कामना न करें

तप से पूजा की कामना न करें

नो पूयणं तवसा आवहेज्जा

तप के द्वारा पूजा (प्रतिष्ठा) की अभिलाषा नहीं करनी चाहिये

कल्पना कीजिये – एक नौका में बैठकर कुछ यात्री नदी पार कर रहे हैं| वे देखते हैं कि नौका में पानी भरने लगा है और इससे धीरे-धीरे नौका डूबने की सम्भावना पैदा हो गई है| वे तत्काल नौका के छिद्रों को ढूँढते हैं, जहॉं से पानी भीतर प्रवेश कर रहा है| Continue reading “तप से पूजा की कामना न करें” »

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बालप्रज्ञ

बालप्रज्ञ

अं जणं खिंसइ बालपे

बालप्रज्ञ (अज्ञ) दूसरे मनुष्यों को चिढ़ाता है

स्वयं रोना आर्त्तध्यान है| दूसरों को रुलाना रौद्रध्यान है| संसार के अधिकांश जीवों का अधिकांश समय रोने और रुलाने में ही नष्ट होता है| Continue reading “बालप्रज्ञ” »

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विद्या और आचरण

विद्या और आचरण

आहसु विज्जाचरणं पमोक्खं

विद्या और आचरण से ही मोक्ष बताया गया है

जिस प्रकार चलने के लिए चक्षु और चरण – दोनों आवश्यक हैं, उसी प्रकार मोक्ष की प्राप्ति के लिए भी ज्ञान और क्रिया दोनों आवश्यक हैं| Continue reading “विद्या और आचरण” »

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सूक्ष्म शल्य

सूक्ष्म शल्य

सुहुमे सल्ले दुरुद्धरे

सूक्ष्म शल्य बड़ी कठिनाई से निकाला जा सकता है

जो लोग पैदल चलते हैं, उन्हें मार्ग में कॉंटे चुभ जायें तो वे क्या करते हैं? दूसरे कॉंटे से अथवा सूई से निकाल लेते हैं| यद्यपि कॉंटा निकल जाने पर भी वेदना बनी रहती है, फिर भी कुछ समय बाद मिट जाती है और कुछ दिन बाद तो उसका छेद भी गायब हो जाता है| चमड़ीसे चमड़ी मिल जाती है| Continue reading “सूक्ष्म शल्य” »

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आस्रव-संवर

आस्रव संवर

समुप्पायमजाणंता, कहं नायंति संवरं|

आस्रव को न जानने वाले संवर को कैसे जान सकते है?

एक विशाल सरोवर की कल्पना कीजिये| उसमें एक नौका तैर रही है| नौका में अनेक यात्री बैठे हैं| धीरे-धीरे नौका डूबने लगती है| नौका में पानी का प्रवेश होने लगता है| यात्री डूबने के डर से चिल्लाते हैं – ‘अरे इस पानी को रोको-जैसे भी बने इस पानी का आना बन्द करो! Continue reading “आस्रव-संवर” »

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न प्रिय, न अप्रिय

न प्रिय, न अप्रिय

सव्वं जगं तु समयाणुपेही,
पियमप्पियं कस्स वि नो करेज्जा

सारे जगत को जो समभाव से देखता है उसे न किसी का प्रिय करना चाहिये, न अप्रिय

भावना हमारे समस्त कार्यकलाप की प्रेरिका है| यदि उसमें शुद्ध रहे; तो हमसे शुद्ध कार्य होंगे और यदि उसमें अशुद्धि रहे; तो अशुद्ध कार्य होंगे| Continue reading “न प्रिय, न अप्रिय” »

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