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मनमें ही वैरागी

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राग : पहेले दिन बहु आदर आणी आशावरी
भाव : संसारना सुख भोग वच्चे चक्रवतू भरत महाराजानी वैराग्य साधना

मनमें ही वैरागी, भरतजी;
मनमें ही वैरागी;
सहस बत्रीश मुगुट बंध राजा,
सेवा करे वड भागी.
चोसठ सहस अंतेउरी जाके,
तोही न हुवा अनुरागी.
भरत मनमें ही वैरागी.

…१

लाख चोराशी तुरंगम जाके,
छन्नुं क्रोड हे पागी;
लाख चोराशी गजरथ सोहीये,
सुरता धर्मशुं लागी.

….२

चार क्रोड मण अन्न निच सीझे,
लुण दशलाख मण लागी;
तिन कोड गोकूळ घर दूझे,
एक क्रोड हळ सागी.

….३

सहस बत्रीश देश वडभागी,
भये सर्वके त्यागी;
छन्नुं क्रोड गामके अधिपति,
तो हि न हुवा सरागी.

….४

नव निधि रतन चोगड बाजे;
मन चिंता सब भागी;
कनक कीर्ति मुनि पद वंदत है,
देज्यो मुतक्त में मागी.

….५

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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