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क्षमा-प्रदान करते समय

क्षमा प्रदान करते समय

सिकंदरने युद्धमें पौरस को हराकर बंदी बनाया| पौरसको सिकंदर के सामने लाया गया| तब सिकंदरने पौरस को कहा- ‘‘कहो ! आपके साथ कैसा व्यवहार करें?’’ तब पौरसने निर्भयता से कहा कि एक राजा का दूसरे राजा के साथ जैसा व्यवहार होना चाहिए, ठीक वैसा ही व्यवहार कीजिए| सिकंदर इस जवाब से प्रसन्न हो गया|

क्षमा-याचना करने वाली दोषित व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए ? इस प्रश्न का जवाब यह है कि स्वयंको दोषित समजनेवाला जिस तरह व्यवहार करता है, ठीक उसी तरह व्यवहार करना चाहिए| तात्पर्य यह है कि स्वयंको दोषित माननेवाला ही अन्य के दोषको मामूली समजकर सरलतासे, सहजतासे क्षमा प्रदान कर सकता है|

जब आपको ऐसी अनुभूति हो कि आपके प्रति किसीने अपराध किया है, तब आप इस बात पर ध्यान दे कि मैं भी इस तरह मेरे गलत व्यवहार से कितने सारे लोगोंके हृदयको ठेस पहुँचाता हूँ | भूल और अपराध करने में मैं भी कुछ कम नहिं हूँ| यदि अपने भयंकर अपराधों की इस तरह याद आ जाये, तो अन्य लोग अपराधी होते हुए भी अपराधीके रूपमें नहीं दिखाई देंेगे, उलटा अपने अपराधको याद करानेवाले उपकारी के रूपमें दिखाई देंगे| जिससे अपराधी को क्षमा प्रदान करना सरल हो जाएगा|

ईर्ष्या से मुक्त होकर क्षमा प्रदान करनेवाले महान हैं क्योंकि-
- क्षमा प्रदान करने का अर्थ है, हृदय को द्वेषमुक्त बनाना|
- मैत्रीभाव के मुरझाते हुए पौधे को पानी डालकर नवपल्लवित बनाना|
- अन्य की भूलोंको भूल जानेका बड़ा पराक्रम करना|
- क्षमा देनेवाले हृदयने बुद्धि पर विजय पाया है और अपनी जीवंतता का परिचय दिया है|
- स्वयं के जीवनमें करुणा और वात्सल्य के माध्यमसे ईश्वरीय तत्त्व का बीजारोपण किया है|
- मातृत्व के पवित्र भावोंको प्राप्त किया है|
- उत्कृष्ट औदार्य और श्रेष्ठ दानवीर का बिरुद प्राप्त किया है|
- और भगवान महावीरस्वामी के जीवनसार व उपदेशसार को आत्मसात् किया है|

क्षमा प्रदान करने की यह महान सिद्धि को अकलंकित पूर्णिमा के चांद का स्वरूप देने के लिए ध्यान रखने योग्य बातें…

१) दोषित व्यक्ति भले क्षमा याचना करने आये या ना आये, उसके साथ प्रेमभरा व्यवहार करना अत्यंत आवश्यक है| अपराधी शायद हिम्मत जुटाकर क्षमा-याचना करने आया हो तब यदि आप उसका तिरस्कार करेंगे तो वह हिम्मत हारकर या तो अपने दुर्व्यवहार को उचित समझकर अधिक द्वेषभाव लेकर जायेगा| ध्यान रखिए कि भूल या दोष तो प्रायः सभी के लिए सामान्य बात है| जिसमें हमारा भी नंबर है| असामान्य बात तो यह है कि स्वयं की भूलका एकरार करना.. स्वीकार करना| क्षमायाचना करनेवाला नम्र बनकर असामान्य पराक्रम दिखा रहा है, तब सज्जनता उसके पराक्रम की अनुमोदना करने में ही है, व्यंग-ताना, मर्म-वचन सुनाकर या अपमान – तिरस्कार करके अवहेलना करनेमें सज्जनता नहीं है| अपराध किया हो या नहीं ‘‘जो क्षमा-याचना करता है, वह महान है|’’ इसलिए क्षमा-याचना के लिए आये हुए व्यक्ति का प्रेमसे सत्कार करना चाहिए| जिससे वह अपनी भूल को अधिक उत्साहसे और सच्चे दिलसे स्वीकार करने तत्पर होगा|

२) क्षमा-प्रदान करते समय अपराधी की भूल को बारबार सुनाना उचित नहीं है| अपराधी पर तिरस्कार की भाषा का, आक्षेप वचन का कभी उपयोग न हो जाए उसका बहुत ध्यान रखना चाहिए| क्योंकि क्षमा याचना करने के लिए आये हुए व्यक्ति को क्षमा याचना के लिए अपने मनको तैयार करने में राम-रावण के युद्ध की तरह आंतरिक द्वन्द्व करना पड़ता है| युद्धमें विजय पाने पर भी हृदय ज्यादा कोमल हो जाता है| इसलिए क्षमा-याचना करते समय सामने से इतना सकारात्मक प्रतिभाव जब नहीं मिलता तब घायल सिंह जैसा मन, हृदय पर अधिकार जमा लेता है और क्षमा-याचना करने वाले को ‘‘क्षमा याचना करके मैंने भूल की’’ ऐसा पश्चाताप होता है| कभी-कभी तो क्षमा आदान-प्रदान के अवसर पर ही परस्पर इतनी आक्षेपबाजी चलती है कि पहले से भी अधिक मनभेद और मतभेद उत्पन्न होता है| यानी आसमान से टपका, खजूर में अटका ऐसी स्थिति हो जाती है| जिससे क्षमा आदान-प्रदान की अमृत-क्रिया विषमय बन जाती है| इसलिए जो व्यक्ति क्षमा-याचना करने आता है, उसके पर कभी भी ताना, व्यंग, कटु वचनादि से मर्मघात नहीं करना चाहिए|

३) यदि हो सके तो उसकी भूल के बदले अपनी भूल का हि विवरण करना चाहिए| क्योंकि हम भी तो निर्दोष नहीं हैं| फर्क सिर्फ इतना हि है कि वह अपराधी के रूपमें जाहिर हो गया है और पुण्यबल से हम हमारा अपराध छिपाने में अब तक सफल हुए हैं| अथवा तो वह प्रगट अपराधी है क्योंकि सामने से अपनी भूल का एकरार करने का साहस कर रहा है| जब कि कायर जैसे हम… भूल का स्वीकार करने की हिंमत नहीं रखनेवाले, हमें यदि कोई अपनी भूल याद दिलायें फिर भी स्वीकार करने तैयार नहीं हैं|

समझ लो कि जो अपने दोष-अपराधोंको छिपाने के प्रयत्न में हैं, वे पापके मुरदे को हृदयभवनमें ही छिपाने के प्रयत्नमें हैं| वे बेचारे इस मुरदे की दुर्गंधसे त्रस्त हो जायेंगे | भय, डिप्रेशन, टेन्शन के चक्कर में फँस जायेंगे| जो अपने अपराध का स्वीकार करता है, वह पापके मुरदे के अग्निसंस्कार की क्रिया कर रहा है और वही ढशपीळेप ऋीशश और मुक्त-प्रसन्नता का स्वामी बन सकता है| इसलिए क्षमा याचना करनेवाले के सामने उसकी भूल का विवरण करने की भूल कभी भी नहीं करनी चाहिए और अपनी भूल को महत्व देकर अपनी तरफ से भी क्षमा याचना करने से ही सुंदर माहोल बनेगा|

क्षमा प्रदान करते समय
४) क्षमा प्रदान करो और बिती हुई बातें भूल जाओ- सेंट हेली के टापू पर अंतिम समय बिताते वक्त भूतपूर्व सम्राट नेपोलियन बार-बार इसु ख्रिस्त को दया की प्रार्थना कर रहा था| स्वयंको हराने वाले वेलिंग्टन की बार-बार याद आने से उसका मन खट्टा हो जाता था| तब एक बार उसकी सेवामें रहे हुए सेक्रेटरीने कहा- आप जब तक वेलिंग्टन को माफ नहीं करेंगे, तब तक इसु आपके पर कैसे प्रसन्न होंगे ? तब नेपोलियनने कहा- मैं वेलिंग्टन को माफ करता हूँ| नेपोलियन का ज़वाब सुनकर सेक्रेटरीने कहा- इतने से नहीं चलेगा, आपको यह बात भी भूल जानी है कि ‘‘मुझे हरानेकी बदमाशी करनेवाला वेलिंग्टन है|’’ तब नेपोलियनने जोरसे जवाब देते हुए कहा- ङ्गख लरप षेीसर्ळींश हळा, र्लीीं ख लरपङ्खीं षेीसशीं हळा.ङ्घ मैं उसको क्षमा प्रदान कर सकता हूँ.. किन्तु मैं उसको भूल नहीं सकता| तब सेक्रेटरीने कहा- तब तो क्षमाका भाव पूर्ण नहीं होगा और ईश्वर प्रसन्न भी नहीं होंगे| परंतु नेपोलियन वेलिंग्टन को भूल नहीं सका|

श्रेणिक जेलमें भेजनेवाले कोणिक की दुष्टता अंतिम समय पर याद आ जाने पर क्रोधावेशमें आ गये, तो नतीजा यह आया कि नरक में जाना पड़ा|

बात यह है कि क्षमा-प्रदान करने मात्र से नहिं चलेगा| हमारे हृदय पर उसके अपराध की जो तसवीर अंकित हुई है, उसे मिटानी ही पडेगी| उसने क्षमा याचना कर ली- आपने क्षमा प्रदान कर दी| एक मामला पूरा हुआ| अब वह बात भूतकाल की हो गई जो कचरापेटी में डालने लायक बन गई| समझो कि एक पत्र व्यवहार पूर्ण हुआ| या तो पत्र व्यवहार का एक प्रकरण पूर्ण हुआ| अब इन पत्रों की फाईल बना कर दिमागके दरजे में रखकर उस पर मिट्टी जमाने से और इस तरह फाईलों का भार बढ़ाते रहने-से ज्यादा हितस्वी कार्य तो यह है कि अब निकम्मी हो गई उन फाईलों का निकाल कर दें|

एक नेता को अपने सेक्रेटरी ने कहा- गोडाउनमें बहुत पुरानी और अब रेकार्ड के रूपमें रखने की जरुरत न हो ऐसी फाईलों का ढ़ेर पड़ा है| आप आज्ञा दो तो उन सभी फाईलों का निकाल कर दें| नेताने जवाब दिया.. हॉं.. निबटारा कर दो, लेकिन उसके पहले उन सभी की झेरोक्ष करवा दो, जिससे भविष्यमें जरुरत के समय पर काम आ जाय !! अब आप ही कहो कि नेता को क्या कहना ? आखिर सभीकी झेरोक्ष रखनी ही हैं तो ओरीजीनल को निकालने का क्या अर्थ ?

हम भी बिलकुल इस नेता की तरह ही चलते हैं| पर्व के प्रसंग को पाकर क्षमा प्रदान करके बने हुए कटु प्रसंग की एक फाईल को रद्द तो कर देते हैं, किन्तु उसे दिमाग के गोदाम में रखते हैं| ऐसी तो कौन जाने कटु बातों की कितनी फाईल मनमें जमा होगी ! तब गुरुदेव कहते हैं कि ये सभी फाईल अब निकम्मी हो गई हैं| क्षमाप्रदान किया, इसलिए बात पूर्ण हो गई| इन सभी बातों को मनमें से निकाल दो| तब हम गुरुदेव के वचन का स्वीकार करके, पुरानी बातों को भूलने का प्रयत्न तो करते हैं, किन्तु उस प्रसंग की गांठ, कटु असर – गलत छापके रूपमें झेरोक्ष नकल तो मनमें रखते ही हैं, फिर क्षमा प्रदान करने का और बिती हुई बातों को भूल जाने का क्या अर्थ ? इसलिए मात्र क्षमा प्रदान करने से या बातों को भूल जाने से नहिं चलेगा, किन्तु उस प्रसंग की सभी कटु असर-छाप-गांठ को भी मिटानी पडेगी| उसके बाद भी यदि कोई आपको याद दिलाने का प्रयत्न करें, कि ‘उसने आपका इस तरह का अपराध किया है|’ तब हमारा जवाब यह होना चाहिए कि- भाई ! अब वह बात खत्म हो गई है| सभी कटु बातें क्षमा के आदान-प्रदान से धूल में मिल गई हैं| अब उन बात का पुनः पिष्टपेषण करने की आवश्यकता नहीं है|

क्षमा प्रदान करते समय
५) आप बार-बार अपराधी या अन्यों के सामने ऐसा भी मत कहते फिरो कि ‘मैंने उसे माफ कर दिया-क्षमा दे दी’| क्योंकि इस तरह बार-बार कहते रहने से ‘मैं कितना उदार ! कितना क्षमावान !’ इत्यादि दूसरों को जताने का मनमें एक आभिमानिक आनंद जरुर मिलेगा किन्तु बात बिगड़ जायेगी | क्योंकि अपराधी को बार बार अपराध की याद और आपके क्षमादान की बात सुननी अच्छी नहीं लगती| शायद वह ऐसी बातों को क्षमादान की किंमत समझ लेगा| जितनी बार आप आपके क्षमा-प्रदान की प्रशंसा करेंगे, इतनी
बार आप क्षमा-प्रदान की किंमत वसूल करने के प्रयत्न में हो और आपकी महत्ता का अवमूल्यन कर रहे हो| कभी कभी तो इतना अतिरेक हो जाता है कि क्षमा याचना करनेवाले व्यक्तिको ऐसा संवेदन होता है कि ‘‘इससे तो अच्छा यह था कि मुझे क्षमा प्रदान करने के बदले दंड दिया होता |’’

एक बार नगरसेठ राजा के बड़े अपराधमें आ गये| नगरसेठ को कठोर दंड देने के लिए राजा तत्पर हुए| मंत्रीकी सलाह ली| मंत्रीने कहा- राजन् ! आप राजसभामें सेठ के अपराध को जाहिर करके आपके क्षमा-प्रदान के सत्कार्य की घोषणा करो| राजाने क्रोधित स्वरमें कहा- ‘‘दंड के बदले क्षमा ? ऐसा तो हरगिज़ नहीं हो सकता|’’ मंत्रीने राजा को कहा- राजन् ! मैं कठोर दंड की ही तो बात करता हूँ| राजाने आश्चर्य से पूछा- कैसे ? मंत्रीने कहा- आप सेठ को क्षमा प्रदान करें, इतना ही नहीं, किन्तु हररोज़ राजसभामें आकर सेठ को अग्रिम बैठक पर बैठने का आमंत्रण भी देना| ऐसी असमंजस बात से उलझनमें पडे राजाने मंत्री को पूछा कि बादमें दंड कैसे देंगे? मंत्रीने कहा- रोज जब नगरसेठ राजदरबारमें प्रवेश करें, तब आप सभी के सामने सेठको सिर्फ इतना ही सुनाते रहो कि आपने तो कितना बड़ा अपराध किया था, फिर भी मैंने आपको मात्र क्षमा-प्रदान ही नहीं किन्तु सन्मान भी दिया है| राजाने उलझे हुए भावोंसे मंत्री को पूछा- इससे क्या लाभ होगा ? मंत्रीने कहा- रोज अपने अपराध के स्मरण से और अपराध के बोझ से सेठ लज्जित होंगे और इससे आपके वचन उनके कानमें धधकते सीसेका रस पड़ने की तरह पीड़ाकारक बनेंगे| हररोज की यह मानसिक वेदना इतनी भारी होगी कि उसके सामने कैदखाने की शारीरिक वेदना एक अंश मात्र भी नहीं होगी और उपरसे क्षमा प्रदान करने के कारण आपकी कीर्ति भी बढेगी|

मंत्री की बात मानकर राजाने ठीक वैसा ही प्रयोग किया| इस अत्यंत अपमानदायक मानसिक पीड़ासे त्रस्त नगरसेठने पांचवे दिन ही आत्महत्या कर ली| ‘‘नाम या प्रसिद्धि वाला कोई भी दान अपना अवमूल्यन करता है’’ ऐसी कहावत क्षमाप्रदान जैसे सत्कार्य को खास लागु होती है| प्रायः ऐसी प्रसिद्धिसे क्षमाप्रदान की सत्क्रिया भी भारी दंडरूप बन जाती है| क्योंकि कहलाती है क्षमा और हो जाती है सजा’’ यदि आपको ऐसा विचित्र दांभिक स्टंट जैसा प्रयोग नहीं करना हो तो क्षमा-प्रदान करके उसका प्रचार मत करो, अन्य को याद मत दिलाओ और ढिंढोरा मत पिटो|

६) पूर्ववत् प्रेमभरा व्यवहार करना – आपने सभी दानोंमें श्रेष्ठ ऐसे क्षमादान देने की उदारता की, इसलिए आप हज़ारबार धन्यवाद के पात्र हो| आपने आपके दिलमें से भी उसके अपराधी रूप की तसवीर को मिटा दी हैं| आप लाखों बार धन्यवाद पात्र हो| आप अपराध और क्षमा की बातें भूल गये, इतना ही नहीं आप उसका जिक्र भी नहीं करते, इसलिए आपको करोड़ो सलाम|

अब एक विशिष्ट काम कीजिए| आप उसके साथ पूर्व की तरह प्रेमभरा और सहज व्यवहार फिरसे स्थापन करो| आपके बिचार में, आपकी वाणीमें, आपके व्यवहारमें… कहीं भी उस प्रकरण की झलक नहीं आनी चाहिए| जैसे पानीमें रखी हुई अँगुली को पानीमें से बाहर निकालने के बाद पानीमें अँगुली के अस्तित्वका कोई निशान भी नहीं रहता| ठीक उसी तरह क्षमाप्रदान करने के बाद अपने वाणी या व्यवहार में अपराधी के दुर्व्यवहारादि का निशान नहीं रहना चाहिए|

७) पछतावा मत करो :- क्षमा प्रदान करने के पश्चात् कभी कभी पछतावा होता है- ‘‘उसे निरर्थक छोड़ दिया| उसे दंड-सजा देना ही आवश्यक था| उसकी क्षमा याचना की मीठी-मीठी बातो में आकर मैं फँस गया या तो उसकी अश्रुधाराने मेरे क्रोधाग्निको शान्त कर दिया| उसने नाटक-अभिनय किया और मैं सत्य मानकर मूर्ख बन गया| लेकिन यह अच्छा नहीं हुआ| वह अपराध करने पर भी बिना दंड के मुक्त हो गया और मुझे तो उसके अपराध से सहन ही करना पड़ा न ? मेरे पक्ष में तो नुकसान ही हुआ|’’ ऐसी ऐसी विचारधाराएँ उसे क्षमा प्रदान करने के बाद आनंद के बदले पश्चाताप की ओर ले जाती हैं| जो हमे प्रसन्नता का उपहार देने के बदले शोक-संतापवाला बना देती हैं| कभी कभी तो ऐसा भी होता है कि अपराधी हमारी क्षमा प्रदान करने की सज्जनता का गैरलाभ उठाता है और सुधरने के बदले अधिक बिगड़ा हुआ दिखाई देता है| इसलिए कभी-कभी अपराधी का ऐसा व्यवहार क्षमा प्रदान करने के बाद प्रज्वलित बनी हुई पछतावे की अग्निमें अधिक आहुति देने के समान बन जाता है| यदि सामनेवाला व्यक्ति ऐसा हो तो अबसे हमे उसके साथ ज्यादा संबंध में नहीं आना चाहिए| ऐसी नौबत आये तब भी सावधान रहना चाहिए| परन्तु अपराधी के ऐसे दुर्व्यवहार से आपने क्षमा प्रदान करके जो सुकृत किया है उसको पश्चाताप करके भस्म करने की भूल कदापि नहीं करनी चाहिए| क्योंकि सुकृत को पश्चाताप की अग्नि से भस्म कर देने जैसा दुष्कृत्य अन्य कोई नहिं है|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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